प्राण का नाम आते ही दिमाग में एक ऐसा खलनायक उभरता है जिसने अपने दमदार अंदाज से हिंदी सिनेमा को नई पहचान दी. पर्दे पर उनका हर किरदार इतना असरदार होता था कि लोग उनसे डरने लगते थे. लेकिन असल जिंदगी में उनका दिल बेहद नरम था. बहुत कम लोग जानते हैं कि उनकी जिंदगी में एक ऐसा दर्द छिपा था, जो शोहरत और कामयाबी के बावजूद कभी कम नहीं हुआ. ये दर्द जुड़ा था 1947 के बंटवारे से, जब उन्होंने अपनी जिंदगी की सबसे प्यारी चीज खो दी थी.
बंटवारे का दर्द
साल 1947 में जब देश का बंटवारा हुआ, तब प्राण लाहौर से मुंबई आ रहे थे. इसी दौरान उन्होंने अपना पालतू कुत्ता खो दिया, जो उनके दिल के बेहद करीब था. ये उनके लिए बहुत बड़ा झटका था, क्योंकि वो अपने कुत्ते से बेहद प्यार करते थे. बाद में उन्होंने अपने पालतू कुत्तों के नाम बुलेट, व्हिस्की और सोडा रखे. कहा जाता है कि ये नाम कहीं न कहीं उनकी उस पुरानी याद और लगाव से जुड़े थे, जिसे वो कभी भूल नहीं पाए.

संघर्ष से सफलता तक
मुंबई पहुंचकर प्राण ने नई शुरुआत की. शुरुआत आसान नहीं थी, क्योंकि वो असल में एक फोटोग्राफर बनना चाहते थे. उन्होंने दिल्ली में एक कंपनी में काम भी किया था, लेकिन किस्मत उन्हें फिल्मों में ले आई. खास बात ये रही कि उन्होंने अपने करियर की शुरुआत परिवार से छुपाकर की, क्योंकि घरवाले इसके खिलाफ थे. धीरे-धीरे उनकी मेहनत रंग लाई और वो फिल्म इंडस्ट्री के सबसे बड़े सितारों में शामिल हो गए.

खलनायकी का नया चेहरा
प्राण ने ‘जंजीर', ‘डॉन', ‘मधुमती' और ‘राम और श्याम' जैसी फिल्मों में अपने किरदार से दर्शकों को बांध लिया. उनकी खासियत ये थी कि वो हर रोल को अलग अंदाज में निभाते थे. बाद में ‘उपकार', ‘अमर अकबर एंथनी' और ‘कर्ज' में उन्होंने पॉजिटिव किरदार निभाकर भी खूब तारीफ पाई. वो अपने लुक और स्टाइल पर खास ध्यान देते थे, इसलिए उनके हर किरदार की अलग पहचान बनती थी. इतनी कामयाबी के बावजूद, उनके दिल में बंटवारे का वो दर्द हमेशा जिंदा रहा.
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