क्या 'धुरंधर-2' जैसी फिल्म पर गंभीरता से कुछ भी लिखना संभव है? दरअसल इस फिल्म को लेकर भी एक तरह का ध्रुवीकरण हो चुका है. सोशल मीडिया पर लिखा जा रहा है कि लेफ्ट, लिबरल, कमजोर दिल वाले, भारत से प्यार न करने वाले यह फिल्म न देखें. मतलब साफ है अगर इस फिल्म की आलोचना की तो आप यह चारों करार दिए जाएंगे- लेफ्ट, लिबरल, कमजोर दिल वाले, भारत से प्यार न करने वाले.
यह भी पूछा जा रहा है कि अगर धुरंधर-1 आपको अच्छी नहीं लगी तो धुरंधर-2 क्यों देखेंगे? इसके एक से अधिक जवाब हैं. पहला तो यही है कि यह समझना है कि आखिर यह पूरी धुरंधर दोनों किस्तों को मिलाकर क्या कहने के लिए बनाई गई थी? दूसरा यह कि फिल्म देखते हुए आप दर्शकों को भी देखते हैं, उनकी मानसिकता समझने की कोशिश करते हैं. तीसरा यह कि धुरंधर 2 पर लग रहे इल्जाम कितने सही हैं?
शुरू तीसरे सवाल से ही करते हैं. धुरंधर 2 पर एक इल्जाम प्रोपेगैंडा फिल्म होने का लग रहा है. यह सच है कि हर फिल्म का अपना एक संदेश होता है, एक विचार होता है. जिस फिल्म में यह संदेश या विचार न हो, वह अच्छे सिनेमा का उदाहरण नहीं हो सकता. एक हद तक हर फिल्म एक प्रोपेगैंडा फिल्म होती है. लेकिन प्रोपेगैंडा को लेकर बरती जाने वाली सजगता अगर अतिरिक्त उत्साह में बदल जाए तो वही होता है जो धुरंधर-2 में हुआ है- तथ्य बेमानी हो जाते हैं, इतिहास अप्रासंगिक हो जाता है और फिल्म तमाशा बन जाती है.
एक झटके में 500 और एक हजार के नोट बंद करने के उस फैसले के बाद पूरा देश अगले कई दिन कामकाज छोड़ नोट बदलवाने कतारों में खड़ा रहा. ज्यादा गाज उन मजदूरों पर गिरी, जिनका दिहाड़ी का काम इसलिए छूट गया कि उनके मालिकान के पास देने को पैसे नहीं थे. फिर इन नोटों की जगह 2000 रुपये के जो नोट निकाले गए, उन्हें कुछ ही साल में वापस ले लिया गया, जबकि उनकी छपाई में, उनके बदले हुए आकार के हिसाब से लाखों एटीएम की संरचना बदलने में करोड़ों का खर्च आया था. तब कुछ नामी-गिरामी पत्रकारों ने इन दो हजार के नोटों में चिप भी खोज निकाले थे जिनका बाद में तमाशा बना.
धुरंधर-2 उसी उत्साह का विस्तार है- इस लिहाज से मौलिक भी नहीं कि ठीक इसी आइडिया पर कुछ ही दिन पहले एक वेब सीरीज बन चुकी है. उस वेब सीरीज को देख लें तो धुरंधर 2 में दिखने वाला नोटों का कारखाना और उससे नोट भारत तक पहुंचाने की प्रक्रिया बिल्कुल बच्चों का खेल लगेगी. उस सीरीज में भी प्रधानमंत्री हैं- अपनी असली क्लिप के साथ नहीं, बल्कि एक अभिनेता द्वारा अभिनीत.
'अवरोध' नाम की इस वेब सीरीज के 9 एपिसोड देख लीजिए- यह कहने की इच्छा होगी कि धुरंधर ने उसकी नकल की है- खराब नकल. वहां भी यही कहानी है पाकिस्तान से आईएसआई एक शख्स के साथ मिलकर भारत में आरडीएक्स भी भेज रही है और अलग-अलग आतंकी गुटों को अलग-अलग ढंग से नकली नोट भिजवा रही है. इसके बाद खुफिया एजेंसियां प्रधानमंत्री को सलाह देती हैं और प्रधानमंत्री नोटबंदी का एलान कर इस योजना को नाकाम कर देते हैं.
धुरंधर-2 ने नोटबंदी के साथ जो बातें और जोड़ दी हैं, वह भारत की चुनाव प्रक्रिया और न्याय प्रक्रिया दोनों का अपमान और उपहास करती लगती हैं. ऐसा लगता है जैसे पाकिस्तान की भारत में चुनावों में इतनी घुसपैठ है कि वे लोग नतीजे तय किया करते हैं. नोटबंदी के बाद एक किरदार नाटकीय ढंग से रोता है कि इस चायवाले ने बड़ी मुश्किल पैदा कर दी है.
दूसरी बात कि इस नोटबंदी के लिए पाकिस्तान के एजेंट के रूप में जिसे दिखाया गया है, वह अतीक अहमद है. सबको पता है कि अतीक अहमद भारतीय राजनीति के दुखद अपराधीकरण का एक प्रतीक चेहरा था और वैसे चेहरे तमाम दलों में भरे पड़े हैं. लेकिन फिल्म में अतीक अहमद का पाकिस्तान से कनेक्शन दिखाया जाता है और यह इशारा किया जाता है कि उसको खुफिया एजेंसियों के इशारे पर पुलिस हिरासत के दौरान ही मारा गया.
अब क़ानूनी रास्तों के खिलाफ चल पड़ी इस मुठभेड़ संस्कृति को मास्टर स्ट्रोक बताने वाली फिल्म पर कितना गंभीर हुआ जाए. फिल्म पर दूसरा इल्जाम बहुत ज्यादा हिंसा का है. दरअसल लोग अपने इल्जाम के लिए भाषा नहीं ढूंढ़ पा रहे हैं. हिंसा इन दिनों फिल्मों और वेब सीरीज में आम है. क्रूर से क्रूर और सिहराने वाले दृश्य कई जगह दिखाई पड़ते हैं. तो धुरंधर-2 से शिकायत बहुत ज्यादा हिंसा की इस अर्थ में नहीं है कि वह बहुत क्रूर और डरावनी है, बल्कि इस अर्थ में है कि वह ऊबाऊ ढंग से लंबी है और ज्यादातर हिस्सों में फिल्म की कहानी को ही विस्थापित करती चलती है.
आधी से ज़्यादा फिल्म में गोलियों की तड़तड़ाहट, बमों के धमाके, चाकू-छुरे, कटार या तरह-तरह के हथियारों से होने वाले वार ही मिलते हैं. एक दृश्य में एक शख़्स कटे हुए सिर को फुटबॉल की तरह किक मारता दिखता है. तो वीएफएक्स से परिचित लोगों और दर्शकों के इस दौर में ऐसी हिंसा न विचलित करती है न हैरत में डालती है, बस वह कोफ्त पैदा करती है और यह चिंता भी कि भारतीय दर्शकों को क्या हो गया है.
असली सवाल यही है भारतीय सिने दर्शकों को क्या हो गया है? इसका जो जवाब है, वह उनकी भावनाओं को आहत कर सकता है. लेकिन वह भी देना ही पड़ेगा. दरअसल यह आंखों पर चढ़ा हुआ ‘फेक' किस्म की देशभक्ति का चश्मा है जिसकी वजह से कोई तथ्य या तर्क दिखाई नहीं पड़ता. देशभक्त होना आसान काम नहीं है. अगर आप वाकई देशप्रेमी हैं तो आपको बहुत सारे जरूरी सवाल पूछने होंगे, बहुत सारी बेईमानियों के खिलाफ खड़ा होना होगा.
आप अगर संविधान का सम्मान करते हैं तो किसी भी तरह के भेदभाव को सहन नहीं करेंगे, किसी भी तरह के भ्रष्टाचार में लिप्त नहीं होंगे, किसी भी तरह की सांप्रदायिकता को खारिज करेंगे. लेकिन यह आसान नहीं है. आप सारी बेईमानियां करेंगे, देश के साथ दगा करेंगे और क्रिकेट मैच के दौरान गाल पर तिरंगा लगा कर या पाकिस्तान के खिलाफ नारा लगा कर देशभक्त हो जाएंगे. इसके दो चिंताजनक पहलू और हैं जो इस फिल्म में भी दिखते हैं. पाकिस्तान की भीड़ वह नारा लगा रही है जो कुछ उन्मादियों ने कभी भारत में लगाया था- ‘सिर तन से जुदा' वाला.
दूसरी बात यह बताई जा रही है कि यह नया भारत है, घर में घुस कर मारता है. जाहिर है, राजनीतिक तौर पर यह बयानबाजी कौन करता है- यह बताने की जरूरत नहीं. भारतीय संदर्भ में यह बहुत विडंबना भरा संवाद है. साल 2015 में अखलाक के घर में घुस कर उन्हें मारा गया. मुकदमा उल्टा उन्हीं के परिवार वालों पर चला. तो यह नया भारत घर में घुस कर ही नहीं, सड़क पर दौड़ा कर भी, जीप से बांध कर भी, ट्रेन में बैठे हुए भी किसी को मार सकता है. कभी बीफ खाने के संदेह में तो कभी तिरंगे का अपमान करने के संदेह में. न्याय तो यह नया भारत खुद कर डालता है- बुलडोजर न्याय के रूप में, एनकाउंटर कल्चर के रूप में.
तो यह जो नया मानस बन रहा है, कला-साहित्य-संस्कृति से विहीन, फिल्म की कलात्मकता के खयाल से कोसों दूर- धुरधंर सीरीज उसी की फिल्म है. यही भारत अपने शनिवार-इतवार इस फिल्म पर न्योछावर कर रहा है, उसे साल की सबसे बड़ी शुरुआत वाली फिल्म बना रहा है. हालत यह है कि फिल्म गंदी गालियों से भरी पड़ी है. इन गालियों का भी बिल्कुल जुगुप्सामूलक इस्तेमाल है.
संजय दत्त जब ऐसी गालियां देता है तो हॉल में हंसी सी तैर जाती है. यह गालीबाज देशभक्ति उस संस्कारप्रिय भारतीयता का विलोम है जो अपने बच्चों को ऐसी भाषा से दूर रखती है. खतरा यह है कि ऐसी टिप्पणी भी किसी की भावनाओं को आहत कर सकती है और इस टिप्पणीकार को नए भारत का पवित्र कोप झेलना पड़ सकता है. मगर यह खतरा उठा कर यह बताना तो होगा कि दरअसल जो कुल मिलाकर ढाई-तीन घंटे की फिल्म होनी चाहिए थी, उसे सात घंटे तक दिखा कर, उसके दुगुने दाम वसूल कर धुरंधर-2 ने वाकई साबित किया है कि वह डबल धुरंधर है.
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