हिंदी सिनेमा में कई गानों को लोक गीत से बनाया गया है. यह वो गाने हैं जो सालों से फिल्मों में इस्तेमाल किया जाता है. 60 साल पहले ऐसे आया गाना आया था, जो सांवले सैयां पर बना. एक समय ऐसा था इस गाने की रेडियो पर काफी डिमांड होती थी. इस गाने का नाम ‘पान खाये सैंया हमारो' है, जो पहली बार साल 1966 की फिल्म तीसरी कसम में सुनने को मिला था. जो हिंदी सिनेमा की सदाबहार फिल्म है.
आशा भोसले की आवाज और शैलेंद्र के बोल
‘पान खाये सैंया हमारो' गाने को आशा भोसले की छेड़खानी भरी आवाज, शैलेंद्र के बोल और शंकर-जयकिशन की धुन ने अमर बना दिया. वहीदा रहमान के नाटक वाले अंदाज में यह गाना न सिर्फ दर्शकों को झूमने पर मजबूर करता था, बल्कि हीराबाई के किरदार को जीवंत कर देता था. फिल्म व्यावसायिक तौर से फ्लॉप रही, लेकिन यह गाना क्लासिक बन गया. शैलेंद्र ने यह गाना शुरुआत में एसडी बर्मन के लिए सोचा था, जिन्होंने हमेशा पान खाया और उनके मलमल के कुर्ते पर दाग लग जाते थे. बाद में यह शंकर-जयकिशन को मिला और जादू हो गया.
तीसरी कसम के बारे में
‘पान खाये सैंया हमारो' लोक धुन, ढोलक और बांसुरी के साथ बना है. तीसरी कसम फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी ‘मारे गये गुलफाम' पर आधारित है. राज कपूर ने हीरामन का किरदार निभाया, जबकि वहीदा रहमान हीराबाई बनीं. तीसरी कसम का निर्देशन बासु भट्टाचार्य ने किया है. राज कपूर ने दोस्ती के नाते सिर्फ एक रुपये फीस ली और वहीदा रहमान ने बिना पैसे के काम किया. फिल्म बॉक्स ऑफिस पर हार गई, लेकिन राष्ट्रीय पुरस्कार जीता. शैलेंद्र को भारी नुकसान हुआ.
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