मुंबई जैसे बड़े शहरों में अपना घर होना आज भी लाखों लोगों का सपना है. कोई बेहतर नौकरी की तलाश में यहां आता है, तो कोई अपने परिवार के लिए एक छोटा-सा आशियाना बनाने की उम्मीद लेकर पहुंचता है. लेकिन शहर की चमक-दमक के पीछे किराये के मकान, महंगे घर और अकेलेपन की अपनी कहानी भी है. हिंदी सिनेमा ने इस दर्द को कई बार पर्दे पर उतारा है, लेकिन 70s की फिल्म 'घरौंदा' का गाना 'एक अकेला इस शहर में' आज भी इस एहसास को बेहद सादगी से बयां करता है. इस गीत का जादू ऐसा है कि इसे सुनने लगे तो यादें आपको कहां-कहां ले जाएंगी, आप खुद ही समझ नहीं पाएंगे. अगर फिल्म की आईएमडीबी रेटिंग की बात करें तो यह 10 में से 7.2 है.
शहर में अकेले रहने का दर्द
घरौंदा फिल्म का 'एक अकेला इस शहर में' सिर्फ एक फिल्मी गीत नहीं, बल्कि उस व्यक्ति की भावनाओं को सामने लाता है, जो भीड़ के बीच रहते हुए भी अकेला महसूस करता है. शहर में रहने के लिए जगह तलाशना और जिंदगी में अपनी पहचान बनाना इस गाने के इमोशनल पहलू को खास बनाता है. 'घरौंदा' में नौकरी, आर्थिक सुरक्षा और अपना घर बनाने की इच्छा जैसे विषयों को छुआ गया है. दौर बेशक 70s का रहा हो या आज का, तब भी शहरों में रहने वाले मध्यमवर्गीय लोगों के लिए घर खरीदना आसान नहीं था. आज भी महानगरों में बढ़ती आवास लागत और किराये की चुनौतियों के बीच चीजें पहले से ज्यादा ही मुश्किल हुई हैं. इसलिए 49 साल बाद भी ये गाना किसी तरह से पुराना नहीं लगता है.
गुलजार के बोल, जयदेव का म्यूजिक, भूपिंदर की आवाज
'एक अकेला इस शहर में' के बोल गुलजार ने लिखे थे और म्यूजिक जयदेव ने इसकी धुन तैयार की थी. गाने को भूपिंदर सिंह की आवाज में खास पहचान मिली. उनकी गंभीर और इमोशनल गायकी गीत के अकेलेपन वाले एहसास को और गहरा करती है. गुलजार के शब्दों में शहर की जिंदगी का ऐसा पहलू सामने आता है, जिसे समझने के लिए किसी बड़े संवाद की जरूरत नहीं पड़ती. काम और रोजमर्रा की भागदौड़ के बीच अपने लिए एक जगह तलाशता इंसान इस गीत में खुद को देख सकता है...
एक अकेला इस शहर में
रात में और दोपहर में
आब ओ दाना ढूंढता है
आशियाना ढूंढता है
एक अकेला इस शहर में
रात में और दोपहर में
आब ओ दाना ढूंढता है
आशियाना ढूंढता है
एक अकेला इस शहर में
दिन खाली खाली बर्तन है
दिन खाली खाली बर्तन है
और रात है जैसे अंधा कुआं
इन सूनी अंधेरी आंखों में
आंसू की जगह आता है धुआं
जीने की वजह तो कोई नहीं
मरने का बहाना ढूंढता है
एक अकेला इस शहर में
रात में और दोपहर में
आब ओ दाना ढूंढता है
आशियाना ढूंढता है
एक अकेला इस शेहर में
इन उम्र से लंबी सडकों को
इन उम्र से लंबी सडकों को
मंजिल पे पहुंचते देखा नहीं
बस दौड़ती फिरती रहती हैं
हमने तो ठहरते देखा नहीं
इस अजनबी से शहर में
जाना पहचाना ढूंढता है
एक अकेला इस शहर में
रात में और दोपहर में
आब ओ दाना ढूंढता है
आशियाना ढूंढता है
एक अकेला इस शहर में...
100 दिन तक सिनेमाघरों में टिकी रही थी ये फिल्म
साल 1977 में 'घरौंदा' फिल्म रिलीज हुई थी. इस फिल्म के डायरेक्टर भीमसेन थे. इसमें अमोल पालेकर, जरीना वहाब, जलाल आगा और श्रीराम लागू लीड रोल में नजर आए. फिल्म की कहानी 70 के दशक के महानगर में रहने वाले मध्यवर्गीय लोगों की उम्मीदों, रिश्तों और आर्थिक परेशानियों के इर्द-गिर्द बुनी गी थी. फिल्म मशहूर लेखक शंकर शेष की कहानी पर आधारित थी. जिसका स्क्रीनप्ले गुलजार ने लिखा था और इसके डायलॉग भूषण बनमाली के थे. फिल्म 17 अगस्त 1977 को रिलीज हुई थी. फिल्म ने सिनेमाघरों में 100 दिन पूरे किए थे. फिल्म 1977 की सरप्राइज हिट थी.
आज जब लोग काम, रिश्तों और बेहतर भविष्य की तलाश में अपने शहर से दूर जाते हैं, तब 'घरौंदा' का यह गाना उन्हें उस संघर्ष की याद दिलाता है. यही वजह है कि लगभग 5 दशक बाद भी यह गाना इमोशनल कर देता है.
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