This Article is From Mar 01, 2022

युद्ध ख़त्म होने से पहले हार चुका है रूस...

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Priyadarshan

क्या यूक्रेन रूस के लिए दूसरा अफ़ग़ानिस्तान साबित होने जा रहा है? अभी तक तो वह लोहे का चना साबित हुआ है जिसे चबाने में रूसी सैनिकों के दांत टूटे जा रहे हैं.सोशल मीडिया में एक रूसी सैनिक का मोबाइल संदेश घूम रहा है जिसने मौत से ठीक पहले अपनी मां को लिखा है, ‘ममा, ये बेहद मुश्किल है.मैं यूक्रेन में हूं.यहां एक असली लड़ाई चल रही है.मैं डरा हुआ हूं. हम सारे शहरों पर एक साथ बम बरसा रहे हैं- यहां तक कि नागरिकों को भी निशाना बना रहे हैं. हमें बताया गया था कि वे हमारा स्वागत करेंगे, जबकि वे बख्तरबंद गाड़ियों के आगे लेट जा रहे हैं कि हम उनके ऊपर से गुज़रें. वे हमें फासिस्ट कहते हैं, मां ये बहुत मुश्किल है।‘ इसके कुछ ही समय बाद उस सैनिक की मौत हो गई और उसके मोबाइल से मिला ये संदेश संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में यूक्रेन के राजदूत ने सोमवार को पढ़ा. 

तो यह इस युद्ध की हक़ीक़त है.बेशक, अपनी विशाल सेना और सैन्य सामग्री की बदौलत रूस यूक्रेन को तहस-नहस कर देगा.वहां उसको वैसे प्रतिरोध नहीं झेलने होंगे जैसे उसने अफ़ग़ानिस्तान में झेले थे. लेकिन अफ़ग़ानिस्तान ही वह मोर्चा था जिसने पहले से आर्थिक संकट झेल रहे सोवियत संघ को भीतर से बिल्कुल खोखला कर डाला. याद कर सकते हैं कि यह वह दौर था जब सोवियत रूस और अमेरिका के बीच हथियारों की होड़ ज़मीन से उठ कर आसमान तक जा पहुंची थी और स्टारवार्स जैसे बेहद ख़र्चीले कार्यक्रमों की वजह से दोनों हांफ रहे थे. आसमान तक की इस दौड़ में सोवियत संघ पहले गिर गया क्योंकि उसने अचानक अपने कंधों पर अफ़गानिस्तान का बोझ भी लाद लिया. सोवियत संघ के गिरते ही अमेरिका ने पहला यह काम किया कि रुक कर लंबी सांस ली और हथियारों की होड़ से पीछे हटने का एलान किया. 

सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस और सोवियत खेमे को अपने बिखराव से उबरने में दो दशक लग गए. रूस अपनी प्राकृतिक संपदा की बदौलत एक बार फिर मजबूत हो रहा था कि अब उसने अपने लिए यूक्रेन का संकट पैदा कर लिया है. इसमें शक नहीं कि इस संकट के उकसावे के लिए कुछ ज़िम्मेदार यूक्रेन भी है और कुछ अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिम की वे ताक़तें जो रूस पर एक तरह की घेराबंदी डाल उसके भीतर असुरक्षा बोध पैदा कर रही थीं. रूस को लगा कि वह अपनी ताक़त दिखाकर पश्चिम की इस धौंस पट्टी से निजात पा लेगा. 

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लेकिन ताक़त के इस खेल में पुतिन ताक़त की सबसे महत्वपूर्ण सैद्धांतिकी भूल गए.जाने-माने अमेरिकी समाजशास्त्री रॉबर्ट बेयर्स्टेड ने 'ऐन अनालिसिस ऑफ़ सोशल पावर' में लिखा है कि शक्ति बल प्रयोग की योग्यता है न कि उसका वास्तविक प्रयोग. वे यह भी कहते हैं कि कई बार शक्ति का इस्तेमाल उसे बेमानी बना डालता है. यूक्रेन के मामले में यही हुआ. रूस ने बल प्रयोग कर अपनी शक्ति गंवा दी. अब वह एक युद्ध लड़ रहा है जिसके बहुत सारे आयाम खुल गए हैं जो रूस के ही ख़िलाफ़ जा रहे हैं. 

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मसलन, अभी युद्ध का एक हफ़्ता भी नहीं हुआ है कि रूस 5 लाख करोड़ से ज्यादा गवां चुका है.उसके बाज़ार ध्वस्त हैं, उस पर तरह-तरह की पाबंदी है. रूबल लुढ़का हुआ है.अब नाटो के देश शिकंजा कस रहे हैं. उसे खेलों के मैदानों से भी बाहर किया जा रहा है.खुद को तटस्थ मानने और रखने वाले देश भी उसके इस युद्धवादी क़दम के खिलाफ़ हैं.

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दरअसल रूस यह युद्ध ख़त्म होने से पहले हार चुका है.यह उसका अफगानिस्तान ही नहीं, वियतनाम भी साबित हो सकता है. वियतनाम के हौसले के आगे बेहद ताकतवर अमेरिकी सेना बहुत सारी तबाही मचाने के बावजूद अपमानित होकर लौटी.वियतनाम युद्ध अमेरिकी राष्ट्रपतियों के लिए आत्मघाती साबित हुआ. रूस के भीतर पुतिन का विरोध भी शुरू हो गया है.विरोध की एक वजह तो वह साझा अतीत है जिसके चलते रूस के लोगों को यूक्रेन वाले दुश्मन नहीं लगते.दूसरी वजह बेशक, उनकी आर्थिक परेशानियां हैं.पुतिन की सनक या महत्वाकांक्षा की क़ीमत आम रूसी चुका रहे हैं.

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दरअसल यह युद्ध अगर पुतिन हार गए हैं तो जेलिंस्की जीतते दिख रहे हैं.उन्होंने जो हौसला दिखाया है, वह लाजवाब करने वाला है. अमेरिका ने उनको शरण देने की पेशकश की. उन्होंने ठुकरा दिया- कहा कि हथियारों की मदद दे सकते हैं तो दें. यूरोपीय यूनियन की आपात बैठक को वे जब संबोधित करने आए तो सारे नेता खड़े हो गए, सबने उनके स्वागत में तालियां बजाईं. जेलिंस्की ने कभी ऐसे अभिभूत करने वाले स्वागत की कल्पना नहीं की होगी. अब वे यूरोपीय यूनियन में शामिल होने की दावेदारी पेश कर रहे हैं. उनको यूरोपीय संघ ने स्वीकार भी कर लिया है. यह नाटो की सदस्यता मांगने से ज़्यादा विवेकपूर्ण फ़ैसला है. यूरोपीय संघ का हिस्सा बनकर यूक्रेन अपने ऊपर वह छतरी तान सकता है जिसकी उम्मीद उसने नाटो से की थी.

पुतिन के कदम ने दरअसल सबसे ज़्यादा फायदा अमेरिका और नाटो देशों को ही पहुंचाया है. युद्ध हथियारों के सौदागरों के लिए एक सुनहरा मौक़ा होता है. हथियार बेच कर अर्थव्यवस्थाएं सुधर जाती हैं. इस संकट में यूक्रेन की मदद के लिए जो पैसा इकट्ठा किया जा रहा है, वह हथियार सौदागरों की जेब में ही जाना है. लेकिन इस संकट से एक बात सारी दुनिया के लिए समझने की है. मुल्कों के लिए युद्ध पहले की तरह मुनाफ़े के कारोबार नहीं रहे. वे आम नागरिकों के लिए मुसीबत बन कर आते हैं. महंगाई, चीज़ों की क़िल्लत, लोकतंत्र का ख़ात्मा- सब इससे जुड़ते जाते हैं. लेकिन जब युद्ध ज़रूरी नहीं हैं तो हथियार क्यों जरूरी हैं? क्या इसलिए कि आपके पास शक्ति हो और दूसरे इस शक्ति से डरें?  

बेशक, एक हद तक यह तर्क काम करता है. लेकिन फिर हथियार क्या वाकई बचाव कर पाते हैं? क्या रूस हथियारों की वजह से बच पाया? दुनिया की महाशक्ति होते हुए भी सोवियत संघ बिखर गया. चीन की दबंगई अगर दुनिया झेलती है तो इसलिए नहीं कि उसके पास घातक हथियार हैं, बल्कि इसलिए कि वह अपनी मेहनत से अर्जित दौलत का, दूसरे देशों में अपने निवेश का, उनको दिए जाने वाले क़र्ज़ का बिल्कुल हथियारों की तरह इस्तेमाल करता है.एक दौर में परमाणु बमविहीन जापान की भी यही हैसियत थी. आज भी जो आर्थिक शक्तियां हैं, वही असली विश्व शक्तियां हैं. अमेरिका अपनी विराट जीडीपी की वजह से दुनिया पर धौंस जमाता है सिर्फ़ अपने ऐटमी हथियारों से नहीं. तो दरअसल जो लड़ाई आर्थिक मोर्चे पर लड़कर पुतिन बेहतर प्रदर्शन कर सकते थे उसे सामरिक मोर्चे पर लड़ कर उन्होंने गंवा दिया.

लातिविया जैसा 18 लाख की आबादी वाला छोटा सा देश अपने नागरिकों से अपील कर रहा है कि वे चाहें तो यूक्रेन की ओर से लड़ सकते हैं. देर-सबेर ज़ख़्मी रूस को लौटना होगा.लेकिन तब तक यूक्रेन इस तरह चोटिल हो चुका होगा कि उसको फिर से बसने में बरसों लग जाएंगे. अभी जो अमेरिका-यूरोप उसके लिए ताली बजा रहे हैं, वे उसके बाद बेख़बर अपने कारोबार में लग जाएंगे.युद्ध अमेरिका-यूरोप के लिए कोई नया खेल नहीं है- नया यह है कि यह उस यूक्रेन में घटित हुआ है जो मूलतः उसके अपने जैसे लोगों का देश है. वरना सीरिया-इराक-अफ़ग़ानिस्तान को बरसों तक तहस-नहस करने वाले मुल्कों की आंख से आंसू का कोई क़तरा निकलते किसी ने नहीं देखा है.

लेकिन फिर दुहराना होगा- पुतिन हार चुके हैं, रूस हार चुका है, क्योंकि उन्होंने युद्ध नाम की पुरानी पड़ चुकी रणनीति की शरण ली और यूक्रेन को चोट पहुंचाते हुए ख़ुद को भी ज़ख़्मी कर लिया है.यह दुनिया भर में युद्ध की भाषा बोलने वाले, पड़ोसियों को धमकाने वाले राष्ट्राध्यक्षों के लिए भी एक सबक है.