जब देश की नजरें टी-20 विश्व कप पर टिकी हैं, उसी समय घरेलू क्रिकेट में एक ऐसी कहानी लिखी गई है, जिसने सबका ध्यान खींच लिया है। जम्मू-कश्मीर ने बंगाल जैसी मजबूत टीम को हराकर रणजी ट्रॉफी के फाइनल में जगह बना ली है. यह उपलब्धि साधारण नहीं है—करीब 67 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद टीम पहली बार खिताबी मुकाबले में उतरेगी, जहां उसका सामना कर्नाटक जैसी अनुभवी और सशक्त टीम से होगा. इसी सीज़न में उत्तराखंड की टीम भी सेमीफाइनल तक पहुंची. ये घटनाएं सिर्फ खेल परिणाम नहीं हैं, बल्कि भारतीय क्रिकेट के बदलते भूगोल की कहानी कहती हैं. अब क्रिकेट कुछ चुनिंदा महानगरों तक सीमित नहीं रहा; यह खेल देश के दूर-दराज इलाकों तक अपनी जड़ें जमा चुका है.
रणजी ट्रॉफी: परंपरा और प्रतिष्ठा
रणजी ट्रॉफी भारत की सबसे पुरानी और प्रतिष्ठित घरेलू क्रिकेट प्रतियोगिता है, जिसकी शुरुआत 1934 में हुई थी. दशकों तक यह खिताब प्रायः मुंबई, दिल्ली, कर्नाटक या तमिलनाडु जैसी स्थापित टीमों के इर्द-गिर्द घूमता रहा. मुंबई ने 42 बार खिताब जीतकर एक अद्वितीय रिकॉर्ड बनाया है. दिल्ली और कर्नाटक भी कई बार चैंपियन रह चुकी हैं. मुझे पहली बार 1974 में राजधानी के रेलवे स्टेडियम में रणजी ट्रॉफी मैच को देखने का मौका मिला था. मैच था राजस्थान और रेलवे की टीमों के बीच. उस मैच को हजारों दर्शक देख रहे थे. उसमें सलीम दुर्रानी और हनुमंत सिंह जैसे खिलाड़ी खेल रहे थे. उसके बाद दर्जनों रणजी ट्रॉफी के मैच देखे. सब जगह दर्शक मिले. मतलब साफ है कि क्रिकेट के शैदाइयों को अंतरराष्ट्रीय चैंपियनशिप के साथ-साथ रणजी ट्रॉफी में भी दिलचस्पी रहती है। इस बार ये साफ तौर पर देखा जा सकता है.
Add image caption here
उत्तराखंड का भी शानदार प्रदर्शन
सच में इस बार का रणजी सीजन कमाल का है. अब परिदृश्य बदल रहा है। अब जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ और पूर्वोत्तर के राज्य भी दमदार प्रदर्शन कर रहे हैं. यह संकेत है कि भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) का जमीनी स्तर पर निवेश रंग ला रहा है. गांवों और छोटे शहरों में क्रिकेट अकादमियां खुल रही हैं, बेहतर कोचिंग मिल रही है और युवा खिलाड़ी राष्ट्रीय मंच पर अपनी पहचान बना रहे हैं.
जम्मू-कश्मीर: संघर्ष से शिखर तक
इस सीज़न में जम्मू-कश्मीर ने सेमीफाइनल में बंगाल को छह विकेट से हराकर इतिहास रच दिया. बंगाल के पास अंतरराष्ट्रीय अनुभव वाले खिलाड़ी थे, लेकिन युवा जोश के सामने अनुभव फीका पड़ गया। पारस डोगरा की आक्रामक बल्लेबाज़ी और नबी जैसे खिलाड़ियों के प्रदर्शन ने टीम को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया. अब्दुल समद पहले ही इंडियन प्रीमियर लीग में अपनी पहचान बना चुके हैं और युवा खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा बन चुके हैं. जम्मू-कश्मीर के आक्रामक बल्लेबाज अब्दुल समद ने 2020 में सनराइजर्स हैदराबाद (SRH) के साथ अपने आईपीएल करियर की शुरुआत की, जिससे वह आईपीएल में खेलने वाले केंद्र शासित प्रदेश के तीसरे खिलाड़ी बने. वे अपनी हार्ड-हिटिंग और मध्य-क्रम में उपयोगी रन बनाने के लिए जाने जाते हैं और 2025 सीज़न से पहले लखनऊ सुपर जायंट्स (LSG) द्वारा चुने गए.
अब जम्मू-कश्मीर का फाइनल में उनका मुकाबला कर्नाटक से होगा—एक ऐसी टीम, जो अनुभव और संतुलन के लिए जानी जाती है. पर जम्मू-कश्मीर की टीम ने दिखा दिया है कि जज्बा और आत्मविश्वास बड़े नामों से बड़ा हो सकता है. 1959 से रणजी खेलने वाली यह टीम पहली बार फाइनल में पहुंची है, और पूरे राज्य में उत्सव का माहौल है.
उत्तराखंड: सीमित संसाधन, असीम हौसला
देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखंड की टीम ने भी इस सीज़न में सेमीफाइनल तक पहुंचकर सबको चौंकाया. कर्नाटक के खिलाफ उनका मुकाबला ड्रॉ रहा, लेकिन पहली पारी की बढ़त के आधार पर कर्नाटक फाइनल में पहुंचा. उत्तराखंड 2018 से रणजी में हिस्सा ले रहा है, और इतने कम समय में सेमीफाइनल तक पहुंचना बड़ी उपलब्धि है. पहाड़ी इलाकों में सीमित सुविधाओं के बावजूद खिलाड़ियों ने जिस संघर्ष और अनुशासन का परिचय दिया, वह प्रेरणादायक है। स्थानीय कोचों और पूर्व खिलाड़ियों ने भी प्रतिभाओं को निखारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.
क्रिकेट का लोकतंत्रीकरण
यह बदलाव क्यों आ रहा है? क्योंकि भारतीय क्रिकेट अब अधिक समावेशी और लोकतांत्रिक हो चुका है. पहले बेहतरीन सुविधाएं केवल महानगरों तक सीमित थीं, लेकिन अब आईपीएल जैसे मंचों ने तस्वीर बदल दी है. आईपीएल के टीमों के लोग छोटे शहरों और दूरस्थ क्षेत्रों में जाकर प्रतिभाएं खोज रहे हैं. जम्मू-कश्मीर के अब्दुल समद जैसे खिलाड़ी इस परिवर्तन का उदाहरण हैं. क्रिकेट अब सिर्फ करियर नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव का माध्यम भी बन रहा है. खासकर जम्मू-कश्मीर जैसे राज्य में, जहाँ लंबे समय तक अशांति का असर रहा, खेल युवाओं को सकारात्मक दिशा दे रहा है. मैदानों में बढ़ती भीड़, स्कूल स्तर पर टूर्नामेंट और लड़कियों की बढ़ती भागीदारी इस बदलाव के स्पष्ट संकेत हैं.
उम्मीद की नई सुबह
1990 के दशक से आतंकवाद और अस्थिरता झेल चुके जम्मू-कश्मीर में क्रिकेट ने उम्मीद की एक नई किरण जगाई है. परवेज रसूल जब 2013 में भारत के लिए खेले थे, तब भी राज्य में गर्व की लहर दौड़ी थी. आज रणजी फाइनल में पहुंचना उस गर्व को कई गुना बढ़ा रहा है. यह सफलता सिर्फ खेल उपलब्धि नहीं, बल्कि आत्मविश्वास की पुनर्स्थापना है. युवा पीढ़ी अब बड़े सपने देखने लगी है और उन्हें साकार करने का साहस भी जुटा रही है. क्रिकेट अकादमियों की संख्या बढ़ेगी, सरकार और निजी संस्थानों का सहयोग मिलेगा, और राज्य की पहचान नई सकारात्मक छवि के साथ उभरेगी.
परिणाम से परे एक ऐतिहासिक यात्रा
जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड की सफलता बताती है कि भारतीय क्रिकेट का भविष्य विविध और व्यापक है. अब यह खेल कुछ शहरों का विशेषाधिकार नहीं, बल्कि हर भारतीय की आकांक्षा बन चुका है. फाइनल का परिणाम चाहे जो हो, यह यात्रा अपने आप में ऐतिहासिक है. 24 फरवरी का इंतज़ार सिर्फ एक मैच का इंतज़ार नहीं है—यह उस नए भारत का उत्सव है, जहां पहाड़ों और घाटियों से भी चैंपियन निकलते हैं। क्रिकेट यहां सिर्फ खेल नहीं, बल्कि उम्मीद, एकता और बदलाव का प्रतीक बन चुका है.
(इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)














