Opinion: अमेरिका के साथ खड़े होने की भारी कीमत चुका रहे खाड़ी देश

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Kanwal Sibal

ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की राजनीतिक हत्या की गंभीरता को कम करके नहीं आंका जा सकता. ईरान ने अमेरिका के खिलाफ कोई आक्रामकता नहीं दिखाई थी, फिर भी उसके शीर्ष नेता और जनरलों को मौत के घाट उतार दिया गया. ईरान अमेरिका या इजरायल के खिलाफ किसी सैन्य कार्रवाई की योजना तक नहीं बना रहा था, ऐसे में इजरायल का एहतियाती (pre-emptive) स्ट्राइक का दावा सही नहीं ठहराया जा सकता.

अमेरिका और इजरायल ने ईरान के ऊपर हमला ऐसे समय किया, जब ओमान की मध्यस्थता में अमेरिका-ईरान के प्रतिनिधियों के बीच 'गंभीर और सार्थक' राजनयिक वार्ता चल रही थी. ओमान के विदेश मंत्री ने एक अमेरिकी न्यूज चैनल पर इंटरव्यू में साफ कहा था कि ईरान अपने परमाणु प्रोग्राम, यूरेनियम संवर्धन (एनरिचमेंट), परमाणु सामग्री के जखीरे और IAEA के निरीक्षण जैसी अमेरिका की सभी मांगों को मानने के साथ ही कभी भी परमाणु हथियार न बनाने का औपचारिक वादा करने को तैयार कर चुका है. उनकी मानें तो ईरान 2015 में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ हुए परमाणु समझौते की रियायतों से भी आगे बढ़ गया था. खुद IAEA के प्रमुख इन वार्ताओं में शामिल थे और अगली टेक्निकल लेवल की बातचीत जिनेवा में होने पर भी सहमति बन गई थी.

लेकिन इससे पहले कि ये वार्ता हो पाती, राष्ट्रपति ट्रंप ने राजनयिक प्रयासों को दरकिनार करके ईरान पर हमला बोलने का फैसला कर लिया. ये दूसरी बार है जब ट्रंप ने बातचीत के बीच में ईरान पर अटैक का निर्णय लिया. इससे पहले पिछले साल जून में भी बातचीत के बीच हमला किया गया था, तब 12 दिन तक युद्ध चला था.

ईरान नरम, अमेरिका सख्त

ईरान के परमाणु मुद्दे को सही परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए. ईरान ने अप्रसार संधि (NPT) पर दस्तखत किए हैं, जिसके तहत उसे शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए यूरेनियम एनरिचमेंट का अधिकार है. ईरान इस अधिकार को छोड़ना नहीं चाहता था, हालांकि अमेरिका के साथ हालिया बातचीत में उसने संवर्द्धन की सीमा पर नरमी की बात कही, जो इससे पहले उसने कभी नहीं किया था.

सही-गलत का कोई साफ पैमाना नहीं

अगर ईरान की क्षेत्रीय भूमिका अमेरिका के लिए समस्या है तो ईरान भी अमेरिका-इजरायल की क्षेत्रीय भूमिका, खासतौर से इजरायल के विस्तारवाद को समस्या मान सकता है. इन मामलों में सही या गलत का कोई स्पष्ट फैसला नहीं किया जा सकता. हालांकि इतना कहा जा सकता है कि ईरान ने खुद को इजरायल के सबसे बड़े विरोधी और फिलिस्तीनी मुद्दे के मुखर समर्थक के रूप में पेश करके एक गंभीर रणनीतिक गलती की है. अरब देशों के नेता फिलिस्तीन मसले को जितना सपोर्ट कर रहे थे, ईरान उससे भी आगे निकल गया था. चाहे खुले तौर पर हो या गुपचुप तरीके से, अरब देश इजरायल के प्रति ज्यादा खुले रहे हैं. ऐसे में इजरायल और अमेरिका दोनों ही ईरान को इजरायल के क्षेत्रीय प्रभुत्व की स्वीकृति में मुख्य बाधा मानते हैं.

क्या खाड़ी देशों का मोहभंग हो रहा है?

ट्रंप की रणनीति रही है कि वह ईरान में जमीनी सेना उतारे बिना वहां सत्ता परिवर्तन कराएं और इसके लिए वह देश-विदेश में मौजूद ईरान के विरोधी तत्वों को प्रोत्साहित करते रहे हैं. उनकी इस रणनीति पर गंभीर सवाल उठाए जा सकते हैं. क्षेत्र के कई अन्य देशों में अमेरिका की तरफ से सत्ता परिवर्तन के पहले किए गए प्रयास बुरी तरह नाकाम रहे हैं, चाहे इराक हो, लीबिया हो या फिर सीरिया. इसकी वजह से राजनीतिक अस्थिरता, विभाजन, हिंसा, उग्रवाद, आर्थिक संकट और शरणार्थियों का पलायन ही बढ़ा है. यह साफ नहीं है कि ट्रंप और उनके सलाहकार ऐसा क्यों मानते हैं कि ईरान के अस्थिर होने पर जो हालात बनेंगे, उन्हें वह संभाल लेंगे.

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ईरान बार-बार सार्वजनिक रूप से चेतावनी देता रहा कि अगर उसके ऊपर हमला हुआ तो वह क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाएगा. ये ठिकाने ही अमेरिका के एक क्षेत्रीय शक्ति के रूप में उभार और खाड़ी देशों को ईरान से सुरक्षा प्रदान करने की इमेज को मजबूत बनाते हैं. इसमें हैरानी नहीं होनी चाहिए कि ईरान अब यूएई, कतर, बहरीन, सऊदी अरब और यहां तक कि ओमान में भी अमेरिकी ठिकानों और अन्य जगहों पर हमले कर रहा है. इससे हालांकि इन देशों में घबराहट पैदा हो गई है. वो सोच रहे थे कि उनके यहां मौजूद अमेरिकी अड्डे  उन्हें सुरक्षा प्रदान करेंगे. लेकिन अब वो देख रहे हैं कि अमेरिकी ताकत और मौजूदगी उन्हें सुरक्षा प्रदान करने के लिए काफी नहीं है.

क्या इसका पहले से अंदेशा नहीं था?

मुमकिन है कि खाड़ी देशों को इस बात का यकीन न हो कि ईरान उन्हें भी निशाना बनाने से नहीं चूकेगा. उन्होंने सोचा होगा कि ईरान हमले की स्थिति में इजरायल और इलाके में तैनात अमेरिकी सुरक्षा बलों के खिलाफ जवाबी कार्रवाई तक सीमित रहेगा. यूएई का ईरान के साथ बड़े पैमाने पर व्यापार हैय उसकी धरती पर बड़ी संख्या में ईरानी नागरिक रहते हैं. ईरान और सऊदी अरब के बीच भी राजनयिक संबंध बहाल हो चुके हैं.

ईरान अब अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है. खाड़ी देशों को इतनी उम्मीद नहीं थी कि ईरान उन आर्थिक केंद्रों को भी निशाना बनाएगा, जिससे उनका व्यापार प्रभावित होगा. हवाई अड्डों पर ड्रोन अटैक करेगा, जिससे हवाई यातायात ठप हो जाएगा. इस सबका गंभीर असर आर्थिक गतिविधियों, पर्यटन, लॉजिस्टिक्स और माल की आवाजाही पर पड़ रहा है. इसकी वजह से भारी आर्थिक नुकसान हो रहा है. क्षेत्र की स्थिरता सवालों में आ गई है. जो विदेशी निवेशक और उद्यमी वहां खिंचे चले आते थे, उनका विश्वास हिल गया है.

दांव पर बहुत कुछ है

ईरान के हमलों के परिणाम लंबे समय तक भुगतने होंगे. खाड़ी देश चाहेंगे कि वो भविष्य में खुद को ईरानी ताकत से और अधिक सुरक्षित बनाएं. सुरक्षा को लेकर क्या व्यवस्थाएं उभरेंगी, यह भविष्य की गर्त में है.

होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को अवरुद्ध करने से तेल का व्यापार बाधित हो रहा है. इससे तेल की कीमतों में उछाल आ रहा है.  भारत जैसे देशों के लिए यह एक बड़ा झटका हो सकता है. तेल और गैस की सप्लाई ही नहीं, खाड़ी में बड़ी संख्या में रहने वाले प्रवासी भारतीय, और वहां से भारत में आने वाला पैसा (remittances) भी प्रभावित हो सकता है. इस वक्त जो कुछ हो रहा है, उसके नतीजे हमारे लिए गंभीर हो सकते हैं. इस युद्ध का रुकना हमारे लिए बहुत जरूरी है.

ईरान पर अमेरिका-इजरायल के हमले को लेकर भारत का बयान मौन रहा है. हमने हमले की निंदा नहीं की है, यह समझ में आता है क्योंकि हमने यूक्रेन में रूसी सैन्य कार्रवाई की भी निंदा नहीं की थी. आगे चलकर ईरान का मुद्दा संयुक्त राष्ट्र महासभा में उठेगा, जहां बदलते हालात में हमारी कूटनीति की असली परीक्षा होगी.

(डिस्क्लेमर: कंवल सिब्बल भारत के विदेश सचिव रहे हैं और उन्होंने तुर्की, मिस्र, फ्रांस और रूस में भारत के राजदूत के रूप में सेवाएं दी हैं. इसके अलावा उन्होंने वॉशिंगटन में डिप्टी चीफ ऑफ मिशन की जिम्मेदारी भी संभाली है. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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