कहा जाता है कि जिनके घर शीशे के होते हैं, वे दूसरों पर पत्थर नहीं फेंकते. लेकिन सियासत में यह कहावत अक्सर उल्टी पड़ जाती है, यहां पत्थर बाहर से कम, अंदर से ज़्यादा चलते हैं. दिलचस्प है कि एक तरफ राहुल गांधी उत्तर प्रदेश में दलित वोटरों को लुभाने के लिए दलित नेता स्वर्गीय कांशीराम को भारत रत्न देने की पैरवी कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ बिहार में राज्यसभा चुनाव के दौरान अपनी ही पार्टी में सेंध लग जाती है. सबसे गौर करने वाली बात यह है कि पांच राज्यों में चुनावी बिगुल बज चुका है. माहौल आर-पार की लड़ाई का है. सत्ता पक्ष अपनी उपलब्धियों के दम पर फिर से वापसी की तैयारी कर रहा है, वहीं कांग्रेस सरकार की नाकामी और जनता की नाराजगी के बल पर मुद्दों और असंतोष को हथियार बना रही है. लेकिन चुनाव के समय असम में पार्टी के भीतर भगदड़ क्यों मच गई है? क्या यह राज्य स्तर पर संगठन में असंतोष है? या केंद्रीय स्तर पर क्राइसिस मैनेजमेंट सिस्टम फेल हो गया है? या फिर “ऑपरेशन कमल” की वजह से विरोधी खेमे के नेता चुंबक की तरह खिंच रहे हैं?
असम में कांग्रेस कैसे बीजेपी से चुनाव लड़ेगी?
कहते हैं चुनाव की जंग मैदान में नहीं, मन और संगठन में जीती जाती है, और कांग्रेस फिलहाल प्रदेश में दोनों मोर्चों पर संघर्ष करती दिख रही है. असम विधानसभा चुनाव के बीच कांग्रेस खेमे में उस समय मायूसी की लहर दौड़ गई, जब कांग्रेस के नागांव से सांसद प्रद्युत बोरदोलोई ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया. बोरदोलोई ने पार्टी को अलविदा कहते हुए अपना इस्तीफा राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को भेजा. उन्होंने पत्र में लिखा, “अत्यंत दुख के साथ आज मैं भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सभी पदों, विशेषाधिकारों और प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे रहा हूं.” उन्होंने पार्टी में ‘अपमान' और असंतोष का हवाला दिया. दरअसल, बोरदोलोई पर पहले हमला हुआ था.
आरोप था कि लाहरीघाट विधानसभा सीट से विधायक आसिफ नजर के करीबी व्यक्ति ने उन पर हमला किया था. बाद में जब आरोपी बाहर आया, तो उसका स्वागत आसिफ नजर द्वारा किए जाने की बात सामने आई. अब फिर से आसिफ नजर को टिकट देने की चर्चा है, इसी वजह से बोरदोलोई नाराज बताए जा रहे हैं.बोरदोलोई कोई साधारण नेता नहीं हैं—वे बीजेपी की लहर के बावजूद लोकसभा चुनाव जीतकर आए हैं और असम में कांग्रेस सरकार के दौरान 2001 से 2015 तक मंत्री भी रहे हैं. अब बोरदोलोई ने बीजेपी का दामन थाम लिया है.
कांग्रेस के खाद-बीज से पनपा बीजेपी
कांग्रेस चुनाव से पहले ही संगठन के भीतर लड़ाई हारती नजर आ रही है. आज असम में हिमंता बिस्वा सरमा प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं, जबकि वे कभी कांग्रेस के मजबूत और प्रभावशाली नेता हुआ करते थे. लेकिन पार्टी उनके टैलेंट, मेहनत और राजनीतिक क्षमता को पहचान नहीं सकी. यही वजह रही कि 2015 में उन्होंने कांग्रेस छोड़कर बीजेपी का दामन थाम लिया और आज उनकी पकड़ केंद्र और राज्य, दोनों स्तरों पर मजबूत है. खास बात यह है कि बीजेपी में शामिल होने के कुछ ही समय बाद उन्हें मुख्यमंत्री पद तक पहुंचा दिया गया.हिमंता का जाना सिर्फ एक नेता का जाना नहीं था, बल्कि कांग्रेस के पूरे ढांचे को हिला देने वाला राजनीतिक भूकंप था.हिमंता अकेले ऐसे नेता नहीं हैं जो कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में गए. असम में भूपेन कुमार बोरा, राणा गोस्वामी, कमलाख्या डे पुरकायस्थ, पल्लब लोचन दास, पीयूष हजारिका और जयंत मल्ला बरुआ जैसे कई बड़े और प्रभावशाली चेहरे भी बीजेपी में शामिल हो चुके हैं.
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अपनों ने ही किया पार्टी को कमजोर
चाहे केंद्र हो या राज्य, सवाल यही है कि कांग्रेस के दिग्गज नेता एक-एक कर पार्टी छोड़ते जा रहे हैं, लेकिन कांग्रेस उन्हें रोक क्यों नहीं पा रही है? कभी राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग हो जाती है, तो कभी बहुमत साबित करने के दौरान ही नेता पाला बदल लेते हैं. इतना ही नहीं, कई बार चुनावी मैदान में उतरने से पहले ही नेता पीठ दिखा देते हैं.समस्या सिर्फ नेताओं के जाने तक सीमित नहीं है, बल्कि पार्टी के भीतर केंद्रीय नेतृत्व को लेकर नाराजगी लगातार सामने आती रही है. चाहे ज्योतिरादित्य सिंधिया हों या जितिन प्रसाद, आर.पी.एन. सिंह हों या गुलाम नबी आजाद, कैप्टन अमरिंदर सिंह हों या सुनील जाखड़, कपिल सिब्बल हों या हिमंता बिस्वा सरमा—ऐसे कई बड़े नाम हैं, जो कांग्रेस का साथ छोड़ चुके हैं.
कांग्रेस डैमेज कंट्रोल क्यों नहीं कर पाती है?
सियासत में हार से ज्यादा खतरनाक होता है अपने ही लोगों का भरोसा खो देना. सवाल यह है कि यह भरोसा केंद्रीय नेतृत्व की वजह से टूट रहा है या राज्य स्तर की गुटबाजी इसकी जड़ में है? यह भी बड़ा सवाल है कि राज्य नेतृत्व को वहां के नेता क्यों मानने को तैयार नहीं होते. क्या राज्य नेतृत्व और मौजूदा मुख्यमंत्री खुद गुटबाजी में उलझे रहते हैं, या फिर हर टूट-फूट और विद्रोह के पीछे केंद्रीय नेतृत्व की कमजोरी जिम्मेदार है?और सबसे अहम सवाल ये है कि बीजेपी में ऐसी टूट-फूट क्यों नहीं दिखती? दरअसल, पार्टी के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे हैं, लेकिन कांग्रेस में ज्यादातर फैसले ऊपर से लिए जाते हैं. राज्य इकाइयों और केंद्रीय नेतृत्व के बीच जिस तालमेल, संवाद और भरोसे की जरूरत होती है, उसकी स्पष्ट कमी नजर आती है. अक्सर देखा गया है कि चुनाव के दौरान ही बड़े नेताओं का राज्यों में दौरा बढ़ता है, लेकिन जमीनी हकीकत को सुनने और समझने की निरंतर व्यवस्था कमजोर रहती है. राहुल गांधी जितनी आक्रामकता से केंद्र सरकार को घेरते हैं, उतना ही आरोप उन पर यह भी लगता है कि वे संगठन को उसी मजबूती से खड़ा नहीं कर पाए. इसके अलावा चुनावी रणनीति में निरंतरता और स्पष्टता का भी अभाव दिखता है. फिर सवाल तो यही है कांग्रेस सत्ता पक्ष से कैसे जीतेगी जब अपनी लड़ाई खुद से हारती रहेगी?
डिस्क्लेमर: धर्मेन्द्र कुमार सिंह, चुनाव और राजनैतिक विश्लेषक हैं.














