जबलपुर में हुए क्रूज हादसे की एक तस्वीर पिछले कुछ दिनों से दिल को अंदर तक झकझोर रही है. तस्वीर में एक मां अपने छोटे बच्चे को सीने से लगाए हुए नजर आ रही है. कहते हैं कि उसने आखिरी सांस तक अपने बच्चे को खुद से अलग नहीं किया. इस तस्वीर को देखकर महादेवी वर्मा की कुछ लाइनें याद आ गई, जिसमें वो कहती हैं- मां का हृदय करुणा का वह सागर है, जहां संतान के लिए हर पीड़ा छोटी पड़ जाती है...
उस तस्वीर को देखने के बाद मैं बहुत देर तक सोचती रही कि आखिर कैसे इस महिला ने मौत को सामने देखते हुए भी अपने बच्चे को नहीं छोड़ा. क्योंकि मैं स्विमिंग जानती हूं. इसलिए मुझे पता है कि जब पानी के अंदर सांस रुकने लगती है, तो शरीर जवाब देने लगता है, तब दिमाग सिर्फ एक ही चीज सोचता है कि आखिर खुद को कैसे बचाएं और हाथ पैर खुद-ब-खुद छटपटाने लगते हैं.
लेकिन उस मां ने इसके बावजूद भी अपने बच्चे को नहीं छोड़ा, यहां मौत पर ममता भारी पड़ गई. क्या प्रेम रहा होगा वो? उसके दिमाग में क्या चल रहा होगा? कैसा डर रहा होगा उसके अंदर? कितनी कोशिश की होगी उस मां ने अपने बच्चे को बचाने की. और उससे भी बड़ा कैसी ममता रही होगी, जिसने मौत से लड़ते हुए भी बच्चे की पकड़ ढीली नहीं होने दी. इस तरह के कई सवाल मेरे जहन में बार-बार घूम रहे थे.
शायद यही मां होती है, जो अपने हिस्से की सांसें भी अपने बच्चे को देने से पहले झिझकती नहीं है. खुद के लिए सोचती नहीं है. सच कहूं तो मां को समझना शायद उतना ही मुश्किल है, जितना ये समझना कि पहले अंडा आया था या मुर्गी. ये आप पर गुस्सा भी करती है और आप पर असीम प्रेम भी लुटाती है. बचपन में मारती भी है और इसके बाद खुद रोकर अपने आंचल में छिपाकर चुप भी कराती है. अपनी पसंद भूलकर अपने बच्चे के पसंद की ही चीज बनाती है. एक नई जिंदगी को दुनिया में लाने से लेकर इस समाज में उसे रहने लायक बनाने के लिए मां हर वो कुछ करती है जो उसके बच्चे के हित में होता है.
मां का त्याग
मां सिर्फ एक रिश्ता नहीं है. मां त्याग है. मां वो है जो बिना शोर किए हर दिन थोड़ा-थोड़ा खुद को कम करती रहती है, ताकि उसके बच्चे पूरे रह सकें. और मुझे मां का मतलब किसी किताब ने नहीं समझाया था. मुझे मां का अर्थ समझाया था मैगी ने. हां जी, आपको सुनकर अजीब लगेगा लेकिन सच यही है. अपने बचपन के गलियारे से मुझे हमेशा एक बात याद आती है. जो मैगी और मां के प्यार से जुड़ी हुई है.
मैगी और मां का त्याग
आज के बच्चों को और लोगों को शायद ये बात छोटी लगे, लेकिन एक समय था जब मध्यमवर्गीय परिवारों में मैगी कोई रोज मिलने वाली चीज नहीं होती थी. वो एक छोटी-सी खुशी होती थी. संडे की शाम, जन्मदिन, या फिर किसी खास दिन मिलने वाली ट्रीट थी, जिसका इंतजार कई दिनों तक करना होता था. हम दो भाई-बहन थे. एक पैकेट मैगी आती था और फिर शुरू होता था उसका बंटवारा.
मैं और भाई रसोई में खड़े होकर मैगी बनने का इंतजार करते थे. ऐसा लगता था जैसे दुनिया की सबसे कीमती चीज उसी पतीले में पक रही हो. जो अगर आंखों के सामने से हटी तो चोरी हो जाएगी या कम हो जाएगी. फिर मां दो बड़ी प्लेट और एक छोटी प्लेट लेकर आती थीं. हम दोनों की प्लेट बराबर-बराबर भरती थीं. इतना बराबर कि कहीं एक ढेढ़ी-मेढ़ी मैगी की लाइन भी दूसरी प्लेट में ज्यादा ना चली जाए.
अब तीसरी प्लेट जो मां की होती थी और सबसे छोटी उसमें आखिर में आती थी सिर्फ दो चम्मच मैगी, इसके साथ ही वो पतीला जिसमें मैगी पकाई गई हो. पतीले में चिपकी हुई मैगी को उंगलियों से निकालकर वो खा लेती थीं. उस वक्त तो मैगी खाने की खुशी में ज्यादा सोच नहीं पाती थी और लगता था कि मैगी बच्चों के लिए होती है और मम्मी को कम पसंद है. इसलिए ही मां इसको कम खाती है. लेकिन जैसे-जैसे बड़े हुए फिर धीरे-धीरे समझ आया कि मां को कम नहीं पसंद होता, मां बस अपने बच्चों को ज्यादा खुश देखना चाहती है. वो हर छोटी-बड़ी चीज को अपने बच्चों को ज्यादा देना चाहती है.
बचपन में तो मुझे इतना डर लगता था कि अगर मां बनने पर सिर्फ दो चम्मच मैगी मिलेगी, तो मैं शादी ही नहीं करूंगी. लेकिन आज जब उस क्रूज हादसे वाली मां की तस्वीर देखती हूं, तो लगता है कि मां का त्याग सिर्फ अपनी पसंद छोड़ देना नहीं होता. मां का मतलब है, हर परिस्थिति में अपने बच्चे को खुद से पहले रखना. मां शायद दुनिया की वो इकलौती इंसान होती है, जो अपने बच्चे को बचाने के लिए मौत से भी लड़ जाती है.
मदर्स डे
10 मई को मदर्स डे मनाया जाएगा फिर मन में सवाल आता है कि अगर मां का प्रेम इतना असीम और निस्वार्थ है तो उसको मनाने के लिए एक ही दिन को क्यों चुना गया. हर दिन मां का ही होता है. मदर्स डे शायद इसलिए जरूरी है क्योंकि भागती हुई जिंदगी में हम अपने सबसे जरूरी इंसान को अक्सर 'for granted' ले लेते हैं. ऐसे में ये दिन हमें याद दिलाता है कि आज हम जहां पर भाग रहे हैं और जो जिंदगी जी रहे हैं वो हमें किसने सिखाया है, जिसने हमें यहां पर पहुंचाया, हम अक्सर उसी को सबसे पीछे छोड़ देते हैं.
लेकिन मां को सच में खुश करना है तो सिर्फ सोशल मीडिया पर फोटो डालने से नहीं होगा.
कभी उसके साथ बैठिए.
उसकी बातें सुनिए.
उससे पूछिए कि वो कैसी है.
और एक दिन उसके हिस्से की पूरी मैगी उसे दीजिए.
शायद मां का प्यार कभी चुकाया नहीं जा सकता.
लेकिन उसे महसूस जरूर कराया जा सकता है कि वो सिर्फ 'मां' नहीं… किसी की पूरी दुनिया है.














