नक्सलवाद पर बड़ा मोड़: देवुजी का प्रस्ताव- बैन हटाओ, हथियार हम छोड़ देंगे

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सलमान रावी

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के सबसे बड़े नेता थिप्पिरी थिरुप्ति उर्फ ‘देवुजी'  ने अपने आत्मसमर्पण के बाद तेलंगाना सरकार के सामने जो बातें रखीं उसे केंद्र सरकार और उन राज्यों की सरकारों को गंभीरता से लेना चाहिए जहां नक्सली आंदोलन दशकों से चलता आया है. लंबे अरसे से नक्सलवाद के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान से जुड़े अधिकारियों को लगता है कि शीर्षतम नेता, देवुजी के सुझाव या अपील पर सरकार को गंभीरता से विचार करना ही चाहिए और उसके आलोक में नई नीति भी बनानी चाहिए ताकि नक्सल उन्मूलन सिर्फ बंदूक की नोक और सुरक्षा बलों के अभियान तक ही ना रहे. समाज के उन ज्वलंत मुद्दों को भी संबोधित किया जाना चाहिए जिनकी वजह से वो माहौल बनता है जब कोई ‘हथियार उठाने को बाध्य हो जाए'.

गृह मंत्री अमित शाह तक पहुंची बात

उनकी बातों को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह तक भी पहुंचा दिया गया है. देवुजी, भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के महासचिव थे जिन्होंने 70-वर्षीय नमबला केसवा राव उर्फ बसवराजू के मुठभेड़ में मारे जाने के बाद संगठन की कमान संभाली थी.

उन्होंने इसी साल फरवरी के महीने में आत्मसमर्पण कर दिया था. आत्मसमर्पण के बाद तेलंगाना के मुख्यमंत्री से जब उनकी बात हो रही थी तो उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण बातें सामने रखीं. देवुजी ने मुख्यमंत्री को सुझाव दिया कि भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) पर से ‘अब प्रतिबन्ध हटा लेना चाहिए'.

देवुजी ने क्या सुझाव दिया?

उन्होंने यह भी कहा कि अगर संगठन से प्रतिबंध हटा दिया जाता है और अगर संगठन के कैडर को ‘राजनीतिक स्पेस' दिया जाता है तो ‘जनमुक्ति छापामार सेना' यानी ‘पीएलजीए' को भंग कर दिया जाएगा. रेवंत रेड्डी के साथ उनकी ये चर्चा 27 फरवरी को हुई थी जिसकी तसदीक (पुष्टि) नक्सल विरोधी अभियान में शामिल वरिष्ठ अधिकारियों ने की है.

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जानकार मानते हैं कि देवुजी का ये प्रस्ताव बड़ा महत्वपूर्ण है क्योंकि ये पहला मौका है जब ‘संसदीय राजनीति' को सीरे से खारिज करने वाला संगठन राजनीति की मुख्यधारा में आने की इच्छा प्रकट कर रहा है. जाहिर है, देवुजी ने ये प्रस्ताव अपने मन से नहीं दिया होगा.

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राजनीतिक कैदियों का दर्जा देने की मांग

माओवादियों पर बढ़ रहे दबाव और उनको हुए नुकसान की चर्चा संगठन में शीर्ष स्तर पर निश्चित रूप से हुई ही होगी. ऐसा भी माना जा रहा है कि देवुजी की आत्मसमर्पण की रूपरेखा इसलिए भी बनाई गई होगी ताकि वो संगठन का ये पैगाम सरकार के कर्ताधर्ताओं तक पहुंच जाए. 

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उन्होंने सुझाव दिया कि उनके जो शीर्ष नेता ‘यूएपीए' के तहत गिरफ्तार कर जेल में बंद किए गए हैं, उनकी रिहाई के बारे में सरकार को सोचना चाहिए साथ ही माओवादियों के गिरफ्तार किए गए सभी कैडर को ‘राजनीतिक बंदी' का दर्जा दिया जाना चाहिए.

बंदूक बनाम विचारधारा: असली लड़ाई कहां है?

हमारे सामने 1960 के दशक के अंत का उदाहरण भी है जब पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के नक्सलबारी में किसानों का विद्रोह शुरू हुआ था. यहीं से हथियारबंद भूमिगत आंदोलन का नामकरण हुआ था- ‘नक्सल आंदोलन'. 

तब यह आंदोलन गांव-गांव और शहरों तक पहुंच गया और इसने पश्चिम बंगाल के कॉलेजों में भी अपनी जड़ें जमा ली थीं.

फिर 1970 के दशक में सिद्धार्थ शंकर रे के मुख्यमंत्री रहते हुए इस आंदोलन को ‘क्रूर' तरीके से सैन्य कार्यवाई के जरिए कुचल देने का दावा किया गया था. सैकड़ों आंदोलकारियों, भूमिगत नेता और आंदोलन की विचारधारा के प्रभावित छात्र पुलिसिया कार्रवाई में मारे गए थे. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक साल 1969 से लेकर 1972 तक चले इस अभियान में पांच हजार से अधिक कैडर और नेता मारे गए थे.

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इस अभियान के अंत में आंदोलन के नेता चारू मजूमदार को गिरफ्तार कर लिया गया और हिरासत में उनकी मौत हो गई. पश्चिम बंगाल की तत्कालीन सरकार ने नक्सल आंदोलन की समाप्ति की घोषणा कर दी थी. 

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लेकिन हुआ क्या?

जाहिर तौर पर कुछ नजर नहीं आ रहा था, मगर विचारधारा की जड़ें शहरों और शिक्षा संस्थानों में पनप रही थीं, वो चुपके-चुपके ग्रामीण इलाकों और आदिवासी क्षेत्रों में फैलने लगीं. ये ‘अस्तित्व, आर्थिक असमानता, जल, जंगल जमीन और रोजगार' के लिए संघर्ष का रूप लेने लगी.

मार्च की 31 तारीख को सरकारी फाइलों में ‘नक्सल मुक्त भारत' का ‘लक्ष्य' प्राप्त हो चुका है. मगर अगर हालात की समीक्षा की जाए, तो ये सिर्फ और सिर्फ ‘नक्सली हिंसा' को रोकने की दिशा में काम हुआ है जिसे सुरक्षा बलों के जवानों की कुर्बानी से हासिल किया गया और वो भी सैन्य कार्रवाई के जरिए.

लेकिन विचारधारा का सामना कने के लिए किसी के पास कोई ‘रोड मैप' नहीं है और न ही इसका सामना करने के लिए किसी तरह की कोई राजनीतिक पहल ही शुरू की गयी है.

अब थोड़ा पीछे मुड़ कर देखते हैं. जब नक्सलबाड़ी के आंदोलन को इसी तरह खत्म किया गया था, उस समय भी मार्क्स, लेनिन और माओ की विचारधारा का वैकल्पिक मॉडल तैयार करने के लिए कोई ‘रोड मैप' नहीं बनाया गया.

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इसका परिणाम क्या हुआ?

इसके परिणाम में अस्सी का दशक आते आते भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) – पीपल्स वार ग्रुप का जन्म हो गया. उधर पश्चिम बंगाल और बिहार में भी ‘पार्टी यूनिटी' की स्थापना हुई जबकि भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवाद-लेनिनवादी) ने पश्चिम बंगाल और बिहार में अपने हथियारबंद दस्ते स्थापित कर दिए थे और एक ‘जन युद्ध' का ‘माडल' विकसित कर लिया था.

आज भी काश्तकारों का संघर्ष पूरे भारत में चल रहा है, आदिवासी अपने विस्थान के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं, मजदूर अपनी न्यूनतम मजदूरी और काम के लिए संघर्ष कर रहे हैं. बेरोजगारी और सामाजिक और आर्थिक असमानता की वजह से समाज का निचला तबका संघर्ष कर ही रहा था, वहीं मध्यम वर्ग भी इसी तरह की परिस्थितियों में आ घिरा है.

मार्क्स, लेनिन, माओं के विचारधारा

ऐसे में मार्क्स, लेनिन और माओ की विचारधारा के एक बार फिर पनपने और फैलने का अनुकूल वातावरण बना हुआ है.

पिछले साल अक्टूबर माह में माओवादियों की केन्द्रीय कमिटी के दो नेताओं ने आत्मसमर्पण करने के बाद उनसे पूछताछ कर रहे अधिकारियों के सामने खुलासा किया था कि अगर संगठन के पास चार वर्षों तक कहीं से कोई आर्थिक सहायता नहीं आती है और वो ‘लेवी' भी वसूल करने में अक्षम रहते हैं, तब भी संगठन के पास इतने संसाधन हैं जिससे वो अपने आंदोलन को चार सालों तक निर्बाध्य रूप से खींच सकता है.

हालांकि बस्तर में सुरक्षा बलों ने माओवादियों के गुप्त ठिकानों से छुपा ‘हुआ खजाना' बरामद किया है जिसमे सोना और रुपये भी शामिल हैं. लेकिन यहां ये उल्लेखनीय है कि किसी भी वामपंथी संगठन की तरह ही माओवादियों ने अपनी दीर्घकालिक रणनीति बनायी हुई है, जो आने वाले पचास सालों के लिए उनका प्लान है.

पहले भी किए गए दावे, पर ऐसा नहीं हुआ

पहले नोटबंदी और उसके बाद आए कोविड के दौरान यही कहा जा रहा था कि ‘माओवादी आर्थिक रूप से टूट चुके हैं' और अब उनका संगठन ‘पूरी तरह से घुटनों पर' आ गया है. मगर ऐसा नहीं हुआ.

माओवादी अगर कमजोर पड़े भी हैं तो वो अपनी नीतियों और काम करने के तरीकों की वजह से, न की सिर्फ उनके खिलाफ चले किसी अभियान की वजह से.

वो अपनी मौलिक विचारधारा से भी दूर जाते रहे और क्रूर तरीके अपनाने लगे जिसकी वजह से धीरे धीरे उनके ‘मास बेस' में भी कमी आती चली गई और समर्थन में भी. एक समय पर तो उन्हें कैडर मिलने भी बंद हो गए थे.

1998 में बिहार में सक्रिय भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) पार्टी यूनिटी और पीपल्स वार ग्रुप का विलय और फिर वर्ष 2004 में माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर (एमसीसी) और पीपल्स वार ग्रुप (पीडब्लूजी) के विलय को लेकर ये दावे किए जा रहे कि अब लाल झंडों का नया एकीकृत संगठन यानी भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) इस आंदोलन को और मजबूत करेगा और और अपने प्रभाव के क्षेत्र का विस्तार करेगा.

मुखबिरी से मुठभेड़ तक...

लेकिन असल में हुआ क्या? हुआ ये कि नए संगठन को पीपल्स वार ग्रुप से आए नेताओं और कैडर ने पूरी तरह कब्जे में ले लिया. बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल के कामरेडों को ये संगठन के अहम फैसलों और रणनीति बनाने के काम से बेदखल करते चले गए.

कहा जाने लगा कि कोबाड गांधी जैसे कामरेडों को तेलुगु भाषी कामरेडों ने दरकिनार कर दिया और सुरक्षा बलों को एक-एक के बारे में जानकारी उपलब्ध कराकर या तो उन्हें गिरफ्तार करवा दिया या फिर उन्हें मुठभेड़ में मरवा दिया.

झोला लटकाए कामरेडो की जगह हथियारबंद कमांडर

जन अदालतों को निष्क्रिय कर दिया और जिस तरह विचारधारा को लेकर बगल में झोला टांगे बिहार और पश्चिम बंगाल के कामरेड गांव-गांव घूम घूम कर लोगों को जागरूक करने का काम करते थे- वो खत्म कर दिया गया. उनकी जगह हथियारबंद कमांडरों ने ले ली.

फिर जन अदालतों में जो फैसले जनता किया करती थी वो खत्म कर उन फैसलों को कमांडरों के बंदूक नी नोक के हवाले कर दिया.

न तो पार्टी यूनिटी और ना ही एमसीसी – दोनों संगठन उतने क्रूर नहीं थे जितना क्रूर पीपल्स वार ग्रुप (पीडब्लूजी) का काम करने का तरीका था. उसका कारण ये कि जब श्रीलंका में लिबरेशन टाईगर्स ऑफ तमिल ईलम (एलटीटीई) का सफाया हुआ तो उनके बहुत सारे कारिंदे (कार्यकर्ता) समुद्र के रास्ते भाग कर भारत आ गए और उन्हें पीडब्लूजी का संरक्षण मिल गया.

एलटीटीई के लोगों के जुड़ने से क्रूरता आई

वरिष्ठ पुलिस अधिकारी बताते हैं कि एलटीटीई के लोगों से जुड़ने के बाद ही माओवादियों को विस्फोटकों के इस्तेमाल की तकनीक मिली. न तो पार्टी यूनिटी और ना ही एमसीसी ने कभी पहले अपना आंदोलन चलाने के लिए विस्फोटकों का सहारा लिया था.

कई साल पहले जब मैं पश्चिम बंगाल के जंगलमहल गया था तो मैंने भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के ‘सेंट्रल मिलिट्री कमीशन' के कमांडर इन चीफ कोटेश्वर राव उर्फ किशन जी से बातचीत के दौरान इस बारे में पूछा था. उस समय उन्होंने एक ही जवाब दिया था, “हमारे शत्रु युद्ध के तरीके बदल रहे हैं. इसलिए हमें भी उनका सामना करने के लिए अपनी रणनीति बदलनी पड़ रही है.”

बंदूक, खौफ का हुआ दीर्घकालिक नुकसान

मगर बदली हुई रणनीति से बंदूक और खौफ पैदा कर माओवादियों ने इसका क्षणिक लाभ जरूर लिया. मगर उनको इसका दीर्घकालिक नुकसान हुआ और अब वो ऐसे स्थान पर आ गए हैं जब उनकी पीठ दीवार से जा लगी है.

सरकार के इतने व्यापक अभियान के बावजूद भी अब भी दो जिले सरकारी रिकॉर्ड में ऐसे हैं, जो पूरी तरह ‘नक्सल मुक्त नहीं हो पाए हैं – एक है बस्तर का बीजापुर और दूसरा हैं झारखण्ड का पश्चिम सिंहभूम.

30 मार्च को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इसकी जानकारी सदन को खुद दी थी.

इतने व्यापक अभियान के बाद अगर देश के दो जिले नक्सल मुक्त नहीं हो पाए तो ये किस तरह का संकेत है?   

संकेत स्पष्ट है. न तो माओ से तुंग का कहना है कि ‘बंदूक की नोक से सत्ता हासिल की जा सकती है', न ही अब ये इस दौर में प्रासंगिक है और ना ही विचारधारा को चुनौती देने के लिए सिर्फ और सिर्फ सैन्य अभियान चलाकर इसे खत्म किया जा सकता है. ये एक ‘रक्तबीज' है.

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