ईरान और अमेरिका के बीच परमाणु मुद्दे पर चल रही अप्रत्यक्ष वार्ताओं का दूसरा दौर मंगलवार 17 फरवरी 2026 को जिनेवा में खत्म हुआ.यह बातचीत ओमान की मध्यस्थता में हुई. दोनों पक्षों ने वार्ता को गंभीर, संरचनात्मक और आगे बढ़ने वाली प्रक्रिया बताया है, हालांकि किसी व्यापक या अंतिम समझौते की घोषणा नहीं की गई है.यह बातचीत, ओमान के कूटनीतिक चैनलों के माध्यम से संचालित हुई. ईरानी और अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल सीधे आमने-सामने नहीं बैठे, बल्कि मध्यस्थ देश के अधिकारियों के जरिए संदेशों और प्रस्तावों का आदान-प्रदान हुआ. यह प्रारूप पिछले कुछ महीनों से अपनाया जा रहा है ताकि संवेदनशील मुद्दों पर प्रत्यक्ष टकराव से बचते हुए बातचीत आगे बढ़ सके.
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने वार्ता के बाद जारी एक संक्षिप्त बयान में कहा, ''कुछ मार्गदर्शक सिद्धांतों (Guiding Principles) पर समझ बनी है, जो भविष्य की विस्तृत बातचीत का आधार बन सकते हैं. उन्होंने यह भी साफ किया कि अभी कई तकनीकी और राजनीतिक मुद्दों पर मतभेद बने हुए हैं. वार्ता को आगे बढ़ाने के लिए अतिरिक्त प्रयासों की जरूरत होगी. अमेरिकी अधिकारियों ने भी पुष्टि की है कि बातचीत में प्रगति हुई है, विशेषकर तकनीकी मुद्दों की पहचान और प्राथमिकताओं के निर्धारण में. उन्होंने कहा कि दोनों पक्ष आगे के चरण के लिए प्रस्तावों को लिखित रूप में साझा करेंगे और जल्द ही अगली बैठक की तिथि तय की जाएगी. परमाणु कार्यक्रम, आर्थिक प्रतिबंध, क्षेत्रीय सुरक्षा और तेल आपूर्ति इन सभी मुद्दों ने इस वार्ता को वैश्विक महत्व दिया है.
यह वार्ता ऐसे समय में हो रही है जब पश्चिम एशिया पहले से ही अस्थिरता, क्षेत्रीय संघर्षों और ऊर्जा बाज़ार की अनिश्चितताओं से जूझ रहा है. ऐसे में ईरान और अमेरिका के संबंधों में किसी भी प्रकार का बदलाव केवल द्विपक्षीय मुद्दा नहीं बल्कि वैश्विक आर्थिक और सामरिक संतुलन को प्रभावित करने वाला कारक बन जाता है.
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ईरान अमेरिका में समझौते की कोशिशें
साल 2015 में हुआ परमाणु समझौता, जिसे औपचारिक रूप से Joint Comprehensive Plan of Action कहा जाता है, ईरान और छह विश्व शक्तियों के बीच एक ऐतिहासिक सहमति थी. इसके तहत ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम पर कड़े प्रतिबंध स्वीकार किए और अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण के लिए अपने परमाणु प्रतिष्ठानों को खोला. इसके बदले में उस पर लगे कई आर्थिक प्रतिबंध हटा लिए गए. इस समझौते की निगरानी की जिम्मेदारी इंटरनेशनल एटामिक एनर्जी एजेंसी को दी गई थी. इस संगठन ने कई सालों तक अपनी रिपोर्टों में ईरान के अनुपालन की पुष्टि की. लेकिन 2018 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस समझौते से अमेरिका को अलग कर लिया और अधिकतम दबाव की नीति के तहत कठोर आर्थिक प्रतिबंध फिर लागू कर दिए. इसके बाद ईरान ने भी चरणबद्ध तरीके से समझौते की शर्तों से पीछे हटना शुरू किया. उसने अपने यूरेनियम संवर्धन स्तर को बढ़ाया. यहीं से वर्तमान संकट की शुरुआत मानी जाती है. 2015 से 2026 तक कई दौर की वार्ताएं हुईं. इनमें यूरोपीय देशों और क्षेत्रीय मध्यस्थों की भूमिका रही, लेकिन स्थायी समाधान नहीं निकल सका.
वर्तमान वार्ता में क्या हो रहा है?
हालिया दौर की बातचीत मुख्यतः अप्रत्यक्ष रही है. इसमें मध्यस्थ देशों की भूमिका महत्वपूर्ण है. विशेष रूप से ओमन जैसे देश संवाद के लिए पुल का काम कर रहे हैं. दोनों पक्ष सार्वजनिक रूप से यह कहते रहे हैं कि वे कूटनीतिक समाधान चाहते हैं, लेकिन शर्तों को लेकर मतभेद अब भी बने हुए हैं. अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने संवर्धन स्तर को कम करे, अतिरिक्त निरीक्षण स्वीकार करे और परमाणु गतिविधियों पर पारदर्शिता बढ़ाए. दूसरी ओर, ईरान का कहना है कि जब तक उसे वास्तविक और ठोस प्रतिबंध-राहत नहीं मिलती, तब तक वह बड़े कदम नहीं उठाएगा.
यहां सबसे बड़ा प्रश्न क्रम का है कि पहले कौन कदम उठाए? क्या ईरान पहले अपने कार्यक्रम को सीमित करे या अमेरिका पहले प्रतिबंध हटाए? यही गतिरोध वार्ता को जटिल बनाता है.
परमाणु कार्यक्रम पर विवाद
वर्तमान में ईरान का यूरेनियम संवर्धन स्तर 2015 के समझौते की तुलना में कहीं अधिक है. माना जाता है कि तकनीकी रूप से ईरान की परमाणु क्षमता पहले से अधिक उन्नत हो चुकी है. हालांकि ईरान बार-बार यह दोहराता है कि उसका कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है. अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता इस बात को लेकर है कि संवर्धन का उच्च स्तर 'ब्रेकआउट टाइम' यानी परमाणु हथियार बनाने की संभावित अवधि को कम कर सकता है. ईरान इस आरोप को खारिज करता है और कहता है कि वह परमाणु हथियार बनाने की मंशा नहीं रखता.
परमाणु हथियार तो एक बहाना है वास्तव में अमेरिका पश्चिम एशिया में किसी भी स्वतंत्र शक्ति को उभरने नहीं देना चाहता. अमेरिका का मूल उद्देश्य क्षेत्रीय अराजकता पैदा करना नहीं, बल्कि शक्ति-संतुलन को नियंत्रित रखना है. यह नीति ऐतिहासिक रूप से दिखाई देती है चाहे वह इराक में हस्तक्षेप हो, ईरान पर प्रतिबंध हो या खाड़ी देशों के साथ सुरक्षा साझेदारी. अमेरिकी रणनीति के तीन स्थायी स्तंभ रहे हैं:
- वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री मार्गों की सुरक्षा, विशेषकर होर्मुज स्ट्रेट ( Strait of Hormuz).ॉ
- इज़रायल की सुरक्षा.
- परमाणु प्रसार को रोकना.
यदि कोई क्षेत्रीय शक्ति इन स्तंभों को चुनौती देती है, तो वह अमेरिकी रणनीतिक गणना का केंद्र बन जाती है. ईरान की परमाणु प्रगति और क्षेत्रीय सक्रियता इन तीनों आयामों से जुड़ती है. पश्चिम एशिया में अमेरिका का लक्ष्य पूर्ण नियंत्रण नहीं, बल्कि 'नियंत्रित संतुलन' है. अमेरिका सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात या तुर्की की आर्थिक शक्ति का विरोध नहीं करता, क्योंकि वे उसकी सुरक्षा संरचना के भीतर काम करते हैं. ईरान की स्थिति अलग है, वह स्वयं को स्वतंत्र धुरी के रूप में पेश करता है और अमेरिकी प्रभाव को चुनौती देता है. यही अंतर उसे रणनीतिक चुनौती बनाता है.
वियना में इंटरनेशनल एटामिक एनर्जी एजेंसी के प्रमुख से बातचीत करते रूस, चीन और ईरान के प्रतिनिधि.
प्रतिबंध और आर्थिक दबाव का प्रभाव
अमेरिकी प्रतिबंधों का असर ईरान की अर्थव्यवस्था पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है. तेल निर्यात में गिरावट, बैंकिंग लेन-देन पर प्रतिबंध और अंतरराष्ट्रीय निवेश में कमी ने अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है. ईरान के लिए प्रतिबंध-राहत केवल आर्थिक मुद्दा नहीं बल्कि राजनीतिक प्राथमिकता है. ईरान का तर्क है कि यदि उसे वैश्विक वित्तीय प्रणाली तक सामान्य पहुंच नहीं मिलेगी, तो किसी भी समझौते का लाभ सीमित रहेगा. वहीं दूसरी ओर,अमेरिका का कहना है कि प्रतिबंध उसकी सबसे बड़ी ताकत है और बिना ठोस परमाणु रियायतों के उन्हें हटाना उचित नहीं होगा.
वार्ता के समानांतर सैन्य गतिविधियां भी जारी हैं. फारस की खाड़ी और विशेष रूप से होर्मुज स्ट्रेट में बढ़ी हुई गतिविधियां वैश्विक चिंता का विषय हैं. यह जलडमरूमध्य विश्व तेल आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है. यदि किसी भी कारण से इस क्षेत्र में तनाव बढ़ता है तो तेल की कीमतों में उछाल आ सकता है. यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार इन वार्ताओं पर लगातार नजर रखे हुए है.
अमेरिका की आंतरिक राजनीति
अमेरिका में भी यह मुद्दा राजनीतिक रूप से संवेदनशील है. किसी भी नए समझौते को घरेलू स्तर पर आलोचना का सामना करना पड़ सकता है. पिछले अनुभव ने यह दिखाया है कि प्रशासन बदलने के साथ नीतियां भी बदल सकती हैं. यही कारण है कि ईरान गारंटी की मांग करता है कि भविष्य में समझौता फिर से न तोड़ा जाए. हालांकि अमेरिकी संविधान की संरचना ऐसी कानूनी गारंटी देना कठिन बनाती है. इसलिए कूटनीति में लचीलापन और चरणबद्ध प्रक्रिया की संभावना अधिक दिखाई देती है. लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में तीन मुख्य संभावनाएं सामने आती हैं:
- सीमित या अंतरिम समझौता. इसमें ईरान यूरेनियम संवर्धन को एक निश्चित स्तर पर रोक सकता है. बदले में उसे कुछ आर्थिक राहत मिल सकती है. यह पूर्ण समाधान नहीं होगा, लेकिन तनाव कम कर सकता है.
- लंबा गतिरोध. वार्ता जारी रहे, लेकिन कोई निर्णायक प्रगति न हो. इस स्थिति में तनाव नियंत्रित रहेगा, पर अनिश्चितता बनी रहेगी.
- वार्ता का विफल होना. यदि बातचीत टूटती है और दोनों पक्ष कठोर रुख अपनाते हैं, तो क्षेत्रीय तनाव बढ़ सकता है. हालांकि खुला सैन्य संघर्ष अभी भी कम संभावना वाला विकल्प माना जा रहा है, क्योंकि उसके आर्थिक और सामरिक परिणाम गंभीर होंगे.
तनाव का भारत और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रभाव
ईरान अमेरिका संबंधों का असर भारत सहित कई देशों पर पड़ता है. भारत ऊर्जा आयातक देश है. खाड़ी क्षेत्र भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है. तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है. इसके अलावा, क्षेत्रीय स्थिरता समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा से भी जुड़ी है. यदि तनाव बढ़ता है, तो बीमा लागत और शिपिंग खर्च बढ़ सकते हैं. इसका प्रभाव वैश्विक व्यापार पर पड़ेगा.
फिलहाल दोनों पक्षों के बयान सावधानीपूर्ण आशावाद की ओर संकेत करते हैं. वे सार्वजनिक रूप से यह कह रहे हैं कि बातचीत जारी रहेगी. लेकिन वास्तविक प्रगति इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या वे चरणबद्ध समझौते की दिशा में बढ़ सकते हैं. यह स्पष्ट है कि 2015 जैसा व्यापक और दीर्घकालिक समझौता तुरंत संभव नहीं दिखता.अधिक संभावना इस बात की है कि पहले सीमित दायरे का कोई समझौता हो, जिससे विश्वास बहाली की प्रक्रिया शुरू हो सके.
यह वार्ता केवल परमाणु कार्यक्रम तक सीमित नहीं है. यह मध्य पूर्व की स्थिरता, वैश्विक ऊर्जा बाज़ार और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की दिशा को प्रभावित करने वाली प्रक्रिया है. आने वाले सप्ताह और महीने यह तय करेंगे कि यह संवाद स्थायी समाधान की ओर बढ़ता है या फिर एक और लंबे गतिरोध में बदल जाता है.Suggest SEO, URL and Keywords in English.
(डिस्क्लेमर:अज़ीज़ुर रहमान आज़मी अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के वेस्ट एशिया एंड नार्थ अफ़्रीकन स्टडीज विभाग में पढ़ाते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना ज़रूरी नहीं है.)














