दुबई के लिए इतने अहम कैसे बने भारतीय? तेल से भी पुराना है रिश्ता

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नगमा सहर

अमेरिका-इजरायल और ईरान में छिड़ी जंग के बीच दुबई से लौटे भारतीय जब दिल्ली एयरपोर्ट पर अपने रिश्तेदारों से मिले तो चेहरे पर डर के बीच आंखें नम थीं. कांपती उम्मीदों के साथ हाथ जोड़कर अपने परिजनों का इंतजार करते लोगों के बीच मुझे ऐसे दृश्य देखने को मिले, जिसकी कल्पना तक मैंने कुछ हफ्ते पहले नहीं की थी. मैं खुद हाल ही में काम के सिलसिले में दुबई गई थी. वहां मैंने खुद अपनी आंखों से समृद्धि और उम्मीद की चमक देखी थी. विदेश मंत्रालय द्वारा जारी प्रवासी भारतीयों के आंकड़े बताते हैं कि खाड़ी देशों में अकेले यूएई (UAE) में ही 35.54 लाख एनआरआई (NRI) रहते हैं.

दुबई और भारतीयों का रिश्ता

भारतीयों ने जिस सहजता से यूएई खासकर दुबई को अपना घर बनाया है, वह दोनों देशों के बीच उस आत्मीयता का सबूत है जो 1970 के दशक के 'ऑयल बूम' या बाद के 'रियल एस्टेट बूम' से भी पुरानी है. संयुक्त अरब अमीरात के अस्तित्व में आने से बहुत पहले से, जुमेराह की रेत से कांच की गगनचुंबी इमारतें खड़ी होने से पहले और तेल के खेल से रेगिस्तानी बस्तियों के वैश्विक शहरों में बदलने से पहले से ही दुबई और भारत के आपस में संबंध रहे हैं. ये कोई संधियों से बने संबंध नहीं थे, बल्कि 5 हजार साल पुराने रिश्तों से निकली कहानी है. भारत और दुबई के संबंध कांस्य युग (Bronze Age) जितने पुराने हैं, जब सिंधु घाटी सभ्यता दुनिया की सबसे परिष्कृत शहरी संस्कृतियों में से एक हुआ करती थी. उपमहाद्वीप के पश्चिमी तट के बंदरगाहों से हड़प्पा के व्यापारी लकड़ी, मसाले, अनाज और निर्मित सामान जहाजों में लादकर सुमेर और मेसोपोटामिया की ओर निकलते थे और अरब तट पर रुकते थे. जब तेल की कमाई बढ़ने लगी और शेख राशिद के पास दुबई का कायाकल्प करने के संसाधन हो गए, तब भी मजदूरों, डॉक्टरों और इंजीनियरों के रूप में भारतीय विशेषज्ञता की जरूरत पड़ी थी.

दुबई का मजबूत भरोसा

दशकों से दुबई एक शांत, लेकिन शक्तिशाली विश्वास के साथ आगे बढ़ता रहा है, वो ये कि दुनिया में आपसी निर्भरता (interdependence) पर आधारित समृद्धि, अस्थिरता के खिलाफ एक ढाल का काम कर सकती है. इस अमीराती शहर ने खुद को वित्त, व्यापार और लॉजिस्टिक्स के हब के रूप में विकसित किया है, एक ऐसा शहर जिससे वैश्विक पूंजी की नसें मजबूती से जुड़ी हुई हैं. इसकी रणनीति बेहद सटीक थी: अगर दुनिया की प्रमुख ताकतों का हित इस जगह से होने वाले निर्बाध व्यापार में है, तो वो इसे बनाए रखने और रक्षा करने के लिए भी उतने ही सक्रिय रहेंगे. खुद को वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए अपरिहार्य बनाकर दुबई ने सिर्फ विकास ही नहीं बल्कि अपनी सुरक्षा का भी इंतजाम किया है. लेकिन अब जब ईरान ने अमेरिका-इजरायल के अटैक के बाद दुबई को निशाना बनाया तो इन हमलों ने अस्थिर पड़ोस में तैयार स्थिरता की नाजुकता की कलई खोलकर रख दी.

'सपनों को साकार करने वाला शहर'

दुबई की अपनी हालिया यात्रा के दौरान मैं कुछ ऐसे भारतीय प्रवासियों से मिली, जो शहर की चकाचौंध भरी गगनचुंबी इमारतों के शीर्ष तक पहुंच चुके हैं. उनकी कहानियां केवल संघर्ष की नहीं बल्कि अवसर की हैं, एक ऐसे शहर की कहानियां, जिसने महत्वाकांक्षाओं को उपलब्धियों में बदल दिया. मैंने उनके मुंह से बार-बार एक ही बात सुनी: दुबई ने हमारे सपनों को मुमकिन बना दिया. उनके लिए दुबई कोई दूरदराज का देश नहीं, अपना घर था: भारत से केवल कुछ घंटों की दूरी पर एक ऐसा शहर, जो उनकी सबसे बड़ी आकांक्षाओं को समेटने के लिए पर्याप्त है.

यूएई में भारतीयों की बड़ी संख्या का ही नतीजा है कि वहां भारतीय खान-पान के अनगिनत केंद्र बन चुके हैं. इनमें राजू ऑमलेट जैसे नाम अलग पहचान रखते हैं, जिसकी शुरुआत 2013 में राजीव मेहरिश और उनके बेटे नकुल ने अल करामा में की थी. वडोदरा की गलियों से प्रेरित यह रेस्टोरेंट ब्रांड आज दुबई का एक लोकप्रिय नाम बन चुका है.

सेफ्टी, सिक्योरिटी और बिजनेस में आसानी.. ये वो वजह है, जिन्होंने कुछ ही वर्षों में दुबई को सबसे पसंदीदा स्थलों में से एक बना दिया है. रियल एस्टेट की तो यहां इतनी धूम है कि एक चुटकुला अक्सर बोला जाता है- "दुबई जाने वाले ज्यादातर लोग घर के मालिक बनकर ही वहां से लौटते हैं." ऊंची-ऊंची गगनचुंबी इमारतों में भारतीयता की स्पष्ट छाप दिखती है, चाहे स्टील के रूप में हो, कांच हो या फिर विजन के रूप में. 
दुबई के इस वजूद को आज धुएं में घिरी इमारतों और डर तक सीमित नहीं किया जा सकता.

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(डिस्क्लेमरः नगमा सहर NDTV इंडिया में सीनियर एडिटोरियल एडवाइजर और एंकर हैं. लेख में व्यक्त उनके निजी विचार हैं.)

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