अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच युद्ध की शुरुआत 28 फरवरी को हुई थी. आठ अप्रैल 2026 को एक नाजुक युद्धविराम समझौते की घोषणा हुई. समाधान का संकेत देने की जगह यह युद्धविराम एक अत्यंत अस्थिर टकराव में अस्थायी विराम को दर्शाता है. इस युद्ध ने पहले ही व्यापक क्षेत्रीय प्रभाव पैदा किया है. ईरान में आयतुल्लाह अली खामेनेई जैसे वरिष्ठ नेता इन हमलों में मारे गए. इसकी प्रतिक्रिया में ईरान ने उन खाड़ी देशों को निशाना बनाया है, जहां अमेरिकी सैन्य अड्डे हैं, जबकि इजरायल को अपने महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमलों का सामना करना पड़ा है.
किसके नियंत्रण में रहेगा होर्मुज स्ट्रेट
रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज स्ट्रेट पर प्रभावी रूप से ईरान का नियंत्रण हो गया है. उससे होकर भारत, चीन, पाकिस्तान, रूस और कई अन्य देशों के जहाजों को रास्ता दिया जा रहा है. समुद्री आवाजाही पर विकसित होता यह नियंत्रण युद्धविराम वार्ताओं में एक जटिल आयाम जोड़ चुका है, खासकर तब जब प्रतिस्पर्धी अंतरराष्ट्रीय पहलें इस जलमार्ग का प्रबंधन करने का प्रयास कर रही हैं. यूनाइटेड किंगडम (यूके) ने प्रधानमंत्री किएर स्टार्मर के नेतृत्व में, होर्मुज स्ट्रेट को सुरक्षित करने और फिर से खोलने के लिए एक बहुराष्ट्रीय ढांचे का प्रस्तावित तैयार करने में अग्रणी भूमिका निभाई है. इस पहल में 40–60 से देश शामिल हैं, इनमें फ्रांस, जर्मनी, कनाडा, जापान, भारत, संयुक्त अरब अमीरात और अन्य शामिल हैं. इसका उद्देश्य एक समन्वित दृष्टिकोण के जरिए समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करना और आर्थिक स्थिरता को बहाल करना है. हालांकि अमेरिका ने इस गठबंधन में शामिल न होने का फैसला किया है.इसकी जगह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक स्वतंत्र रणनीति की घोषणा की है. इसमें ईरान का प्रभावी मुकाबला करने के लिए होर्मुज स्ट्रेट की नौसैनिक नाकेबंदी शामिल है. इस मतभेद ने दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक पर समानांतर या प्रतिस्पर्धी प्रबंधन प्रणालियों की संभावना पैदा की है. इससे संचालन संबंधी वास्तविकताएं और कूटनीतिक वार्ताएं दोनों ही जटिल हो गई हैं.
इस पृष्ठभूमि के खिलाफ एक स्थायी युद्धविराम को औपचारिक रूप देने के लिए पाकिस्तान के इस्लामाबाद में आयोजित वार्ता में कोई सहमति नहीं बन सकी. युद्धविराम की नाजुकता इस मामले के प्रमुख पक्षों के बीच संरचनात्मक मतभेदों में समाई हुई है. खासकर इजरायल इन वार्ताओं का प्रत्यक्ष हिस्सा नहीं है. यह किसी भी समझौते के दायरे और उसे लागू करने की क्षमता को सीमित कर देता है. अमेरिका और इजरायल के रणनीतिक उद्देश्य भी महत्वपूर्ण तरीकों से अलग हैं. जहां अमेरिका तनाव कम करने और समुद्री स्थिरता की बहाली पर केंद्रित लग रहा है, वहीं इजरायल का उद्देश्य ईरान की सैन्य और उसके प्रॉक्सी (सहयोगी समूहों) की क्षमताओं को पूरी तरह खत्म करना बना हुआ है. यह अंतर सुनिश्चित करता है कि इजरायल की भागीदारी के बिना कोई भी युद्धविराम स्वाभाविक रूप से अस्थिर रहेगा और उसके टूटने की संभावना बनी रहेगी.
आखिर ईरान हासिल क्या करना चाहता क्या है
इस वार्ता में ईरान ने अपनी स्थिति एक 10-सूत्रीय एजेंडा के माध्यम से साफ की है. यह युद्ध के मैदान में दिखाई गई अपनी क्षमता को दीर्घकालिक रणनीतिक लाभ में बदलने का एक संतुलित प्रयास नजर आता है. इस एजेंडे का प्रत्येक बिंदु क्षेत्रीय शक्ति संतुलन पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालता है. प्राथमिक और द्वितीयक प्रतिबंधों को हटाने की मांग विशेष रूप से महत्वपूर्ण है. जहां प्राथमिक प्रतिबंध सीधे आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित करते हैं, वहीं द्वितीयक प्रतिबंध तीसरे देशों और निवेशकों को ईरान के साथ व्यापार करने से रोकते हैं. इन प्रतिबंधों को हटाने से ईरान अंतरराष्ट्रीय पूंजी प्रवाह के लिए खुल जाएगा. इससे उसकी आर्थिक स्थिति मजबूत होगी और भविष्य के किसी भी संघर्ष में बाहरी पक्षों के हित भी उससे जुड़ जाएंगे.
इसी तरह यह भी महत्वपूर्ण है कि ईरान अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के गवर्नर बोर्ड की ओर से पारित प्रस्तावों को हटाने की मांग कर रहा है. ईरान का कहना है कि ये प्रस्ताव राजनीतिक रूप से प्रेरित हैं और उसके संप्रभु परमाणु कार्यक्रम को अनुचित रूप से निशाना बनाते हैं. हालांकि, IAEA ने अपनी कई रपटों में इस बात के संकेत दिए हैं कि ईरान करीब 60 फीसदी तक यूरेनियम संवर्धन (Enrichment) कर रहा है, जो सामान्य नागरिक उपयोग की सीमा से काफी अधिक है. यूरेनियम संवर्धन का यह स्तर हथियार-स्तर के करीब है.
अंतरराष्ट्रीय कानून और अप्रसार (non-proliferation) नियमों के मुताबिक 90 फीसदी से अधिक यूरेनियम संवर्धन को आमतौर पर हथियार-ग्रेड का माना जाता है, खासकर तब जब इसके साथ आक्रामक इरादे जुड़े हों. हालांकि ईरान अभी इस तकनीकी सीमा से नीचे है, लेकिन इजरायल को खत्म करने जैसे उसके बयान, चिंता पैदा करते हैं, जिन्हें नकारात्मक रणनीतिक इरादे के संकेत के रूप में देखा जाता है. इसलिए, IAEA के प्रस्तावों को हटाने से न केवल अंतरराष्ट्रीय निगरानी कमजोर होगी, बल्कि उन कानूनी व्यवस्थाओं को भी कमजोर किया जाएगा जो परमाणु जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए बनाई गई हैं.
अगर समझौता ईरान की शर्तों पर हुआ तो क्या होगा
एक और महत्वपूर्ण मांग होर्मुज स्ट्रेट पर शासन से संबंधित है. ईरान इस जलमार्ग के प्रबंधन में अपनी भूमिका की औपचारिक मान्यता चाहता है, विशेष रूप से इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के जरिए. इससे उसके वर्तमान वास्तविक (defacto) नियंत्रण को संस्थागत रूप मिल जाएगा. इससे वह समुद्री पहुंच का इस्तेमाल एक भू-राजनीतिक उपकरण के रूप में कर सकेगा. जहाजों को चुनिंदा रूप से आने-जाने की अनुमति देकर या रोककर, ईरान वैश्विक ऊर्जा प्रवाह को प्रभावित कर सकता है. इससे वह अपने विरोधियों और सहयोगियों पर दबाव बना सकता है.
ईरान ने भारत-चीन समेत अपने कुछ मित्र देशों के जहाजों को होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरने की इजाजत दी है.
ईरान ने यह भी प्रस्ताव किया है कि सभी समझौतों को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव के तहत कानूनी रूप दिया जाए. हालांकि उसकी यह मांग कानूनी वैधता प्रदान करती हुई लग सकती है, लेकिन व्यावहारिक बात यह है कि इससे भविष्य में बदलाव करना बहुत कठिन हो जाएगा, क्योंकि चीन और रूस के पास वीटो पॉवर है, ये दोनों देश ईरान के साथ रणनीतिक रूप से जुड़े हुए हैं. इससे ईरान को मिली रियायतें स्थायी हो जाएंगी. इस तरह से ईरान के विरोधी देशों की उस पर भविष्य में प्रतिबंध लगाने या उल्लंघनों पर प्रतिक्रिया देने की क्षमता सीमित हो जाएगी.
ईरान के एजेंडे के अन्य बिंदुओं में सभी प्रकार की दुश्मनी का पूरी तरह खात्मा, भविष्य में होने हमलों के खिलाफ बाध्यकारी गारंटी, ईरान के क्षेत्रीय प्रभाव की मान्यता, युद्ध में हुए नुकसान का मुआवजा और आसपास के क्षेत्रों में विदेशी सैन्य उपस्थिति को कम करना या हटाना शामिल है. ये सभी प्रावधान मिलकर ईरान की रणनीतिक स्थिति को मजबूत और अमेरिका और इजरायल की कार्यक्षमता को सीमित करेंगे. ऐसी गारंटी इजरायल की पहले हमला करने (Preemptive Strike) की क्षमता को भी सीमित कर सकती है, भले ही उसे तत्काल खतरा क्यों न महसूस हो.
युद्धविराम कितना आगे बढ़ पाएगा
इन सभी बातों को मिलाकर देखा जाए, तो 10-बिंदुओं वाला यह एजेंडा केवल युद्धविराम का ढांचा नहीं है, बल्कि क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को ईरान के पक्ष में बदलने का एक बड़ा प्रयास है. अमेरिका और इजरायल के लिए, इन शर्तों को स्वीकार करना लंबे समय के रणनीतिक लाभ को छोड़ने के बराबर होगा. इसी कारण इस्लामाबाद में आयोजित बातचीत एक गतिरोध (Impasse) पर पहुंच गईं, जहां दोनों पक्ष अपनी मुख्य सुरक्षा चिंताओं पर समझौता करने को तैयार नहीं हुए.
इस तरह से जारी युद्धविराम अभी भी कमजोर (अस्थिर) बना हुआ है. हालांकि बड़े स्तर की लड़ाई रुक गई है, लेकिन कम तीव्रता वाले संघर्ष जारी हैं, विशेष रूप से इजरायल और ईरान-समर्थित समूहों, जैसे हिज्बुल्लाह के बीच. यह पैटर्न आधुनिक युद्ध के एक व्यापक बदलाव को दर्शाता है, जहां तीव्र संघर्ष वाले चरण के बीच रणनीतिक संयम (रुक-रुक कर लड़ाई) के दौर आते हैं. ऐसा तरीका युद्ध में शामिल पक्षों को पूरी तरह युद्ध में कूदे बिना अपनी ताकत फिर से जुटाने, रणनीति बदलने और दोबारा लड़ाई शुरू करने की इजाजत देता है.
होर्मुज स्ट्रेट की नाकेबंदी क्यों करना चाहता है अमेरिका
होर्मुज स्ट्रेट के घटनाक्रमों से स्थिति और जटिल हो गई है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से नाकेबंदी (Blockade) की घोषणा एक नया तत्व जोड़ती है, जो सभी पक्षों की रणनीतिक गणनाओं को बदल सकता है. जिन देशों को होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने की अभी ईरान से विशेष इजाजत मिल रही है, उनके लिए भी पहुंच सीमित कर अमेरिका वास्तव में ईरान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ा रहा है. जो देश स्थिर ऊर्जा आपूर्ति पर निर्भर हैं, वे अब ईरान पर समझौते तक पहुंचने के लिए कूटनीतिक दबाव बना सकते हैं. इससे ईरान की मोलभाव करने की स्थिति कमजोर हो सकती है. इस तरह से उसे अपनी कुछ मांगों को नरम करने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है.
और अंत में मध्य पूर्व में चल रहे इस संघर्ष में युद्धविराम का लंबे समय तक टिकना सफल कूटनीति का परिणाम कम और रणनीतिक गतिरोध (Stalemate) का परिणाम ज्यादा है. औपचारिक वार्ताओं में इजरायल की अनुपस्थिति, प्रमुख पक्षों के बीच उद्देश्यों में अंतर और ईरान की व्यापक और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मांगों ने सहमति बनने में बाधा खड़ी की है. यह युद्धविराम शायद एक नाजुक और अनिश्चित रूप में जारी रहेगा. इसमें बीच-बीच में संघर्ष होते रहेंगे, जब तक कि रणनीतिक हितों का अधिक व्यापक तालमेल स्थापित नहीं हो जाता. तब तक, यह क्षेत्र युद्ध और शांति के बीच एक 'ग्रे जोन' (अस्पष्ट स्थिति) में काम करता रहेगा,इसका क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ेगा.
(डिस्क्लेमर: लेखिका मध्य पूर्व एशिया के मामलों की जानकार हैं. उन्होंने इंडिया एंड दी गल्फ: ए सिक्योरिटी प्रस्पेक्टिव शीर्षक से किताब लिखी है. वो ग्रेटर वेस्ट एशिया फोरम, इंडिया की संस्थापक सदस्य हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)














