बदलते रिश्तों और गठबंधनों के बीच, ईरान और इज़राइल के साथ-साथ अमेरिका के नेतृत्व वाले देशों के बीच शुरू हुआ टकराव मिडिल ईस्ट की राजनीति में बड़ा बदलाव है. सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या के बाद हालात और गंभीर हो गए हैं. अब यह इलाका ऐसे मोड़ पर है जहां बदले की भावना और अपने अस्तित्व को बचाने की लड़ाई साथ-साथ चल रही है. इससे पूरे खाड़ी क्षेत्र में अस्थिरता फैलने का खतरा है. ईरान को लंबे समय से इलाके की राजनीति में प्रभावशाली देश माना जाता रहा है. लेकिन अब उसकी महत्वाकांक्षाएं खतरनाक साबित हो रही हैं. खाड़ी सहयोग परिषद यानी GCC के छह अरब देश, जिन्हें अमेरिका का करीबी माना जाता है, इस टकराव में बुरी तरह फंस गए हैं. उन्हें ईरान की जवाबी कार्रवाई का सामना करना पड़ रहा है और भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है.
तेल और गैस पर निर्भरता से आगे
खाड़ी क्षेत्र में अलग-अलग मीडिया संस्थानों में संपादक के तौर पर काम करते हुए मैंने यहां का बदलाव करीब से देखा है. 1990 के दशक के पहले खाड़ी युद्ध के समय यह इलाका लगभग पूरी तरह तेल और गैस पर निर्भर था.
यूएई और कतर बड़े वित्तीय केंद्र भी
लेकिन आज हालात अलग हैं. संयुक्त अरब अमीरात की अर्थव्यवस्था का लगभग 77 प्रतिशत हिस्सा अब तेल-गैस के अलावा दूसरे क्षेत्रों से आता है. इनमें वित्त, तकनीक, पर्यटन, रियल एस्टेट, खेल और शिक्षा शामिल हैं. ओमान में यह आंकड़ा 73 प्रतिशत, कतर में 66 प्रतिशत और सऊदी अरब में 57 प्रतिशत है. 2025 की ग्लोबल फाइनेंशियल सेंटर इंडेक्स की 38वीं रैंकिंग में दुबई को दुनिया के बड़े वित्तीय केंद्रों में 11वां स्थान मिला. वह फ्रैंकफर्ट, वाशिंगटन डीसी, जिनेवा, टोक्यो, ज्यूरिख, बोस्टन और पेरिस जैसे शहरों से आगे रहा. यह बड़ा बदलाव सुरक्षा और स्थिरता की छवि बनाकर ही संभव हो पाया. 1990 के दशक से 2020 तक का अपेक्षाकृत शांत समय अब बीते दौर जैसा लगता है. आज खाड़ी देश ईरानी ड्रोन और मिसाइल हमलों से परेशान हैं. हर हमले से दुनिया भर में तेल की आपूर्ति पर असर पड़ता है और क्षेत्र की अर्थव्यवस्था हिल जाती है. ईरान की यह सख्त कार्रवाई उसके लिए अस्तित्व की लड़ाई का कदम मानी जा रही है.
तेल रिफाइनरी और दूतावास निशाने पर
तेल रिफाइनरियों, दूतावासों और अहम जगहों पर ड्रोन हमले सिर्फ चुनौती नहीं बल्कि मजबूरी में उठाए गए कदम बताए जा रहे हैं. होर्मुज जलडमरूमध्य, जो दुनिया में तेल सप्लाई का अहम रास्ता है, उसके बंद होने से अंतरराष्ट्रीय बाजारों में हलचल मच गई है. गैस की कीमतें बहुत ऊपर पहुंच गई हैं. निवेशक पैसा निकाल रहे हैं और विकास की उम्मीदें कमजोर पड़ रही हैं.
कभी बेहद सुरक्षित दुबई खतरे में
जैसे-जैसे युद्ध का खतरा बढ़ रहा है, दुबई का बड़ा हिस्सा बाहर जाने की सोच रहा है. सऊदी अरब का बड़ा तेल शोधन संयंत्र रास तनुरा भी खतरे में है. रियाद और कुवैत समेत कई जगहों पर अमेरिकी दूतावासों पर हमलों से सुरक्षा का माहौल टूटता दिख रहा है. जिन जगहों को सुरक्षित माना जाता था, वहां भी डर का माहौल है. दुबई, जो कभी पर्यटन और व्यापार का बड़ा केंद्र था, अब लंबे संघर्ष की आशंका से परेशान है.
खाड़ी देशों का भविष्य क्या होगा
खाड़ी के राजतंत्र, अपनी दौलत और आधुनिक अर्थव्यवस्था के बावजूद, इस नए संकट में बहुत कुछ खो सकते हैं. पिछले 25 साल में उन्होंने अपनी अर्थव्यवस्था को सिर्फ तेल पर निर्भर रहने से बाहर निकाला है. लेकिन जो ढांचा इस बदलाव की नींव है, वही अब खतरे में है. संयुक्त अरब अमीरात की अर्थव्यवस्था अब मुख्य रूप से गैर-तेल क्षेत्रों पर टिकी है. फिर भी जब ड्रोन अहम सुविधाओं पर हमला करते हैं और जरूरी सेवाएं रुकती हैं, तो सारी प्रगति अस्थायी लगने लगती है.
खाड़ी देशों पर गहरा मानसिक असर
इन देशों पर मानसिक असर भी गहरा है. हमलों ने सुरक्षा और स्थिरता को लेकर भरोसे को हिला दिया है. यही भरोसा अमेरिका के साथ उनके रिश्तों की नींव था. प्रवासियों और पर्यटकों के लिए सुरक्षित जगह की छवि कमजोर हुई है. कतर, बहरीन, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात और ओमान जैसे देशों को शांति की कोशिशें तेज करनी होंगी ताकि हालात और न बिगड़ें.
ईरान की जवाबी कार्रवाई
ईरान पर अमेरिकी हमलों के बाद, वहां के लोग सीधे तौर पर तबाही देख रहे हैं. ऐसे में ईरान की जवाबी कार्रवाई को हल्के में नहीं लिया जा सकता. इज़राइल की ओर दागी गई मिसाइलों ने उस इलाके की बुनियाद हिला दी जिसे पहले स्थिर माना जाता था. दोनों पक्ष बदले के चक्र में फंसे हुए हैं. हर मौत के साथ बदले की कहानी और गहरी होती जा रही है.
भारत उम्मीद की किरण
ईरान, इज़राइल, खाड़ी देशों और अमेरिका के साथ भारत के अच्छे रिश्ते हैं. खाड़ी देशों में एक करोड़ से ज्यादा भारतीय काम करते हैं. इसलिए यह मामला भारत के लिए बेहद अहम है. भारत बातचीत का रास्ता निकालने में भूमिका निभा सकता है.प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कतर, ओमान, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, कुवैत और सऊदी अरब के नेताओं से बात की और ईरानी हमलों की निंदा की. उन्होंने प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा और छात्रों की वापसी के प्रयासों की निगरानी की. हिंद महासागर के पार बसे कई भारतीय परिवारों के लिए होली और ईद मिलन का मौका बन सकते हैं.
पूरी दुनिया प्रभावित
यह संकट सिर्फ क्षेत्र तक सीमित नहीं है. शेयर बाजार में गिरावट और ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी से पूरी दुनिया प्रभावित हो रही है. व्यापार और अर्थव्यवस्था से जुड़ी दुनिया चिंता में है. शांति रहेगी या नहीं, इससे आने वाले समय की ऊर्जा और सुरक्षा तय होगी. इस पूरे माहौल में एक बात साफ है. जब एक देश जवाबी कार्रवाई करता है, तो दूसरे देशों को भी उसके गंभीर नतीजे भुगतने पड़ते हैं. खाड़ी के समृद्ध देशों को इज़राइल और अमेरिका के साथ मिलकर युद्ध खत्म कराने की कोशिश करनी होगी. उनकी अर्थव्यवस्था सुरक्षा और स्थिरता की छवि पर टिकी है. दुनिया उम्मीद कर रही है कि हालात बिगड़ने से पहले समझौते का रास्ता निकले और स्थिरता वापस आए.
(लेखक एनडीटीवी में रिसर्च एडिटर हैं. वे पश्चिम एशिया के फारस की खाड़ी के देशों में एक दशक से अधिक समय तक रह कर काम कर चुके हैं)













