योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश ने उस दौर से एक लंबी छलांग लगाई है, जब उसे ‘बीमारू' राज्य कहा जाता था. कभी माफिया, अपराध और बाहुबलियों की पकड़ से जूझता यह प्रदेश आज खुद को बदलती तस्वीर के साथ प्रस्तुत कर रहा है. जिस धरती पर कानून व्यवस्था पर सवाल उठते थे, वहीं अब विकास, सुरक्षा और भरोसे की नई कहानी लिखी जा रही है. पलायन की मजबूरी से जूझते लोगों के बीच अब अवसरों की चर्चा है, और डर के माहौल की जगह उम्मीद ने ले ली है. जिस राज्य से निवेशक और उद्योगपति अपना धंधा बंद करके पलायन कर गए थे, वही अब कानून व्यवस्था मजबूत होने के बाद फिर से लौटने लगे हैं. जिसे कभी ‘उल्टा प्रदेश' कहा जाता था, वही अब ‘उत्तम प्रदेश' बनने की ओर अग्रसर है. अब उसी प्रदेश में निवेशकों की रुचि बढ़ी है और बड़े पैमाने पर, लगभग 50 लाख करोड़ रुपये तक के निवेश के प्रस्ताव सामने आए हैं. पहले जहां प्रदेश की अर्थव्यवस्था के लिए स्पष्ट लक्ष्य तय नहीं किए जाते थे, वहीं अब एक ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य निर्धारित कर आगे बढ़ा जा रहा है. यह परिवर्तन केवल दावों तक सीमित नहीं, बल्कि सड़कों, शहरों, उद्योगों और जनजीवन में दिखने वाले बदलावों के रूप में सामने आने की कोशिश कर रहा है.
गंगा एक्सप्रेसवे: विकास की नई धुरी
गंगा एक्सप्रेसवे को इस तरह तैयार किया गया है कि यह पश्चिमी और पूर्वी उत्तर प्रदेश के बीच आर्थिक दूरी को कम कर दे और यात्रा को तेज व सुगम बनाए. गंगा एक्सप्रेसवे की कुल लंबाई 594 किलोमीटर है और यह 12 जिलों से गुजरते हुए मेरठ से प्रयागराज तक जाएगा. योगी सरकार ने सभी एक्सप्रेसवे को विकास, यातायात, उद्योग-धंधे और रोजगार से जोड़कर उनकी रूपरेखा तैयार की है. चाहे दिल्ली से जुड़ाव हो या जेवर एयरपोर्ट के माध्यम से वैश्विक संपर्क, यह मार्ग पश्चिमी उत्तर प्रदेश से संगम नगरी प्रयागराज तक सीधी कनेक्टिविटी प्रदान करेगा. यह मार्ग कृषि उत्पादों, औद्योगिक सामान और व्यापारिक गतिविधियों के लिए एक मजबूत परिवहन नेटवर्क तैयार करेगा, जिससे लॉजिस्टिक्स लागत घटेगी और निवेश को बढ़ावा मिलेगा. इसी कारण इस परियोजना पर विशेष जोर दिया गया है, ताकि प्रदेश के पिछड़े और दूरस्थ क्षेत्रों को भी विकास की मुख्यधारा से जोड़कर संतुलित आर्थिक प्रगति सुनिश्चित की जा सके. एक्सप्रेसवे से सिर्फ उत्तर प्रदेश को ही नहीं, बल्कि बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल को भी लाभ होगा.
एक्सप्रेसवे नेटवर्क: कनेक्टिविटी की रीढ़
उत्तर प्रदेश में एक्सप्रेसवे केवल सड़कें नहीं, बल्कि विकास की धमनियां बनते जा रहे हैं. यमुना एक्सप्रेसवे ने नोएडा से आगरा तक लगभग 165 किलोमीटर की दूरी को तेज़ और सुगम बनाया, तो आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे ने करीब 302 किलोमीटर का मार्ग जोड़ते हुए प्रदेश के बीचोंबीच आर्थिक गतिविधियों को गति दी. ये एक्सप्रेसवे मायावती और अखिलेश यादव के मुख्यमंत्रित्व काल में बने थे. पूर्वांचल एक्सप्रेसवे लगभग 340 किलोमीटर लंबा होकर पूर्वी उत्तर प्रदेश को विकास की मुख्यधारा से जोड़ रहा है, वहीं बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे करीब 296 किलोमीटर की लंबाई के साथ बुंदेलखंड जैसे क्षेत्र में नई संभावनाएं पैदा कर रहा है. गोरखपुर लिंक एक्सप्रेसवे लगभग 91 किलोमीटर के जरिए पूर्वांचल से संपर्क को और सुदृढ़ करता है, जबकि दिल्ली–मेरठ एक्सप्रेसवे करीब 96 किलोमीटर में दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बीच यात्रा को तेज बनाता है. इन सबके बीच गंगा एक्सप्रेसवे लगभग 594 किलोमीटर लंबा होकर प्रदेश के सबसे बड़े और महत्वाकांक्षी मार्ग के रूप में उभर रहा है. इन सभी को मिलाकर उत्तर प्रदेश का एक्सप्रेसवे नेटवर्क 1900 किलोमीटर से अधिक तक पहुंच चुका है और इसे 22 एक्सप्रेसवे तक विस्तारित करने का लक्ष्य रखा गया है. सरकार का दावा है कि एक्सप्रेसवे नेटवर्क में देश में प्रदेश की हिस्सेदारी करीब 55 प्रतिशत है.
उड़ान को पंख: सिमटती जा रही हैं दूरियां
योगी आदित्यनाथ सरकार के दौरान उत्तर प्रदेश में हवाई संपर्क को नई ऊंचाई देने का प्रयास किया गया है. ग्रेटर नोएडा के पास बन रहा नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट भविष्य में देश के सबसे बड़े हवाई अड्डों में गिना जाएगा, जबकि लखनऊ का चौधरी चरण सिंह अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा और वाराणसी का लाल बहादुर शास्त्री अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा पहले से अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के प्रमुख केंद्र हैं. कुशीनगर में स्थित कुशीनगर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा बौद्ध पर्यटन को वैश्विक स्तर पर जोड़ता है और अयोध्या में बना महर्षि वाल्मीकि अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा धार्मिक पर्यटन को नई गति दे रहा है. देश में सबसे अधिक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे उत्तर प्रदेश में होने का दावा किया जाता है. इसके साथ ही कानपुर, प्रयागराज, गोरखपुर, बरेली और गाजियाबाद के हिंडन हवाई अड्डे जैसे घरेलू केंद्र भी क्षेत्रीय संपर्क को मजबूत कर रहे हैं. दूसरी ओर गौतमबुद्ध नगर, गाजियाबाद, लखनऊ, कानपुर और आगरा में मेट्रो सेवा जारी है, वहीं एनसीआर क्षेत्र में क्षेत्रीय तीव्र परिवहन प्रणाली विकसित की जा रही है, जो दिल्ली, गाजियाबाद और मेरठ को जोड़ती है. मेट्रो परियोजनाओं का विस्तार शहरी परिवहन को आधुनिक, तेज और सुविधाजनक बना रहा है. 90 से अधिक राष्ट्रीय राजमार्ग प्रदेश से गुजरते हैं. यही नहीं, वाराणसी से हल्दिया (पश्चिम बंगाल) के बीच राष्ट्रीय जलमार्ग को आगे अयोध्या तक जोड़ने की दिशा में भी प्रयास किए जा रहे हैं.
कानून-व्यवस्था का विकास से रिश्ता
सौ बात की एक बात यही है कि मजबूत कानून-व्यवस्था के बिना तरक्की की गाड़ी आगे नहीं बढ़ सकती. कानून की सुदृढ़ नींव पर ही उज्ज्वल और स्थायी विकास का भव्य भवन खड़ा होता है. इसीलिए विकास पथ पर आगे बढ़ने से पहले योगी आदित्यनाथ सरकार ने कानून-व्यवस्था को सुदृढ़ करने पर विशेष जोर दिया है. माफिया और बाहुबलियों पर कड़ी कार्रवाई, पुलिस आयुक्त प्रणाली की स्थापना और अपराध नियंत्रण के लिए उठाए गए कदमों ने एक ऐसा वातावरण बनाने की कोशिश की है, जहां निवेशक और आम नागरिक दोनों खुद को सुरक्षित महसूस कर सकें. योगी राज में 267 अपराधी मुठभेड़ों में मारे गए. पुलिस और प्रशासन को स्पष्ट संदेश दिया गया कि सरकार के साथ तालमेल बनाकर काम करना होगा. सरकार ने पुलिस प्रशिक्षण, आधुनिकीकरण और भर्ती पर जोर दिया, जिससे प्रतिक्रिया समय कम हुआ. पहले पुलिस को पहुंचने में अधिक समय लगता था, अब औसतन करीब 6 मिनट में पुलिस पहुंचने का दावा किया जाता है. इससे जनता में भरोसा, अपराधियों में भय और निवेशकों में सुरक्षा का भाव पैदा हुआ है. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, 2016 की तुलना में 2023 तक कई गंभीर अपराधों में कमी दर्ज की गई है हालांकि एनकाउंटर और बुलडोजर राजनीति पर योगी पर सवाल भी उठते हैं
निवेश, अर्थव्यवस्था और रोजगार का विस्तार
उत्तर प्रदेश अब एक बड़े आर्थिक केंद्र के रूप में उभरने की दिशा में आगे बढ़ रहा है. बड़े पैमाने पर निवेश प्रस्ताव, एक ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था का लक्ष्य और “एक जिला एक उत्पाद” जैसी योजनाएं स्थानीय उद्योगों को नई पहचान दे रही हैं. धार्मिक पर्यटन के विस्तार से भी रोजगार के अवसर बढ़ रहे हैं, जिससे प्रदेश की अर्थव्यवस्था को नई मजबूती मिल रही है और युवाओं के लिए संभावनाओं के नए द्वार खुल रहे हैं. प्रदेश में 50 लाख करोड़ रुपये के निवेश की घोषणा की गई है, जिसमें से लगभग 15 लाख करोड़ रुपये की परियोजनाओं को जमीन पर उतारा जा चुका है. सरकार का दावा है कि इससे बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार मिला है. मुख्यमंत्री ने 10 वर्षों में 10 लाख नौकरियां देने का लक्ष्य रखा, जिसमें से लगभग 9 लाख नौकरियां दी जा चुकी हैं. उत्तर प्रदेश का सकल राज्य घरेलू उत्पाद वर्ष 2016-17 में 12.75 लाख करोड़ रुपये था, जो 2025-26 में बढ़कर 30.25 लाख करोड़ रुपये हो गया है. वर्ष 2026-27 के लिए इसे 36 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है. 2016-17 में बजट का आकार 3.46 लाख करोड़ रुपये था, जो 2026-27 में बढ़कर 9.12 लाख करोड़ रुपये हो गया है. धार्मिक टूरिज्म के नाम पर कई जगहों को विकसित किया गया है अयोध्या, मथुरा, वाराणसी, प्रयागराज और चित्रकूट इत्यादि में इंफ्रास्ट्राक्चर पर जोर दिया गया. इसी की नतीजा था कि प्रयागराज कुंभ मेले में रिकॉर्ड 66 करोड़ श्रद्धालु आए थे. ये देखा जाए कि अयोध्या, चित्रकूट, मथुरा, प्रयागराज और वाराणसी में 2017 में करीब 12.61 करोड़ पर्यटक आए जबकि इसी पांच धार्मिक शहर में 2025 में करीब 130 करोड़ पर्यटकों का आगमन हुआ. इससे लोगों के रोजगार और काम धंधे मिलते हैं.
उत्तर प्रदेश की बदलती तस्वीर यह संकेत देती है कि जब नीति, नियत और नेतृत्व एक दिशा में काम करते हैं, तो परिवर्तन संभव हो जाता है. बुनियादी ढांचे का विस्तार, कानून-व्यवस्था में सुधार, निवेश का बढ़ता विश्वास और रोजगार के नए अवसर—ये सभी मिलकर एक नए उत्तर प्रदेश की रूपरेखा गढ़ते दिखते हैं. हालांकि सवाल यह भी है कि क्या 2027 में योगी आदित्यनाथ की लगातार तीसरी बार सरकार बनने पर ही ये लक्ष्य पूरी तरह हासिल हो पाएंगे. क्योंकि सत्ता परिवर्तन होने पर अक्सर प्राथमिकताएं और नीतिगत दिशा भी बदल जाती है.
(धर्मेन्द्र कुमार सिंह, चुनाव और राजनैतिक विश्लेषक हैं)














