दो सितारे टूटे- सूना हुआ आसमान
दिसंबर में विनोद कुमार शुक्ल गए और जनवरी में ज्ञानरंजन.
हिंदी का आसमान कुछ और सूना हो गया- इतना गहरा सूनापन कि वह हम सबके भीतर उतर आया.
ध्यान से देखें तो लगभग हमउम्र होने के बावजूद दोनों बिल्कुल अलग ध्रुवों के लेखक और व्यक्ति रहे.
विनोद कुमार शुक्ल अपने घर और संकोच से बाहर न निकलने को अडिग कवि-उपन्यासकार तो ज्ञानरंजन बिल्कुल सार्वजनिक होने को तैयार और हर संकोच के पार जाकर यथार्थ को उसके खुरदरेपन के साथ पकड़ने वाले सचेत कथाकार और संपादक.
एक हिंदी की चुप्पी का प्रतिनिधि तो दूसरा हिंदी की चीख का नुमाइंदा.
और ये दोनों लोग ऐसे समय गए जब हिंदी में उत्सवों का शोर जारी है और शनिवार से दिल्ली में विश्व पुस्तक मेला शुरू हो रहा है.
जाहिर है, इनके शोक में भी प्रकाशकों की दुनिया अपने कारोबार की गुंजाइश देखेगी और बहुत सारे स्टॉल्स पर इनकी किताबें शायद पहली कतार में दिखेंगी.
यह जो कुछ कटु सा लगता यथार्थ-बोध, वह शायद अभी ज्ञानरंजन की स्मृति के प्रभाव से ही पैदा हुआ है- आख़िर इस स्मृति से उनका यथार्थ-बोध ग्रहण न करें तो इसका मोल हम काफी कुछ खो देंगे.
अलग सी रही ज्ञानरंजन की कहानी
यह सच है कि ज्ञानरंजन इन दिनों बहुत सक्रिय नहीं थे, कहानियां लिखना वे कबकी छोड़ चुके थे, 'पहल' को भी बंद कर चुके थे और सार्वजनिक व्याख्यानों, साक्षात्कारों और मुलाकातों में व्यस्त थे, लेकिन उनके जाने से जो शोक हिंदी संसार में पसर सा गया, उससे पता चलता है कि हिंदी की दुनिया उन्हें कितनी श्रद्धा और कितने सम्मान के साथ देखती थी.
हालांकि शायद 'श्रद्धा' जैसा शब्द उन्हें रास नहीं आता, लेकिन यह सच है कि हिंदी की दुनिया अपने इस लेखक-संपादक को प्यार करती थी.
ज्ञानरंजन से इस लगाव की वजह क्या थी? सबसे ज़्यादा तो वे कहानियां जिन्होंने साठ के दशक की कथा-चेतना पर हावी कुछ रोमानी मध्यवर्गीयता का शीशा तोड़ते हुए कहानी को एक नई गहराई दी.
बीते साल दिसंबर में साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल का निधन हो गया था.
उनकी कहानियां घटनाओं से नहीं, प्रक्रियाओं की अद्भुत समझ से बनती थीं. वे जीवन के उन कोणों को सहसा देख लेते थे जो बाक़ी लोगों की नज़र से छुप जाते. 'अमरूद का पेड़' एक मामूली कहानी होती अगर उसके पीछे ज्ञानरंजन की बहुत पैनी भाषा और दृष्टि न होती. उन जैसा कथाकार ही देख सकता था कि बहुत सारी रूढ़ियों को अंगूठा दिखाने वाली मां के भीतर अमरूद के पेड़ के अपशकुनी होने का भाव बाद के बरसों में बड़ा होता गया तो इसके पीछे उनकी संतानों की विफलता भी थी. वे लिखते हैं- '...हम लोगों में जब ज़िंदगी की बुलंदी विकसित हो रही थी, तभी मां को रूढ़ि और अशुभ के मिथ्या भय ने पराजित कर दिया. शायद मां की हम संतानें उन्हें अशुभ से लड़ सकने की अपनी सामर्थ्य का आश्वासन नहीं दे सकी थीं. मैंने पाया कि मां के चेहरे पर वह भय जो क्षणजीवी हुआ करता था, अब गहरा गया है.' कहानी यहीं ख़त्म नहीं होती. अगली पंक्तियां बताती हैं कि मां के भीतर अगर यह भय पैठा था तो इसलिए भी परिवार के भीतर तरह-तरह के दुख पैठ रहे थे.
इसी तरह 'पिता' कहानी में गर्मी की रात में घर के बाहर बिस्तर लगाए, हर तरह की सुविधा या सज्जा का तिरस्कार करते, अपने तर्क और पक्ष से पूरे घर को झुकाते पिता का फिर भी ऐसा करुण चित्र बनता है कि हम देर तक सोचते रह जाते हैं. 'बहिर्गमन' कुलीन बौद्धिकता की अश्लील और क्रूर अमानुषिकता से परदा हटाती कहानी है तो 'घंटा' ज़िंदगी की तलछट में खुद को गर्क करते, फिर उसी के पीछे भागते और उससे निकलने को छटपटाते किरदारों की पिटती मनुष्यता की दास्तान है.
ख़ास बात यह है कि ज्ञानरंजन के लगभग सारे किरदार या कथावाचक बहुत सोचते हुए किरदार हैं- और उनमें ज्ञानरंजन की अचूक-असंदिग्ध भाषा को बहुत सहजता से पहचाना जा सकता है. इस भाषा में भी पर्याप्त रेंज है, लेकिन अंततः इस भाषा को पता है कि उसे कहां किस तरह लगना और पहुंचना है. इसी भाषा से ज्ञानरंजन अपनी कहानियों में वह तनाव पैदा करते हैं जो इन्हें अप्रतिम और विलक्षण बनाता है. अन्यथा यह एक जैसी भाषा ज़रा सी लापरवाही में कथा-शिल्प के लिहाज से एक तरह का नुक़्स मान ली जाती. आख़िर किरदारों का अपना लहजा होना चाहिए, लेखक का नहीं. लेकिन ज्ञानरंजन किसी ज़िद की तरह अपनी भाषा बचाए रखते हैं- उन्हें पता है कि इसी से वे यथार्थ का जादू संभव कर रहे हैं. महज क़रीब 25 कहानियों के बल पर हिंदी के साहित्यिक संसार में यह स्थान और सम्मान हासिल करने का कोई दूसरा उदाहरण तत्काल याद नहीं आता.
संपादक ज्ञानरंजन और उनकी ‘पहल'
लेकिन कथाकार ज्ञानरंजन जितने बड़े हैं, शायद संपादक ज्ञानरंजन उससे दो हाथ और बड़े हैं- बल्कि इन दोनों का होना जिस व्यक्ति ने संभव किया है, वह कुछ और बड़ा है. 'पहल' बस अपनी बौद्धिक सामग्री की वजह से ही बरसों-बरस हिंदी वालों की महबूब पत्रिका नहीं बनी रही, उसके संपादक की जो सार्वजनिक सक्रियता रही, उनका जो वैचारिक हस्तक्षेप रहा, हिंदी की लेखक-दुनिया से उनका जो बहुत क़रीबी संबंध रहा, दोस्ती-दुश्मनी को पूरी ईमानदारी से निभाने का जो जज़्बा रहा, बहस करने और लड़ाइयां लड़ने के लिए जो अतिरेक तक जाती अवस्थिति रही, उसने भी उनका आकर्षण और आतंक एक साथ पैदा किया- या दोनों को जोड़ कर कहें- एक आकर्षक आतंक पैदा किया. 'पहल' हिंदी की उन पत्रिकाओं में रही जिनमें छपना सबसे सम्मान की बात समझी जाती थी. बल्कि 'पहल' को पढ़ना और सहेज कर रखना भी अपने बौद्धिक होने की पहचान और ज़रूरत से जुड़ा मामला था. उसके कई अंक अब भी याद आते हैं. 'पहल' का इतिहास अंक मेरे पास अब भी सुरक्षित है- उसके कई और अंकों के साथ.
ज्ञान जी से मेरे रिश्ते के तार सबसे पहले मंगलेश जी की मार्फ़त जुड़ते हैं. कभी वे मंगलेश जी से मिलने आए थे, तभी उनसे पहली मुलाकात हुई. उनमें एक गहरी और उत्तेजक संवादधर्मिता थी. मैंने पाया कि मेरी लिखी कुछ टिप्पणियां उन्होंने बहुत ध्यान से पढ़ीं और फिर मुझे बताया भी. लेकिन 'पहल' से मेरा जुड़ाव पत्रिका के दूसरे दौर में हुआ. उनकी प्रेरणा से मैंने पहल में कुछ टिप्पणियां लिखीं. मेरी कहानी 'हत्यारा' भी वहां प्रकाशित हुई. एक कहानी उन्होंने वापस भी की, लेकिन जब वह दूसरी जगह छपी तो उन्होंने उसकी तारीफ़ की.
वह आख़िरी मुलाक़ात और आख़िरी बातें
उनसे आख़िरी आत्मीय मुलाकात का अवसर उनके घर पर मिला. यह शायद 2022 का साल था जब जलम के न्योते पर मैं जबलपुर में था. रवींद्र त्रिपाठी और मैं उनके घर गए. वहां भी खूब गर्मजोशी भरी बातचीत हुई. उन्होंने बताया कि अपनी कहानी ‘बहिर्गमन' उन्होंने श्रीकांत वर्मा और निर्मल वर्मा को ध्यान में रखते हुए लिखी थी, हालांकि साथ में जोड़ा कि कहानियां तथ्यों पर नहीं होतीं. ईमानदारी की बात है कि उनके इस ‘रहस्योद्घाटन' पर मैं देर तक सोचता रहा. दरअसल कहानी की उनकी समझ बेहद साफ़ थी जो फिर दुहराना होगा कि यथार्थ की उनकी समझ से निकली थी. इस समझ में वे जितना बाहर के दृश्य देखते थे, उससे ज़्यादा उसमें निहित प्रक्रिया और तंत्र को पकड़ते थे. उदाहरण के लिए अगर वे बाज़ार का ज़िक्र करते तो उस विराट पूंजी तंत्र और सत्ता तंत्र के गठजोड़ के बिना नहीं, जिससे यह बाज़ार संभव हो रहा है और लगातार हमारे घरों तक घुसपैठ कर गया है.बाद के वर्षों में प्रकाशित उनकी दो किताबों ‘अमरूद की ख़ुशबू' और ‘उपस्थिति का अर्थ' में शामिल उनके व्याख्यानों, साक्षात्कारों और संस्मरणों से गुज़रते हुए यह खयाल आता रहा कि उन्होंने हिंदी के बौद्धिक संसार को किस गहराई से प्रेरित-प्रभावित किया है. प्रगतिशील लेखक संघ से अपने जुड़ाव के साथ उन्होंने साहित्य की सार्वजनिक भूमिका को बार-बार अपने ढंग से सक्रिय किया और इसमें व्यक्तिगत दुराग्रहों तक छूती हुई साहित्यिक रस्साकशी से भी गुरेज़ नहीं किया. जाहिर है, कुछ के लिए वे कुछ अलोकप्रिय या अस्वीकार्य भी हुए होंगे, जैसे कई दूसरे उनके लिए थे, लेकिन इसकी उन्होंने परवाह नहीं की.
उनसे आख़िरी लेकिन बहुत संक्षिप्त बातचीत उनके जन्मदिन पर हुई थी. मैंने पहले वाट्सऐप पर संदेश भेजा और फिर फोन किया. उन्होंने बधाई स्वीकार की और बताया कि कुछ लोग आए हुए हैं. लेकिन उसके पहले एक लंबी बातचीत का सुख उनसे मिला. मुझे विजयदेव नारायण साही पर केंद्रित रज़ा फाउंडेशन के आयोजन में ‘कॉफ़ी हाउस में इंतज़ार' विषय पर अपनी बात रखने का न्योता मिला था. मैंने इसकी तैयारी के सिलसिले में ज्ञान जी को भी फोन किया- उनसे मैं कॉफी हाउस संस्कृति के बारे में कुछ समझना चाहता था. फोन उठाते ही उन्होंने छूटते कहा, ‘प्रियदर्शन बताओ, क्या बात है, मैं जल्दी में हूं.‘ मैंने जल्दी-जल्दी बताया कि मैं कॉफी हाउस के उनके अनुभव सुनना चाहता हूं. इसके बाद कम से कम 20 से 25 मिनट तक वे धाराप्रवाह भारत में इंडियन कॉफी हाउस के इतिहास और उसकी संस्कृति पर बोलते रहे. वे भूल चुके थे कि उन्हें जल्दी थी. उन्होंने याद दिलाया कि इस कॉफी हाउस की कॉफी की गंध और उसका स्वाद दूसरे बड़े ब्रांड्स की कॉफी से काफ़ी अलग और विशिष्ट होता है. उनसे बात करते-करते लगा कि उनकी आवाज़ में भी कॉफी की गंध और उसका स्वाद छलक रहे हैं. यह भी समझ में आया कि दोस्ती की हो झगड़े, उन्होंने जीवन पूरी जीवंतता के साथ जिया है, उसका पूरा रस लिया है.
उनकी आवाज में जो कलफ लगी कड़क थी, वह कभी-कभी मुझे हबीब तनवीर की आवाज़ की याद दिलाती थी. उनकी आंखों में एक लरजती हुई बेचैनी थी जो उनके युवा दिनों की तस्वीरों में जितनी प्रखर है उतनी ही उनके अंतिम वर्षों की तस्वीरों में. इस कड़क और बेचैनी के साथ एक आत्मीय ऊष्मा होती थी जो सबको उनसे जोड़ देती थी. चलते-चलते उन्होंने अपनी किताब ‘अमरूद की खुशबू' मुझे दी, जिसकी एक प्रति पहले ही मैं ख़रीद चुका था. लेकिन उनके दस्तख़त के साथ वह प्रति मेरे लिए अब एक थाती बन चुकी है.
बीते साल नवंबर में उन्होंने 89 साल पार किए थे. उनके न रहने की सूचना मिलते ही लगा कि हिंदी में ऊर्जा और ऊष्मा का एक स्रोत ख़त्म हो गया.
डिस्क्लेमर: लेखक एनडीटीवी इंडिया के सीनियर एग्जीक्यूटिव एडिटर हैं. इस लेख में दिए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.














