तब मैं बमुश्किल 14 साल की थी, जब पहली बार दिल्ली के जिमखाना क्लब के हरे-भरे लॉन पर कदम रखा था. मैं नेशनल टेनिस चैंपियनशिप में हिस्सा लेने के लिए राजधानी आई थी, यह मेरा पहला नेशनल टूर्नामेंट था, उस स्तर पर प्रतिस्पर्धी टेनिस का मेरा पहला अनुभव था, साथ ही साथ यह दिल्ली से मेरी पहली मुलाकात थी.
मैं अमृतसर से अपने जोशीले साथी टेनिस खिलाड़ियों के ग्रुप के साथ आई थी. उस ग्रुप में मैं अकेली लड़की थी. बिना रिजर्वेशन वाले थर्ड-क्लास रेलवे डिब्बे में सफर कर हम दिल्ली पहुंचे थे. उस सफर में हमारे पास टेनिस के सपने और स्पोर्ट्स कंसेशन टिकट के साथ नई उम्र का जोश था. तब हम इतने छोटे थे कि हमें किसी तरह की तकलीफ महसूस नहीं हुई. हम इतने उत्साहित थे कि मुश्किलों का पता ही नहीं चला.
तब मुझे जरा भी अंदाजा नहीं था कि जिस शहर में मैं जा रही हूं, वह एक दिन मेरा हमेशा के लिए घर बन जाएगा.
अमृतसर की एक छोटी लड़की जिसे कम दूरी, सादे माहौल और रिक्शे की सवारी की आदत थी, उसे दिल्ली बहुत ही शानदार लगी. यह शहर मेरे सामने एक भव्य मंच की तरह खुला. चौड़ी सड़कें, आलीशान इमारतें, और एक ऐसी अहमियत का अहसास, जिसका अनुभव मैंने पहले कभी नहीं किया था.
हम फिरोजशाह रोड पर बने सादे फ़्लैट्स में रुके—जो सांसदों के रहने की जगहें थीं. जहां से रोजाना मैच के लिए जिमखाना क्लब जाते थे. वे सफर आज भी मेरी यादों में ताजा हैं. हम जनपथ, कनॉट प्लेस, इंडिया गेट, राष्ट्रपति भवन, तीन मूर्ति और प्रधानमंत्री आवास से गुजरते हुए, आखिरकार जिमखाना क्लब के शानदार मैदानों में पहुंचते थे.
मेरे लिए, वह क्लब किसी जादू से कम नहीं था.
उसके विशाल लॉन, औपनिवेशिक शैली की वास्तुकला, टेनिस कोर्ट और शांत भव्यता—एक ऐसी दुनिया को दर्शाते थे, जिसे मैंने पहले कभी नहीं जाना था. जिमखाना महज एक खेल का मैदान नहीं था, बल्कि यह एक ऐसी जगह थी, जिसने मेरी कल्पनाओं को विस्तार दिया. वहां एक किशोरी के रूप में खड़े होकर, मुझे लगा कि मेरी दुनिया और भी बड़ी हो गई है.
मैं अचानक बड़ी हो गई, और मेरे सपने भी.
मैंने दिल्ली में अपने भविष्य के बारे में सोचना शुरू कर दिया था, पढ़ाई करना, काम करना, और शायद एक दिन इस शहर का हिस्सा बन जाना. एक ऐसा शहर जो सत्ता, उद्देश्य और संभावनाओं से भरा है. मैंने लुटियंस दिल्ली के हरे-भरे इलाकों के बीच रहने, खेल खेलने और एक सार्थक जीवन बनाने का सपना देखा था.
जीवन ने एक असाधारण तरीके से उन सपनों को सच कर दिखाया.
कई साल बाद ASP, चाणक्यपुरी के तौर पर मेरी पहली पोस्टिंग मुझे ठीक उसी इलाके में वापस ले आई. जिन सड़कों पर मैं कभी एक किशोर टेनिस खिलाड़ी के तौर पर चला करती थी, वे अब मेरे लिए एक जाना-पहचाना पेशेवर क्षेत्र बन गई थीं. तब तक, जिमखाना क्लब मेरी यादों में पहले ही एक खास जगह बना चुका था.
अपनी पहली यात्रा के बाद के सालों में, मैं टूर्नामेंट के लिए अक्सर दिल्ली आती रही. यहां मैंने प्रतिस्पर्धी टेनिस खेला और धीरे-धीरे अपनी राष्ट्रीय रैंकिंग में सुधार किया. मैंने उन कोर्ट्स पर कड़े मुकाबले खेले—कुछ जीते, कुछ हारे, और हर मैच से कुछ न कुछ सीखा. मेरी पीढ़ी के युवा खिलाड़ियों के लिए, जिमखाना क्लब आकांक्षाओं का शिखर था. इसके घास वाले कोर्ट देश के सबसे बेहतरीन कोर्ट्स में से एक थे.
हम खिलाड़ियों की एक जोशीली पीढ़ी से थे. विदेश से लाए गए स्पोर्ट्सवियर में सजे-धजे, Slazenger और Symonds के लकड़ी के रैकेट लिए, Dunlop और COSCO की गेंदों से खेलते हुए, पूरी लगन और जवानी के आत्मविश्वास के साथ बेहतरीन प्रदर्शन की ओर बढ़ते हुए.
जिमखाना मेरे विकास का एक हिस्सा बन गया, सिर्फ एक खिलाड़ी के तौर पर ही नहीं, बल्कि एक इंसान के तौर पर भी. 1975 में दिल्ली में मेरी पोस्टिंग के बाद मैंने यहां मेंबरशिप के लिए आवेदन किया. तब मुझे उस जमाने की एक ऐसी बात का सामना करना पड़ा जिससे उस समय की सोच का पता चलता था. मुझे "लेडी मेंबरशिप" की पेशकश की गई, जिसमें वोट देने का कोई अधिकार नहीं था.
मैंने तुरंत इसका विरोध किया. महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने से कैसे मना किया जा सकता था?
क्लब ने तुरंत इस गड़बड़ी को ठीक कर दिया. यह न सिर्फ मेरे लिए, बल्कि उन दूसरी महिलाओं के लिए भी जो मेरे बाद आने वाली थीं. यह समानता की दिशा में एक छोटा, लेकिन बहुत ही अहम कदम था.
फिर भी जिमखाना ने मुझे एक और बिल्कुल ही अलग और अनचाहे तरीके से भी संवारा.
सड़क के उस पार प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का आवास था. क्लब के लॉन से, मैंने प्रदर्शनों, घुड़सवार पुलिस की कार्रवाई, भीड़ नियंत्रण और यहां तक कि आंसू गैस के इस्तेमाल को भी देखा. उस समय पूरी तरह से अहसास न होते हुए भी, मैं एक और तरह की शिक्षा ग्रहण कर रही थी.
एक तरफ टेनिस. दूसरी तरफ पुलिसिंग.
दोनों ने ही मेरे जीवन पर गहरा प्रभाव डाला.
आज इंदिरा गांधी का आवास इतिहास की एक यादगार के रूप में संरक्षित है. और अब जिमखाना क्लब के भविष्य को लेकर अनिश्चितता की खबरें सुनकर मैं खुद को गहरे चिंतन में डूबने से रोक नहीं पाती हूं.
क्या हम सचमुच ऐसी संस्थाओं को केवल जमीन और बुनियादी ढांचे से जुड़े सवालों तक ही सीमित कर सकते हैं? जिमखाना महज़ एक इमारत या कोई कीमती जमीन का टुकड़ा नहीं है. यह एक जीवंत विरासत है. यह कई पीढ़ियों की यादों को संजोए हुए है—खिलाड़ियों, सैनिकों, पेशेवरों, परिवारों और समुदायों की यादें.
कई सेवानिवृत्त सैनिकों और महिलाओं के लिए—विशेष रूप से उन लोगों के लिए जो मामूली पेंशन पर गुजारा करते हैं—यह क्लब मनोरंजन से कहीं बढ़कर है. यह उन्हें साथ-संगत, एक नियमित दिनचर्या, गरिमा और अकेलेपन से राहत देता है. शाम के समय लॉन में होने वाली बातचीत, जाने-पहचाने चेहरे और अपनेपन का एहसास ही अक्सर सेवानिवृत्ति के बाद लोगों को जीवन में आगे बढ़ने की हिम्मत देते हैं.
कुछ संस्थाएं महज भौतिक स्थान से कहीं बढ़कर होती हैं.
वे यादों, आकांक्षाओं, जन-भावना और मानवीय जुड़ाव का भंडार होती हैं.
मेरे लिए जिमखाना क्लब हमेशा वही जगह बना रहेगा, जहां एक चौदह साल की लड़की ने पहली बार अपनी छोटी सी दुनिया की सीमाओं से परे जाकर सपने देखना शुरू किया था और चुपचाप उस जीवन की कल्पना करना शुरू किया था, जिसे वह एक दिन जिएगी, और जिसे वह आज भी जी रही है.
लेखक परिचयः किरण बेदी भारत की पहली लेडी IPS ऑफिसर हैं. वो केंद्रशासित प्रदेश पुडुचेरी की उप राज्यपाल भी रह चुकी हैं.
अस्पष्टीकरणः यह लेखक के निजी विचार है.














