‘कलियुग करुणा छोड़ि कै, धर्यो पाप को साध'
( तुलसीदास)
हाल ही में गाजियाबाद के एक रिहाइशी इलाके में किशोर वय की तीन बहनों ने नौ मंजिले घर की खिड़की से एक साथ कूद कर आत्महत्या कर ली. इस घटना की सूचना मिलते ही मुझे साल 2011 के अप्रैल महीने में नोएडा की दो बहनों की छह महीने घर में भूखे बंद रहने से हुई मौत की ख़बर याद आ गई. करीब 15 साल पहले घटी यह घटना परिवार और समाज के टूटन और मनुष्यता के तंतुओं के कमजोर होने की प्रतीक- घटना थी. हृदय तब भी हाहाकार कर उठा था. चालीस की उम्र के आसपास की दो अनब्याही बहनें, जिन्होंने अपने भाई को पढ़ा-लिखा कर काबिल बनाया और ऐसा करने में अपने जीवन की सुध नहीं ले सकीं और परिणाम यह हुआ कि न तो भाई ने और न ही परिवार के अन्य नाते-रिश्तेदारों ने और न ही आस-पड़ोस न उन बहनों की सुध ली. उन्हें इतनी मार्मिक और अमानवीय मौत मरना पड़ा.
आभासी दुनिया का प्रेत
इन 15 सालों में मनुष्यता की कहानी ने और भी भयावह रूप धारण कर लिया है. आज की व्यवस्था मनुष्य के मन को अपने यर्थाथ से काट कर आभासी दुनिया का प्रेत बनाती जा रही है. और आभासी दुनिया के जंगल में गुम यह प्रेत एक दिन आपको चुपके से निगल लेता है और किसी को ख़बर तक नहीं होती. गाजियाबाद की इन तीन बहनों की उम्र 16, 14 और 12 साल थी. मीडिया की रपटों के मुताबिक 10 दिन पहले पिता ने इनके सोशल मीडिया एकांउड मिटा दिए थे. इनका एक यूटयूब चैनल भी था, जिसके दो हजार फॉलोअर थे. ख़बर यह भी है कि पिता ने उनसे मोबाइल फोन ले लिया था और घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने के कारण उसे बेच दिया था. एक अखबार के मुताबिक इन तीनों बच्चियों के पिता ने तीन बहनों से एक साथ ब्याह किया था. तीनों बहनें साथ रहती हैं. आत्महत्या करने वाली तीन बच्चियों के अलावा उस घर में एक दो साल की बच्ची और एक बेटा भी है. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक तीनों बच्चियां कोविड के बाद से कभी स्कूल नहीं गई थीं. वे घोर अकेलेपन का शिकार थीं. इसी एकाकीपन ने संभवतः उन्हें डीजिटल संसार के भयानक जंगल में पहुंचा दिया होगा, जहां उनके मन प्रेत में तब्दील हो गए. अंततः मन के प्रेत ने उनकी जान ले ली.
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पिता का कहना है कि तीनों बहनें पूरी तरह से कोरियन-संस्कृति में रम गई थीं. उसे ही यर्थाथ मानकर जीने लगी थीं. उन्होंने अपने नाम तक कोरियन रख लिए थे. वह चाहती थीं कि पूरा परिवार ही कोरियन जीवनशैली अपना ले. परिवार का इससे इनकार कर देने की घटना ने भी उनके मन पर गलत प्रभाव डाला होगा.
भारत में मानसिक-स्वास्थ्य
इन तीन बच्चियों की आत्महत्या हमारे समय और समाज के भयानक यथार्थ को अभिव्यक्त कर रही है कि आत्यांतिक लोभ और मुनाफे के लिए वासना, नंगी कामुकता, वीभत्स. हिंसा और भावनात्मक-दरिद्रता से बनी एक ऐसी झूठी चमकदार दुनिया रची जा रही है, जहां मनुष्य अपने भीतर के सत्व को खोकर स्वयं ही प्रेत बनता जा रहा है- एक ऐसा प्रेत जो स्वयं ही अपनी चिता सजा रहा है. हो सकता है कि आप पाठकों को मेरी बात अतिशयोक्ति लगे तो हाथ कंगन को आरसी क्या! लगे हाथों हम भारत के मानसिक-स्वास्थ्य के हालात पर भी एक नज़र डाल लेते हैं.
नेशनल मेंटल हेल्थ सर्वे के अनुसार भारत में हर सातवां व्यक्ति किसी न किसी मानसिक विकार से ग्रसित है. 15 करोड़ से अधिक भारतीयों को पेशेवर मानसिक सहायता की आवश्यकता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि भारत में 20 करोड़ से ज्यादा लोग अवसाद और चिंता जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं. लेकिन इनमें से केवल 10-15 फीसद लोगों तक ही इलाज पहुंच पाता है. वहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन (2022) के आंकड़े बताते हैं कि भारत में एक साल में 1.64 लाख से अधिक आत्महत्याएं हुईं. हर दिन औसतन 450 से अधिक लोग जीवन समाप्त कर लेते हैं. आत्महत्या करने वालों में बड़ी संख्या युवाओं और महिलाओं की है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, भारत में प्रति एक लाख लोगों पर एक से भी कम मनोचिकित्सक उपलब्ध हैं. ग्रामीण और छोटे शहरों में काउंसलिंग की सुविधा लगभग न के बराबर है. सरकारी अस्पतालों में मानसिक स्वास्थ्य अब भी प्राथमिकता नहीं है.
बच्चों को कब दें मोबाइल
भारत में मनोरोगियों की तेजी से बढ़ती संख्या के लिए पारिवारिक-सामाजिक-आर्थिक कारणों से कम बड़ा कारण डीजिटल वर्ल्ड नहीं है. अपने यर्थाथ से बिल्कुल अलहदा चकाचैंध से भरी काल्पनिक दुनिया को लगातार देखने से बाल और किशोर मन उसे ही सच मान बैठता है. जब अपने आसपास उसे वह दुनिया नहीं दिखाई देती तो वह गहन निराशा और अवसाद के क्षणों में वह कदम उठा लेता है, जो इन तीन बहनों ने उठा लिया. इसीलिए दुनिया के कई देशों ने तो बच्चों के हाथों में मोबाइल देने की उम्र भी तय कर दी है और उनके डीजिटल उपभोग पर प्रतिबंध लगा दिए हैं. जाहिर है कि इन कदमों का उद्देश्य बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य, एकाग्रता और सामाजिक विकास को डिजिटल लत और आभासी दुनिया के दुष्प्रभावों से बचाना है. फ्रांस, दक्षिण कोरिया, ब्राज़ील और कई यूरोपीय देशों में स्कूलों में मोबाइल फोन के उपयोग पर प्रतिबंध लागू किया गया है, जबकि ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर रोक लगाई है. अमेरिका और ब्रिटेन में बच्चों की ऑनलाइन गोपनीयता और डेटा सुरक्षा से जुड़े क़ानून बनाए गए हैं, जिनमें अभिभावक की सहमति अनिवार्य है.
इन तीन बहनों की हृदयविदारक मौत कलयुग के बढ़ते प्रकोप की सूचना दे रही है. कृष्ण के पैर में बहेलिए का तीर गहरा और गहरा घाव करता जा रहा है. भक्त- कवि तुलसीदास जी का कहा आज बिल्कुल साकार हो रहा है-
''लोभ मूल सब रोग का, झूठ-कपट अपराध.
कलियुग करुणा छोड़ि कै, धर्यो पाप को साध.''
हर धर्म के विभिन्न धर्म ग्रंथों में कलियुग या कि कलिकाल के लगभग एक ही तरह के लक्षण बताएं गए हैं- लगभग सभी धर्मग्रंथ- हिंदू (विष्णु पुराण, भागवत पुराण), बौद्ध (दीघ निकाय), जैन (आगम ग्रंथ), सिख (गुरु ग्रंथ साहिब), इस्लाम (क़ुरान व हदीस) और ईसाई (बाइबिल) इस बात पर एकमत हैं कि अंतिम युग यानि कि कलियुग में सत्य, करुणा और नैतिकता का ह्रास होगा, स्वार्थ, हिंसा, असत्य, पारिवारिक विघटन और आध्यात्मिक शून्यता बढ़ेगी. इन ग्रंथों में यह चेतावनी भी निहित है कि ऐसे अंधकारमय समय में व्यक्ति का सदाचार, आत्मसंयम और मानवीय मूल्य ही समाज को पतन से बचाने का एकमात्र मार्ग है.
घोर कलियुग से कैसे बचें
आखिर हमारा देश घोर कलियुग के प्रकोप से कैसे बचे भला! सरकार को भी आभासी दुनिया के खतरे को समझ कर इसके उपभोग पर नियंत्रण संबंधी कानून लाने चाहिए. हमारा परिवार और समाज जो धनलोलुप और उपभोगी बनता जा रहा है, उसे ठहर कर सोचना होगा कि अंततः उनकी धनलोलुपता और यांत्रिक-उपभोग ने उन्हें, उनके परिवार और समाज को क्या दिया है? इस घोर कलियुगी समय में हम सबको अपने तईं एक सतयुगी दुनिया रचनी ही होगी- छल-प्रपंच, अतिशय लोभ, व्यभिचार, व्यसन को छोड़कर सेवा, सद्भाव और प्रेम की दुनिया की ओर लौटने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है. जीवन को अध्यात्म से जोड़े बिना 'मन के प्रेत' पर काबू पाना अत्यंत मुश्किल है. अगर अब भी हम न चेते तो आगे का समय और भी विकराल होने वाला है.
तो चलिए स्वयं से लेकर सृष्टि तक को बचाने की पहल अभी से प्रारंभ करते हैं- किसी से प्रेमिल संवाद करते हैं, किसी को पूरे दिल से सुनते हैं. किसी को आज छोटी ही सही, कोई ख़ुशी देते हैं. डिजिटल आभासी दुनिया से बाहर निकल कर यथार्थ की दुनिया को देखेते हैं- देखिए तो! फूलों का यह मौसम सौंदर्य और प्रेम की दावत दे रहा है! किसी ऐसे दोस्त को साथ लेकर उन्हें फूलों की दुनिया में ले जाएं, जिन्होंने बहुत समय से स्क्रीन के बाहर छांक कर देखा नहीं...
डिस्क्लेमर: लेखिका मेधा दिल्ली विश्वविद्यालय के सत्यवती कॉलेज में पढ़ाती हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखिका के निजी हैं और उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.














