'खूबसूरत हैं बहुत रास्ते खो जाऊँगा
अब मुझे नींद जहां आएगी सो जाऊँगा'
बशीर बद्र की शायरी के साथ हमारा संबंध काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू)के छात्र दिनों से है. बीएचयू की विचार संस्कृति काव्य प्रधान है. यहां विज्ञान के छात्रों में भी समाज विज्ञान और साहित्य के छात्रों के जितना ही रस बोध होता है. शायद इसलिए इसका कुल गीत 'मधुर-मनोहर-अतीव-सुन्दर...', यहां के एक विज्ञान के विद्वान का रचा हुआ है. हमने यहां रहते हुए ही बशीर बद्र को सुना और गुनगुनाया था. सुनने-सुनाने की संगत अक्सर हॉस्टल के कमरों में या कैंपस के भीतर की किसी चाय की दुकान पर होती रहती थी. बशीर बद्र की शायरी विमर्श के इन अनौपचारिक केंद्रों का केंद्रीय विषय हुआ करती थी. उन्होंने अपनी शायरी में प्रेम, विरह, अकेलापन, रिश्तों की नर्मी और बदलते मानवीय संबंधों की त्रासदी को जिस सहजता से व्यक्त किया, उसी तरह सत्ता की विद्रूपताओं पर भी बिना किसी शोर-शराबे के हमला बोला. दुर्भाग्य से आज वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन गजलों और शायरी की दुनिया में बशीर बद्र का नाम हमेशा अदब,नफ़ासत और इंसानी जज़्बातों की महक के साथ लिया जाएगा.एक बार में जब उन्होंने यह पंक्ति सुनाई तो पूरा सभागार सम्मान में उठ खड़ा हुआ था-
''कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो''
कवि और संवेदनशील शिक्षक
छात्रों के लिए, जो अक्सर देश के अलग-अलग क्षेत्रों से आते थे, उनके लिए यह एक चौंकाने वाला तथ्य था. उन्होंने तो सीखा था कि संबंधों में आगे-बढ़कर पहल करो, लेकिन इसके उलट बशीर साहब ने 'फासलों' में संबंधों के संतुलन को दिखाया था. यह बदलते सामाजिक संसार का एक बड़ा सच है. हम विद्यार्थियों के बीच वे केवल एक शायर और कवि नहीं, बल्कि जीवन को समझने और समझाने वाले एक संवेदनशील शिक्षक की तरह थे. हम सब उनकी पंक्तियों में अपने छात्र जीवन की जटिलताओं का समाधान देखते थे. उस समय बीएचयू में छात्र आजकल की तरह लैपटॉप बैग के बदले कपडे के 'झोले' रखा करते थे. उन झोले में पाठ्यक्रम से अधिक साहित्य और काव्य की किताबें हुआ करती थीं. उनकी किताबें भी हमारे झोले का अनिवार्य हिस्सा थीं, जिनसे निराशा के क्षणों में हम जीवन-उर्जा पाते थे.
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बशीर बद्र ने उस मान्यता को ध्वस्त कर दिया कि शायरी और गजलों को समझने और गुनने के लिए कठिन अरबी-फ़ारसी शब्दकोष की अनिवार्यता है. उन्होंने गंभीर से गंभीर विषयों पर बड़ी सहजता से और बोल-चाल के शब्दों के द्वारा लिखा. उन्होंने अपने काव्य में जिस तरह के शब्दों का चयन किया उसने शायरी और गजलों की मजहबी,भाषाई और क्षेत्रीय सीमाओं को तोड़ दिया. भाषा, शिल्प और शैली के संदर्भ में देखें तो अक्सर हम इन्हें दुष्यंत कुमार की श्रेणी में रखते थे. इनकी शायरी में शब्दों का भारी-भरकम बोझ नहीं था, बल्कि विचारों का सहज और सामान्य प्रवाह था. उनका रचना संसार बड़ा व्यापक था. उन्होंने समाज और सत्ता को भी अपनी शायरी से मनुष्यता का पाठ पढ़ाया. एक शेर में वे कहते हैं-
'लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में'
सांप्रदायिक दंगों में बड़ी आसानी से आम आदमी के घरों को तोड़ दिया जाता है, जला दिया जाता है. लोग भूल जाते हैं कि घर केवल एक भौतिक रचना नहीं होती. यह अनुभव और स्मृतियों का अदृश्य आकाश भी होता है. इससे डरावना और क्या हो सकता है कि लोग अपने ही लोगों के अस्तित्व को मिटा देते हैं. इसी तरह से इनकी एक अन्य पंक्ति में अभिव्यक्ति के खतरे को लेकर उनकी चिंता दिखती है, जिसे पढ़ते हुए मुक्तिबोध की पंक्ति, 'अभिव्यक्ति के खतरे उठाने ही होंगे', की याद आ जाती है-
'मैं बोलता हूं तो इल्ज़ाम है बग़ावत का
मैं चुप रहूं तो बड़ी बेबसी सी होती है'
भाषा अपने आप में एक सामाजिक संस्था है, जो समकालीन राजनीति और अर्थव्यवस्था से मुक्त नहीं होती. इसलिए काव्य का कोई भी स्वरूप मात्र मनोरंजन की विषयवस्तु नहीं रह जाती. यह सामाजिक चेतना को निर्धारित करती है, जो स्थायित्व या परिवर्तन को दिशा देती है. काव्य शून्य में विकसित नहीं होता, यह सत्ता और समाज से मिले अनुभव का ही परिणाम है. काव्य शब्दों का सबसे श्रेष्ठ रूप भी है. इसलिए दुनिया की अधिकांश धार्मिक रचनाएं काव्यात्मक शैली में ही लिखी गई हैं. यह श्रेष्ठ स्वरूप मानवीय संवेदनशीलता से ही रचा जा सकता है. दुर्भाग्य से आज काव्य साहित्य की सबसे कम पढ़ी जाने वाली विषय-वस्तु बन गई है. कविताओं और शायरी के स्थान पर विचारहीन तुकबंदी ने अपना डेरा जमा लिया है, जिसे टीवी और अन्य जगहों पर देखा जा सकता है. यह याद रखा जाना चाहिए कि कविता सबसे पहले एक विचार है. यह हमें सोचना सीखाती है और फिर हमारी चेतना को जीवंत बनाती है. दुनिया के महान लोगों के भीतर अक्सर एक काव्य हृदय देखा गया है. जिस समाज से काव्य विलुप्त होता है, समझिए वह समाज धीरे-धीरे मृत्यु की यात्रा कर रहा है. बशीर बद्र अपने लेखन से लगातार समाज और सत्ता को जीवित करने का प्रयास करते रहे, लेकिन कोई भी सदा के लिए नहीं रहता. वे भी अब नहीं हैं, लेकिन उनकी ग़ज़लें और शायरी हमारे बीच रहेंगी- जबतक मनुष्य मनुष्यता पर विचारता रहेगा. वे शायद अपने बारे में ही लिख गए थे-
'एक मुद्दत से इसी जिद में छुपा बैठा हूं
चांद खुद लेने मुझे आएगा तो जाऊंगा'
कल बकरीद का चांद उन्हें अपने साथ ले गया.
(डिस्क्लेमर: समीर शेखर ओडिशा के भुबनेश्वर स्थित कलिंगा इंस्टिट्यूट ऑफ इंडस्ट्रियल टेक्नोलॉजी में अंतरराष्ट्रीय व्यापार और विपणन पढ़ाते हैं.केयूर पाठक इलाहाबाद विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखकों के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)











