पश्चिम बंगाल से पूर्णिया तक स्मैक का साम्राज्य! कोसी-सीमांचल के कई गांव नशे की गिरफ्त में

वजह यह बताई जाती है कि स्मैक अन्य सूखा नशा की तुलना में अधिक असरदार होता है. इससे जुड़े कारोबारियों को लागत की तुलना में मुनाफा भी अधिक होता है. स्मैक चूंकि पॉवडर शक्ल में आता है, लिहाज़ा इसका परिवहन गंतव्य तक आसान होता है.

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शराबबंदी के बाद बिहार में स्मैक का कहर!

Smack trafficking in Bihar: स्मैक या हेरोइन या ब्राउन सुगर या  कहें व्हाइट हॉर्स यानी 'नशा विद डिफरेंस', मतलब नशे की ऐसी प्रजाति जिसके सेवन मात्र से पूरी दुनिया जन्नत नजर आने लगती है.यह वर्चुअल दुनिया का विचरण कराती है जहां धुएं में सब कुछ तैरता नजर आता है. वर्ष 2016 में सूबे में शराबबंदी का सबसे नकारात्मक प्रभाव यह रहा कि गांजा और अफीम को पीछे छोड़ते हुए स्मैक का प्रचलन तेजी से बढ़ता चला गया. इस अवैध धंधे से जुड़कर खुदरा और थोक दोनों तरह के कारोबारियों की चांदी कट रही है.

इस धंधे की खासियत यह है कि इसे पीने वाले से लेकर पिलाने वाले की उम्र 15-25 वर्ष तक की होती है. मतलब युवाओं की फौज या तो नशे की गिरफ्त में है या फिर अपराध की दुनिया से जुड़ चुकी है. पर्दे के पीछे निवेश करने वाले सफेदपोशों और संरक्षक के रूप में पुलिस की अपनी अलग भूमिका है. जानकारी के अनुसार, पूर्वोत्तर भारत से पश्चिम बंगाल के रास्ते कोसी-सीमांचल तक स्मैक की तस्करी हो रही है और पूर्णिया इसका स्वर्णिम-द्वार बना हुआ है. नतीजा यह है कि कोसी-सीमांचल का चप्पा-चप्पा स्मैक से धुआं-धुआं है.ऐसा नही है कि पुलिस स्मैक कारोबार के नेटवर्क पर नकेल डालने का प्रयास नही कर रही है लेकिन तमाम कवायद के वाबजूद धुएं का यह कारोबार थमता नजर नही आ रहा है.

शराबबंदी के बाद बढ़ा सूखा नशा का प्रचलन 

राज्य में शराबबंदी से पहले शराब के साथ-साथ गांजा नशे का विकल्प हुआ करता था. हालांकि ,तब भी गांजा प्रतिबंधित था. लेकिन शराबबंदी के बाद गांजा की तस्करी बढ़ी औऱ बीते 05 वर्षों में गांजा से अधिक स्मैक की तस्करी आरम्भ हो गई. वजह यह बताई जाती है कि स्मैक अन्य सूखा नशा की तुलना में अधिक असरदार होता है. दूसरा, इससे जुड़े कारोबारियों को लागत की तुलना में मुनाफा भी अधिक होता है. तीसरा बड़ा कारण, स्मैक चूंकि पॉवडर शक्ल में आता है, लिहाज़ा इसका परिवहन गंतव्य तक आसान होता है. चौथा कारण, युवाओं की संख्या सर्वाधिक है औऱ स्मैक का सबसे अधिक आदी युवा-वर्ग ही है.
  
बंगाल में तैयार होता है स्मैक

जानकार बताते हैं कि स्मैक अफीम से तैयार होता है. अफीम की खेती प्रतिबंधित है लेकिन पूर्वोत्तर राज्यों में इसकी खेती चोरी-छिपे की जाती है. अफीम के पौधे में गेंद जैसा फूल होता है जिसे डोडा कहा जाता है. इसी डोडा में बारीक चिड़ा लगाकर इससे रस निकाला जाता है जिसे अम्ल कहते हैं. इस अम्ल में चूना डालकर इसे फाड़ा जाता है और इसे छाया में सुखाया जाता है. बताया जाता है कि 01 किलो अम्ल से केवल 100 ग्राम स्मैक तैयार होता है. यह मुख्यतः पाउडर के रूप में बाजार में उतारा जाता है हालांकि यह मटर के दाने के शक्ल में बेचा जाता है.

इस तैयार स्मैक को पूर्वोत्तर राज्यों से देश के अलग-अलग हिस्से में भेजा जाता है. सूत्र बताते हैं कि पश्चिम बंगाल में मालदा के समीप कालियागंज में इसका ट्रांजिट पॉइंट बना है जहां से बिहार में इसे पहुंचाया जाता है. इस लिहाज से पूर्णिया स्मैक और अन्य नशीले पदार्थों का स्वर्णिम द्वार बना हुआ. पूर्णिया के रास्ते ही कोसी-सीमांचल और बिहार के अन्य हिस्से में स्मैक पहुंचती रही है.

पुलिस को मिलती रही है सफलता लेकिन नेटवर्क बरकरार

सही मायने में शराब से अधिक स्मैक की तस्करी पर नकेल कसना पुलिस के लिए आज चुनौती बनी हुई है. वजह यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों का कोना-कोना स्मैक की गिरफ्त से अछूता नही है. केवल जनवरी माह में पूर्णिया पुलिस को लगभग 03 किलो स्मैक की बरामदगी में सफलता मिली है. वहीं इस माह लगभग 60 किलो गांजा भी बरामद हो चुका है. 21 जनवरी को पूर्णिया के केनगर में बड़ी खेप लगभग दो किलो स्मैक बरामद हुआ जिसे बंगाल से पूर्णिया के रास्ते मधेपुरा ले जाया जा रहा था. इससे ठीक एक दिन पहले सरसी में 250 ग्राम स्मैक को बरामद किया गया. हर दो -चार दिन पर स्मैक की बरामदगी और गिरफ्तारी होती रही है लेकिन सूखा नशा के कारोबार पर पूरी तरह नकेल कसने में पुलिस विफल रही है.

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इसकी वजह यह मानी जाती है कि गिरफ्तार शख्स केवल कैरिएर होता है, निवेश करने वाला सफेदपोश पर्दे के पीछे से नशे की सौदागरी करते रहते हैं. नशे का यह कारोबार इसलिए भी फल-फूल रहा है कि लागत की तुलना में फायदा काफी अधिक है.बंगाल और पूर्वोत्तर में इसकी कीमत लगभग 20 लाख रु प्रति किलो होती है जो खुदरा बाजार में 40 लाख रु किलो तक पहुंच जाती है.
     

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