अपनी पार्टी RLM का अब BJP में विलय करेंगे उपेंद्र कुशवाहा? बिहार में सियासी 'खेल' की नई आहट

राष्ट्रीय लोक मोर्चा के विधायकों को लेकर भी लंबे समय से अटकलें लगती रही हैं. कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यदि विलय में देरी हुई या कार्यकर्ताओं में असंतोष बढ़ा, तो पार्टी में टूट की स्थिति भी पैदा हो सकती है.

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  • उपेंद्र कुशवाहा अपनी पार्टी को BJP में विलय करने पर गंभीर विचार कर रहे हैं.
  • 2024 लोकसभा चुनाव में हार के बाद कुशवाहा को राज्यसभा भेजा गया था.
  • कुशवाहा अपने बेटे के राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित करने के लिए भी भाजपा से बातचीत कर रहे हैं.
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पटना:

बिहार की राजनीति में उपेंद्र कुशवाहा और उनकी पार्टी राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के भारतीय जनता पार्टी (BJP) में विलय को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं. बिहार में नई सरकार के संभावित कैबिनेट विस्तार से पहले उपेंद्र कुशवाहा के सामने अपनी पार्टी के भविष्य को लेकर बड़ा फैसला लेने की चुनौती खड़ी हो गई है. सूत्रों के मुताबिक, पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद बिहार में मंत्रिमंडल का विस्तार किए जाने की संभावना है. उससे पहले उपेंद्र कुशवाहा को अपनी पार्टी का भाजपा में विलय करने का प्रस्ताव दिए जाने की बात कही जा रही है. 

विलय की चर्चा के पीछे के कारण

राजनीतिक जानकारों के अनुसार, 2024 लोकसभा चुनाव में हार के बाद भाजपा ने उपेंद्र कुशवाहा को राज्यसभा भेजा था. इसके पीछे मकसद 2025 में होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव में उन्हें एनडीए के साथ बनाए रखना था. विधानसभा चुनाव में उपेंद्र कुशवाहा ने एनडीए के साथ मिलकर चुनाव लड़ा और उनकी पार्टी राष्ट्रीय लोक मोर्चा ने चार सीटों पर जीत दर्ज की. मार्च 2026 में कुशवाहा का राज्यसभा कार्यकाल समाप्त हो गया था, लेकिन एनडीए ने उन्हें दोबारा राज्यसभा भेज दिया. राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि इसके पीछे यह शर्त हो सकती है कि वे अपनी पार्टी का भाजपा में विलय करें. हालांकि, इस संबंध में अब तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है.

बेटे का राजनीतिक भविष्य भी अहम कारण

कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उपेंद्र कुशवाहा अपने बेटे के राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित करने के लिए भी भाजपा से बातचीत कर रहे हैं. चर्चा है कि वे अपने बेटे को बिहार की राजनीति में स्थापित करने, चाहे वह विधान परिषद हो या मंत्रिमंडल की रणनीति पर काम कर रहे हैं. फिलहाल उपेंद्र कुशवाहा ने इस मुद्दे पर कोई अंतिम फैसला सार्वजनिक नहीं किया है. उनके सामने सबसे बड़ा संकट अपनी पार्टी के अस्तित्व को बचाए रखने का है. यदि वे विलय का रास्ता चुनते हैं, तो उनका क्षेत्रीय दल समाप्त हो जाएगा, जिससे पार्टी के भीतर असंतोष और मतभेद बढ़ सकते हैं.

विधायकों का रुख और नाराज़गी

राष्ट्रीय लोक मोर्चा के विधायकों को लेकर भी लंबे समय से अटकलें लगती रही हैं. कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यदि विलय में देरी हुई या कार्यकर्ताओं में असंतोष बढ़ा, तो पार्टी में टूट की स्थिति भी पैदा हो सकती है. मार्च-अप्रैल 2026 के दौरान उपेंद्र कुशवाहा की भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के साथ दिल्ली में कई दौर की मुलाकातें हुईं, जिससे इन चर्चाओं को और बल मिला.


RLM के भीतर असंतोष के प्रमुख कारण

1. परिवारवाद के आरोप

पार्टी के भीतर सबसे बड़ा विवाद नवंबर 2025 में बिहार सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार के दौरान सामने आया, जब उपेंद्र कुशवाहा ने अपने बेटे दीपक प्रकाश को मंत्री बनाए जाने की कोशिश की. विधायकों और कार्यकर्ताओं का आरोप था कि दीपक प्रकाश न तो विधानसभा और न ही विधान परिषद के सदस्य थे, फिर भी उन्हें प्राथमिकता दी गई. इससे पार्टी कार्यकर्ताओं में नाराजगी बढ़ी.

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2. भविष्य की राजनीतिक अनिश्चितता

विधायक इस बात को लेकर भी चिंतित हैं कि यदि विलय होता है, तो भाजपा में उनके राजनीतिक भविष्य का क्या होगा. उन्हें डर है कि आगे के चुनावों में उन्हें टिकट मिलेगा या नहीं. इसी कारण कुछ विधायक कथित तौर पर सीधे भाजपा या जदयू के संपर्क में भी बताए जा रहे हैं.

3. संगठनात्मक अनदेखी और ‘लिट्टी-चोखा पार्टी' विवाद

नई सरकार बनने के बाद उपेंद्र कुशवाहा के आवास पर हुई लिट्टी-चोखा पार्टी में तीन विधायकों- रामेश्वर कुमार महतो, आलोक सिंह (दिनारा विधायक) और आनंद माधव की अनुपस्थिति ने संगठन के भीतर दरार को सार्वजनिक कर दिया. विधायकों का आरोप रहा है कि पार्टी के अहम फैसलों में उनसे राय नहीं ली जाती. डैमेज कंट्रोल के तहत जनवरी 2026 में आलोक सिंह को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया, लेकिन असंतोष पूरी तरह समाप्त नहीं हो सका. इसके बाद भाजपा के नए प्रदेश अध्यक्ष नितिन नवीन से दिल्ली में इन विधायकों की मुलाकात के बाद यह चर्चा और तेज हो गई कि ये विधायक पार्टी छोड़ सकते हैं.

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4. भाजपा के साथ तालमेल मजबूरी क्यों?

वर्तमान में राष्ट्रीय लोक मोर्चा के विधानसभा में कुल 4 विधायक हैं, जिनमें उपेंद्र कुशवाहा की पत्नी स्नेहलता भी शामिल हैं. इसके बावजूद उपेंद्र कुशवाहा ने अपने बेटे को मंत्री बनाए रखने के लिए भाजपा के साथ तालमेल बनाए रखा है. आगे विधान परिषद के चुनाव भी होने हैं. ऐसे में माना जा रहा है कि भाजपा के साथ विलय से उनके बेटे का मंत्री पद और विधान परिषद की सीट सुरक्षित रह सकती है.

जदयू में पहले भी हो चुका है विलय

उपेंद्र कुशवाहा बिहार की राजनीति के अनुभवी नेताओं में गिने जाते हैं. एक समय उन्हें नीतीश कुमार का संभावित उत्तराधिकारी भी माना जाता था. उन्होंने पहले अपनी पार्टी का जदयू में विलय कर उसे मजबूत किया था, लेकिन अपेक्षित सम्मान न मिलने के कारण 2023 में जदयू से अलग होकर राष्ट्रीय लोक मोर्चा की स्थापना की.

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