- पूर्णिया की दो बहनें पुरुष-प्रधान मूर्तिकला क्षेत्र में अपनी कला से नारी-सशक्तिकरण का उदाहरण पेश कर रही हैं
- उनके पिता रामनारायण पंडित ने 1995 में झारखंड से पूर्णिया आकर मूर्तिकला की शुरुआत की और बेटियों को यह विरासत दी
- पूजा और आरती ने वर्ष 2013-14 से पूरी तरह मूर्तिकला को अपनाया और इस कला में अपनी पहचान बनाई है
Basant Panchami Puja 2026: बंसत पंचमी (Basant Panchami 2026) के मौके पर बिहार और कई इलाकों में छात्रों से लेकर अलग-अलग जगहों पर मां सरस्वती की पूजा होती है. पूरे राज्य में मां सरस्वती की प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं और मूर्तियों की डिमांड काफी होती है. आम तौर पर मूर्तियां बनाने का काम पुरुष ही करते हैं. पर पूर्णिया की दो बहनें इसे चुनौती दे रही हैं. आज बसंत पंचमी के दिन हम आपको ऐसी दो बहनों की कहानी सुनाते हैं, जिनपर मां शारदे की खास कृपा है. वो अपनी मूर्तिकला के हुनर से हर ओर मशहूर हैं.
मिट्टी से मूर्तिकला का हुनर
सड़क किनारे मिट्टी को आकार देना, मूर्तियों को रंगना और वस्त्र-विन्यास करना, यह काम जब किसी छोटे शहर की बेटियां करती नजर आती हैं, तो यह सिर्फ कला नहीं, बल्कि नारी-सशक्तिकरण का जीवंत उदाहरण बन जाता है. राष्ट्रीय स्तर पर पीलू पोचखनवाला, कनका मूर्ति, मीरा मुखर्जी, शिल्पा गुप्ता और उषा रानी जैसी मूर्तिकार महिलाओं का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है. लेकिन पूजा और आरती इन बड़े नामों से एक मायने में अलग हैं. वे बड़े शहरों की नहीं, बल्कि संघर्ष और अभावों से जूझते हुए एक छोटे शहर की बेटियां हैं. मगर बावजूद इसके, उन्होंने समाज की पुरुष-प्रधान परंपराओं को चुनौती देते हुए मूर्तिकला को अपना जीवन बना लिया है. पूजा कहती है कि शादी अपनी जगह है, कला अपनी जगह है. माथे पर सिंदूर लग जाने से हम कला भूल नहीं जाएंगे.
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मूर्तिकार पिता की विरासत, बेटियों के हाथों सुरक्षित
पूजा और आरती के पिता रामनारायण पंडित उर्फ रामू मूर्तिकार सीमांचल से लेकर अंग प्रदेश तक जाना-पहचाना नाम हैं. झारखंड से पूर्णिया आकर उन्होंने 1995 में मूर्तिकला का काम शुरू किया था, उस समय पूजा और आरती छोटी थीं और पिता की मिट्टी गूंथने में मदद करती थीं. धीरे-धीरे उनके बाल-मन में भी मूर्तिकला के प्रति लगाव जागा. पूजा बताती हैं कि पापा को देखते थे तो लगता था काश! हम भी इसी तरह से मूर्ति बना पाते. फिर एक दिन सोचा, क्यों नहीं कर सकते? पापा से कहा, तो वे तुरंत तैयार हो गए.
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2013 से बना रही हैं मूर्तियां
साल 2013–14 से दोनों बहनें पूरी तरह इस कला से जुड़ गईं और आज उनकी बनाई मूर्तियां इतना जीवंत रूप लेती हैं कि जैसे अभी बोल उठें. रामू मूर्तिकार के दो बेटे भी हैं, लेकिन उनकी इस विरासत को बेटियों ने आगे बढ़ाना शुरू कर दिया है. आरती आत्मविश्वास से कहती हैं कि लड़का-लड़की में कोई फर्क नहीं. लड़की क्या नहीं कर सकती.
कला के लिए समर्पण इतना कि जरूरत पड़े तो शादी से भी इनकार
पूजा और आरती के लिए मूर्तिकला सिर्फ पेशा नहीं, बल्कि उनकी दुनिया है. पूजा कहती हैं कि इस काम में सम्मान बहुत मिलता है, हमें अच्छा लगता है. अगर शादी के बाद कोई रोक-टोक करेगा, तो हम शादी ही नहीं करेंगे. राजी होंगे तब करेंगे, नहीं तो नहीं. उनकी बातों में आत्मविश्वास, जुनून और अपने अस्तित्व को लेकर गहरी समझ साफ झलकती है.
पिता का सपना — बेटियां करें और बेहतर काम
हर पिता की तरह रामू मूर्तिकार भी चाहते हैं कि उनकी बेटियां उनसे आगे बढ़ें और उनकी विरासत को जिंदा रखे. वे गुरु की तरह उन्हें समझाते हैं कि मूर्ति बनाने के लिए मिट्टी को सजीव बनाना पड़ता है. वे कहते हैं कि हम चाहते हैं कि मेरी बेटी हमसे अच्छा काम करे. उनकी आंखों में बेटियों के हुनर पर गर्व भी है और एक कलाकार का सपना भी.
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मूर्तिकार दोनों बहनों ने क्या कहा
पूजा ने अपनी कला के बारे में बात करते हुए कहा कि इस काम में मुझे अच्छा लगता है. इसमें लोगों का इज्जत और सम्मान बहुत मिलता है. बचपन में हम पापा की मदद करते थे और सोचते थे कि काश! हम भी पापा की तरह मूर्ति बना पाते. फिर सोचे कि क्यों नहीं बना सकते. पापा से इच्छा जाहिर किए तो वे तैयार हो गए. शादी अपनी जगह है, कला अपनी जगह है. अगर माथे पर सिंदूर लग जाएगा तो हम कला नहीं भूलेंगे. कुछ गलत नहीं कर रहे जो ससुराल वाले मना करेंगे. अगर कोई रोक-टोक करेगा तो हम शादी नहीं करेंगे. अगर राजी होंगे तो शादी करेंगे, नहीं तो नहीं करेंगे.
आरती ने कहा कि पिताजी से मूर्ति बनाना सीखे, 11 साल से बना रहे हैं और साथ में पढ़ाई भी करते हैं. लड़का और लड़की में कोई फर्क नहीं है. लड़की क्या नहीं कर सकती! शादी के बाद भी करेंगे, क्यों नहीं करेंगे?














