बिहार का वो रहस्यमय गांव, जहां 12 घंटे के लिए पूरा गांव छोड़ देता है अपना घर; जंगल में बसता है पूरा संसार

करीब 100 साल पुरानी इस परंपरा के पीछे डर नहीं, बल्कि गांव को हर संकट, बीमारी और प्राकृतिक आपदाओं से बचाने वाली गहरी आस्था जुड़ी है, जिसे आज भी वहां का ग्रामीण अपने पूर्वजों की तरह पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ निभाते हैं.

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बिहार के नौरंगिया गांव के लोग 12 घंटे जंगल में अपना समय बिताते हैं.

जरा सोचिए… सुबह की पहली किरण के साथ ही पूरे गांव के घरों पर ताले लटक जाएं, गलियां सुनसान हो जाएं, आंगन वीरान पड़ जाएं और हजारों लोग एक साथ जंगल की ओर वनवास के लिए निकल पड़ें.  सुनने में यह किसी फिल्म का दृश्य लगता है, लेकिन यह बिहार के बगहा स्थित नौरंगिया गांव की सच्ची और अनोखी परंपरा है.  यहां हर साल सीता नवमी के दिन पूरा गांव 12 घंटे के लिए अपना घर छोड़ देता है.  

खाली हो जाता है पूरा गांव

हर साल बैसाख शुक्ल नवमी के दिन सूर्योदय से पहले ही नौरंगिया गांव के लोग अपने घरों में ताला लगाकर जंगल की ओर निकल पड़ते हैं. देखते ही देखते पूरा गांव सुनसान और वीरान हो जाता है. ऐसा लगता है, मानो गांव ने खुद को कुछ घंटों के लिए दुनिया से पूरी तरह अलग कर लिया हो. सुबह से लेकर सूर्यास्त तक सभी ग्रामीण जंगल में ही अपना समय बिताते हैं. शाम को सूरज ढलने के बाद ही वे वापस अपने घर लौटते हैं.  इस दौरान गांव की सीमा के भीतर कोई भी व्यक्ति नहीं रुकता. ग्रामीण इसे देवी का आदेश मानते हैं, और विश्वास करते हैं कि यही परंपरा उनके गांव को हर संकट, बीमारी और प्राकृतिक आपदा से सुरक्षित रखती है. 

प्राकृतिक आपदा ने जन्म दी यह परंपरा

ग्रामीण बताते हैं कि कई दशक पहले गांव में हैजा, चेचक और अन्य महामारियों का भयंकर प्रकोप हुआ था.  साथ ही प्राकृतिक आपदाओं ने भी लोगों का जीवन कठिन बना दिया था. लोग लगातार डर और संकट में जी रहे थे. उसी संकटकाल में एक सिद्ध परमहंस साधु गांव पहुंचे थे. उन्होंने ग्रामीणों को वनदेवी की विशेष पूजा और साल में एक दिन सामूहिक वनवास का मार्ग दिखाया. लोगों ने पूरे विश्वास के साथ इसे आजमाया और तब से गांव में शांति और खुशहाली का वास हो गया.  तभी से यह सिलसिला लगातार जारी है. 

गांव छोड़कर जंगल जाते लोग.

जंगल में होती है वनदेवी की पूजा 

ग्रामीण वाल्मीकि टाइगर रिजर्व के जंगलों में स्थित भजनी कुट्टी पहुंचते हैं.  वहां वनदेवी की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है. परिवार के सभी सदस्य एक साथ बैठकर वनभोज करते हैं, और पूरा दिन धार्मिक माहौल में बीतता है. इस परंपरा को माता सीता के कष्टों और उनके वनवास के प्रति सम्मान से भी जोड़ा जाता है.  जंगल की गोद में समय बिताने से प्रकृति के प्रति लोगों का जुड़ाव बढ़ता है.  सामूहिक पूजा और जंगल में मिलकर भोजन करना इस दिन को एक बड़े सामाजिक उत्सव में बदल देता है. 

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युवा भी निभा रहे हैं परंपरा

इस परंपरा को सिर्फ बुजुर्ग ही नहीं, बल्कि गांव के युवा भी पूरे गर्व और श्रद्धा के साथ निभाते हैं. नई पीढ़ी इसे अपनी पहचान और संस्कृति का हिस्सा मानती है. आज के दौर में जहां लोग अपनी जड़ों को भूलते जा रहे हैं, वहीं नौरंगिया के युवा इस कठिन परंपरा को अपनी विरासत मानकर खुशी-खुशी आगे बढ़ा रहे हैं. युवाओं का मानना है कि इस अनुशासन और आस्था के कारण ही उनका गांव आज भी दैवीय आपदाओं से सुरक्षित है. 

सामाजिक जुड़ाव की सबसे बड़ी मिसाल

बगहा के नौरंगिया गांव की यह परंपरा सिर्फ पूजा-पाठ नहीं, बल्कि पूरे गांव की एकजुटता का सबसे बड़ा उदाहरण है. यहां हर व्यक्ति एक साथ एक ही नियम का पालन करता है और सामूहिक रूप से इस परंपरा को निभाता है. यह अनोखा वनवास संदेश देता है कि जब पूरा समाज एक विश्वास के साथ खड़ा होता है, तो वह अपनी संस्कृति को सदियों तक जीवित रख सकता है. नौरंगिया गांव की यह एकता न केवल बिहार, बल्कि पूरे देश के लिए सामाजिक शक्ति की एक अनुपम मिसाल है.

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(रिपोर्ट - बिंदेश्वर कुमार)

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