बिहार में पूर्णिया जिले का गौरा पंचायत के सुहा आदिवासी टोला में रविवार को कलेजे को बेधती क्रंदन सुनाई दे रही थी. हर चेहरे पर असहनीय पीड़ा थी, जो स्वाभाविक है, क्योंकि एक दिन में ही गांव में सात शव का अंतिम संस्कार हो रहा है. गांव के रविन्द्र मुर्मू कहते हैं, "क्या ऊपर वाला इतना निर्दयी हो सकता है?" गांव के लोग उन 24 लोगों का शिद्दत से लौटने का इंतजार कर रहे थे, जो संथाल विद्रोह के नायक सिध्दहू-कानू के सम्मान में झारखंड के साहेबगंज जिला के बरहेट प्रखण्ड में आयोजित पंचकठिया मेला देखने गए थे. लेकिन इस इंतजार का त्रासद अंत हुआ और गांव में सात लाशें वापस लौटीं और दर्जनों लोग गंभीर रूप से जख्मी पूर्णियां मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भर्ती हैं.
गांव से महज 15 किमी दूर हादसा
दरअसल, आदिवासियों का एक समूह पिकअप वैन से 10 अप्रैल को साहेबगंज का पंचकठिया मेला गया था. स्थानीय लोग इस मेले को तीर्थ कहकर संबोधित करते हैं. 11 अप्रैल को जब ये वापस लौट रहे थे तो उनके गांव से महज 15 किमी दूर कटिहार जिले के कोढ़ा थाना क्षेत्र में एनएच -31 पर बसगाड़ा चौक बकरी फार्म के पास पिकअप की टक्कर पूर्णिया से आ रही 'न्याय रथ' नाम की एक तेज रफ्तार बस से हो गई और इस सीधी टक्कर में पिकअप के परखच्चे उड़ गए. दुर्घटना में अपनी मां और बहन को गवाने वाले घायल प्रत्यक्षदर्शी अजय हांसदा के अनुसार, बस 100 किमी की रफ्तार से चल रही थी.
हादसे में कुल 13 लोगों की गई जान
बस ने पीकअप में टक्कर मारने से पहले कार में टक्कर मारी और बाइक सवार को रौंद दिया, जिसकी तत्काल मौत हो गई. जानकारी अनुसार, बस चालक नशे में लग रहा था. पूर्णियां से जब बस खुली तो पहले हरदा में एक बाइक सवार और गेड़ाबाड़ी में ऑटो को टक्कर मारने के बाद तेज रफ्तार से बढ़ने लगा और अंततः पिकअप से उसकी जोरदार टक्कर हुई और परिणामस्वरूप 13 लोगों की मौत हो गई.
अपनमय टुड्डू (50) जब तीर्थ के लिए निकल रही थी तो पतोहू फूलों देवी उसे पिकअप वैन तक छोड़ने उसके बैग के साथ गई थी. इस दौरान ढेर सारी बातें हुईं थी और जाते-जाते सास अपनमय बोली थी कि 'बेटी हम जा रहे हैं, तीर्थ धाम कर अच्छे से वापस आएंगे'. लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था. रविवार को अपनमय के अंतिम संस्कार के बाद मृतक आत्मा की शांति के लिए कर्मकांड करती फूलों देवी कहती हैं, वह मेरी सास नहीं मां थीं, वह मुझे बेटी की तरह मानती थी.
मछली लाया, पर खाने वाला दुनिया से चला गया
दीपक हांसदा की पत्नी ललिता मुर्मू भी तीर्थ-धाम पंचकठिया अपनी सास अपनमय के साथ गई थी और यह यात्रा उसकी अंतिम यात्रा में तब्दील हो गई. दिहाड़ी मजदूरी करने वाले दीपक के दोनों मासूम बच्चे के सिर से मा का आंचल दूर जा चुका है. ललिता जाते-जाते बोली थीं कि हमलोग चूंकि भूखे आएंगे, इसलिए मछली बनाकर रखना, आने के साथ मछली खाएंगे. लिहाज़ा दीपक शनिवार को मजदूरी करने चला गया और दिहाड़ी के पैसे से मछली खरीद लाया, लेकिन ललिता अब इतनी दूर जा चुकी है, जहां से वह अब कभी लौटकर नही आएगी.
रविवार शाम तक अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी हुई. पूरे गांव में मातमी सन्नाटा पसरा हुआ था. इस सन्नाटे को कभी-कभी चीरती हुई रोने की आवाजें शाम को और बोझिल बना दे रही थी. छोटे और मासूम बच्चे भूख से बिलबिला रहे थे. ऐसे बच्चों के पास के गांव की दुकान से बिस्कुट लाकर दिया गया था. गांव की परंपरा है कि पूरा गांव खुद को एक परिवार मानता है, ऐसे में शोक संतप्त के घर ही नहीं, बल्कि पूरे गांव में चूल्हा नहीं जलता है. गांव में चूल्हा जले हुए 24 घण्टे से अधिक बीत चुके हैं. घायलों को लेकर गांव वालों को अनहोनी की आशंका सता रही है. क्योंकि अंजू हांसदा जैसे और भी लोग अभी भी जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं. जिला पार्षद फूलमणि देवी अपने इष्टदेव को स्मरण करते हुए कहती हैं, "भगवान न करे, फिर कोई शव गांव की दहलीज तक पहुंचे, गांव वाले खुद को टूटा हुआ महसूस कर रहे हैं."
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