राज्यसभा चुनाव में हार से उठे सवाल- क्या तेजस्वी में है लालू जैसा X फैक्टर?

राज्यसभा चुनाव में महागठबंधन की हार से यह साफ हो गया है कि सिर्फ मुद्दों की राजनीति से काम नहीं चलता, बल्कि पार्टी के अंदर एकजुटता भी जरूरी होती है. अगर अपने ही विधायक साथ नहीं रहें, तो जीत मुश्किल हो जाती है.

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  • बिहार के राज्यसभा चुनाव में महागठबंधन के चार विधायक वोटिंग के समय अनुपस्थित रहे, जिससे उनकी हार हुई
  • लालू प्रसाद यादव अपने दौर में विधायकों को एकजुट रखने और फ्लोर मैनेजमेंट में माहिर माने जाते थे
  • तेजस्वी यादव के नेतृत्व में संगठन पर पकड़ कमजोर नजर आई, जो चुनाव परिणामों पर प्रभाव डालती है
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पटना:

बिहार के हाल के राज्यसभा चुनाव में महागठबंधन की हार के बाद तेजस्वी यादव के नेतृत्व पर सवाल उठने लगे हैं. इस चुनाव में महागठबंधन के चार विधायक वोटिंग के समय मौजूद नहीं थे, जिससे उनका पूरा गणित बिगड़ गया और सीट हाथ से निकल गई. इस घटना के बाद अब चर्चा तेज है कि क्या तेजस्वी यादव में अपने पिता लालू प्रसाद यादव जैसी राजनीतिक पकड़ और फ्लोर मैनेजमेंट की क्षमता है?

लालू प्रसाद यादव के समय में ऐसी स्थिति बहुत कम देखने को मिलती थी. वे अपने विधायकों को एकजुट रखने में माहिर माने जाते थे. चाहे कोई भी बड़ा चुनाव हो या सदन में वोटिंग, वे अपने सभी विधायकों को साथ रखते थे. उनका तरीका था कि वे लगातार अपने नेताओं और विधायकों से बात करते रहते थे और हर स्थिति पर नजर रखते थे. इसी वजह से उनके दौर में क्रॉस वोटिंग या विधायकों के गायब रहने जैसी बातें कम होती थीं.

इसके उलट, तेजस्वी यादव के समय में यह कमजोरी सामने आई है. राज्यसभा चुनाव में चार विधायकों का अनुपस्थित रहना यह दिखाता है कि अभी संगठन पर उनकी पकड़ उतनी मजबूत नहीं है. राजनीति में सिर्फ भाषण देना या मुद्दे उठाना काफी नहीं होता, बल्कि अपने विधायकों को साथ रखना भी उतना ही जरूरी होता है. यही काम फ्लोर मैनेजमेंट कहलाता है.

दोनों की राजनीति में शैली का भी फर्क है. लालू यादव आक्रामक और मजबूत नेता माने जाते थे. वे अपने समर्थकों को जोड़कर रखते थे और जरूरत पड़ने पर सख्त फैसले भी लेते थे. वहीं तेजस्वी यादव शांत तरीके से राजनीति करते हैं. वे रोजगार, विकास और युवाओं के मुद्दे उठाते हैं, लेकिन कई बार राजनीतिक सख्ती की कमी दिखती है.

हालांकि यह भी सच है कि आज की राजनीति पहले जैसी नहीं रही. अब सोशल मीडिया और नई सोच का असर ज्यादा है. तेजस्वी यादव उसी नए दौर के नेता हैं, लेकिन राज्यसभा जैसे चुनाव में पुरानी राजनीतिक समझ और मैनेजमेंट आज भी जरूरी है.

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महागठबंधन की हार से यह साफ हो गया है कि सिर्फ मुद्दों की राजनीति से काम नहीं चलता, बल्कि पार्टी के अंदर एकजुटता भी जरूरी होती है. अगर अपने ही विधायक साथ नहीं रहें, तो जीत मुश्किल हो जाती है.

कुल मिलाकर इस हार ने यह दिखा दिया है कि लालू यादव और तेजस्वी यादव की राजनीति में अभी भी बड़ा फर्क है. लालू यादव को मजबूत मैनेजर माना जाता था, जबकि तेजस्वी यादव को अभी इस मामले में और मजबूत होना होगा. आने वाले समय में यह देखना होगा कि वे इस अनुभव से क्या सीख लेते हैं और अपनी पकड़ कितनी मजबूत कर पाते हैं.

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