उसने मेरे बच्चे को... अपने लाडलों को इंसाफ दिलाने पांच महीने से लड़ रही है किरण, दर्द सुन पसीज जाएगा कलेजा

किरण देवी का कहना है कि उसके लिए यह लड़ाई किसी मुआवज़े या सहानुभूति की नहीं, बल्कि न्याय की है. वह कहती है कि अगर उसके बच्चों के साथ गलत हुआ है तो दोषियों को सजा मिलनी चाहिए.

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बच्चों को इंसाफ दिलाने लड़ रही है किरण
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  • किरण देवी का आरोप है कि बच्चों की मौत हादसा नहीं, बल्कि ट्यूशन टीचर द्वारा सुनियोजित हत्या थी
  • पुलिस जांच धीमी होने और मामले को हादसा साबित करने की कोशिशों पर परिवार ने गंभीर सवाल उठाए हैं
  • मृतकों के परिवार का जीवन पूरी तरह टूट चुका है और किरण देवी न्याय की लड़ाई लड़ रही है
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पटना:

करीब पांच महीने बीत चुके हैं, लेकिन किरण देवी के लिए समय आज भी वहीं ठहरा हुआ है. हर सुबह उसकी आंखें उसी सवाल के साथ खुलती हैं और हर रात उसी पीड़ा के साथ ढलती है, मेरे बच्चों का कसूर क्या था? बीते साल 15 अगस्त को, जब पूरा देश आज़ादी का जश्न मना रहा था, उसी दिन पटना के शास्त्रीनगर थाना क्षेत्र के इंद्रपुरी रोड नंबर-12 पर खड़ी एक कार से सात साल की साक्षी कुमारी और छह साल के दीपक कुमार के जले हुए शव बरामद हुआ था. भाई-बहन की मौत आखिर कैसे हुई ये आज भी रहस्य ही बना हुआ है. किरण पता नहीं है कि वो अपने बच्चों को कब तक न्याय दिला पाएगी. किरण देवी ने NDTV से जो दर्द साझा किया उसे जानकर आप भी सिरह जाएंगे. 

किरण देवी ने घटना वाले दिन को याद करते हुए कहा कि वो खौफनाक मंजर मुझे आज भी सोने नहीं देता है. उन्होंने बताया कि उस दिन दोपहर करीब 12 बजे उसने दोनों बच्चों को ट्यूशन पढ़ने भेजा था. जब शाम ढलने लगी और बच्चे घर नहीं लौटे तो किरण को चिंता हुई. करीब चार बजे उसने ट्यूशन टीचर को फोन किया तो जवाब मिला कि बच्चे पढ़कर चले गए हैं, आसपास खोजिए. माँ का दिल बैठने लगा. आस-पड़ोस में खोजबीन शुरू हुई. शाम करीब सात बजे मोहल्ले के लोगों ने सूचना दी कि पास में खड़ी एक कार से बदबू आ रही है. जब कार खोली गई तो भीतर दोनों मासूम बच्चों के शव मिले. उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टरों ने दोनों को मृत घोषित कर दिया.

उस मंजर को याद कर किरण देवी की आवाज़ आज भी कांप जाती है. वह बताती है कि दोनों बच्चों के शरीर पर जलने के निशान थे, चमड़ी झुलसी हुई थी और मारपीट के साफ सबूत दिखाई दे रहे थे. माँ का आरोप है कि यह हादसा नहीं, बल्कि सुनियोजित हत्या है. उसका दावा है कि ट्यूशन टीचर ने ही दोनों बच्चों को जलाकर मारा और सबूत मिटाने के इरादे से शवों को कार में छिपा दिया. किरण के मुताबिक, बच्चों की हालत देखकर कोई भी यह कह सकता है कि उनके साथ बर्बरता हुई थी.

घटना के बाद पुलिस ने शुरुआत में हत्या और हादसा दोनों एंगल से जांच की बात कही. सीसीटीवी फुटेज खंगालने और प्राथमिकी दर्ज होने की जानकारी दी गई. लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतते गए, जांच की रफ्तार धीमी पड़ती चली गई. किरण देवी का आरोप है कि पुलिस इस मामले को जबरन हादसा साबित करने पर तुली हुई है. वह सवाल करती है कि अगर यह हादसा था तो बच्चों के शरीर पर जलने और चोट के निशान कैसे आए? इन सवालों का जवाब आज तक किसी ने नहीं दिया.इस दर्दनाक घटना ने एक हंसता-खेलता परिवार उजाड़ दिया.

गणेश साह और किरण देवी पिछले दस वर्षों से पटना में रहकर मेहनत-मजदूरी कर अपने बच्चों का भविष्य संवार रहे थे. गणेश साह राजमिस्त्री के साथ मजदूरी करता था, जबकि किरण देवी दूसरों के घरों में चूल्हा-चौका और साफ-सफाई कर बच्चों को पढ़ा-लिखाकर अफसर बनाने का सपना देख रही थी. लेकिन 15 अगस्त की उस शाम ने सब कुछ छीन लिया. दो मासूम बच्चों की मौत के बाद परिवार पूरी तरह टूट गया.

किरण को छोड़ना पड़ा पटना

डर और बेबसी के बीच किरण देवी को पटना छोड़ना पड़ा. वह अब कभी ससुराल—घटहो थाना क्षेत्र के मनियारपुर, तो कभी मायके, सरायरंजन थाना क्षेत्र के हरसिंहपुर में शरण लेकर रह रही है. उसकी चार साल की इकलौती बची बेटी रोहिणी ही अब उसकी जिंदगी का सहारा है. पति गणेश साह रोजी-रोटी के लिए प्रदेश से बाहर मजदूरी करता है. पिता का साया पहले ही उठ चुका है. घर में न कोई भाई है, न कोई मजबूत सहारा. ऐसे में किरण देवी दूसरों के घर काम कर अपने जख्मों के साथ जिंदगी काट रही है. इस मामले में कार्रवाई न होने से लोगों का गुस्सा भी फूटा था. दोनों बच्चों के शव मिलने के बाद इलाके में जमकर बवाल हुआ. आक्रोशित लोगों ने अटल पथ पर हंगामा किया और दो वाहनों को आग के हवाले कर दिया. इस दौरान एक मंत्री के काफिले पर भी पथराव हुआ. हालात बिगड़ते देख पुलिस के वरीय अधिकारी मौके पर पहुंचे और स्थिति को काबू में किया. परिजनों का आरोप है कि उसी दौरान उन्हें सुरक्षा का हवाला देकर जल्द से जल्द पटना छोड़ने का निर्देश दिया गया.

किरण ने ये कहा ये लड़ाई न्याय के लिए है

किरण देवी का कहना है कि उसके लिए यह लड़ाई किसी मुआवज़े या सहानुभूति की नहीं, बल्कि न्याय की है. वह कहती है कि अगर उसके बच्चों के साथ गलत हुआ है तो दोषियों को सजा मिलनी चाहिए. वह बार-बार पूछती है कि क्या गरीब होने की यही सजा है कि उसके बच्चों की मौत का सच कभी सामने नहीं आएगा? उसकी आँखों में आज भी उम्मीद की एक हल्की सी लौ जल रही है, जो उसे हर दिन सिस्टम से सवाल पूछने की ताकत देती है.
करीब पांच महीने बाद भी यह मामला सवालों के घेरे में है. पुलिस की जांच पर उठते संदेह, परिजनों के गंभीर आरोप और बच्चों के शवों की हालत—सब मिलकर एक ही बात कहते हैं कि सच अब भी सामने आना बाकी है. किरण देवी आज भी अपने दोनों बच्चों की तस्वीरें हाथ में लेकर फफक-फफक कर रो पड़ती है. उसकी आँखों में आँसू हैं, लेकिन आवाज़ में सवाल क्या मेरे बच्चों को इंसाफ मिलेगा? यह कहानी सिर्फ दो मासूमों की मौत की नहीं है, बल्कि उस माँ की भी है जो टूट चुकी है, फिर भी झुकी नहीं है. वह आज भी न्याय की भीख नहीं, बल्कि न्याय का हक मांग रही है. सिस्टम के लिए यह एक और फाइल हो सकती है, लेकिन किरण देवी के लिए यह उसकी पूरी दुनिया है , जो 15 अगस्त की एक शाम में उजड़ गई.

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