सीटें कम, दावेदार ज्यादा... बिहार में विधान परिषद चुनाव को लेकर NDA के अंदर खींचतान

बिहार में विधान परिषद की कुल 10 सीटों पर चुनाव होना है. अब NDA में सीटों पर दावेदारी के लिए BJP, JDU, LJP और HAM पार्टी सक्रिय हो गई है. सीटों के बंटवारे को लेकर खींचतान भी सामने आने लगी है.

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बिहार में विधान परिषद चुनाव को लेकर NDA के अंदर खींचतान

बिहार में विधान परिषद चुनाव को लेकर NDA के अंदर खींचतान बढ़ती जा रही है. सीटों के बंटवारे को लेकर सहयोगी दल खुलकर दबाव बना रहे हैं. पहले LJP और राष्ट्रीय लोक मोर्चा अपनी हिस्सेदारी मांग रहे थे, अब HAM प्रमुख जीतन राम मांझी ने भी एक सीट पर दावा ठोक दिया है. इससे NDA नेतृत्व की मुश्किलें बढ़ गई हैं. असल में विधानसभा चुनाव से पहले NDA के भीतर सभी छोटे दल अपनी ताकत दिखाना चाहते हैं. हर पार्टी यह संदेश देना चाहती है कि गठबंधन में उसकी अहम भूमिका है और उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. यही वजह है कि विधान परिषद चुनाव अब NDA के अंदर “दबाव की राजनीति” का बड़ा उदाहरण बनता जा रहा है. 

खुलकर सामने आए जीतन राम मांझी

जीतन राम मांझी खुलकर कह चुके हैं कि उनकी पार्टी को विधान परिषद में प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए. उनका कहना है कि महादलित समाज में HAM की अच्छी पकड़ है और NDA को इसका फायदा मिलता है. दूसरी तरफ चिराग पासवान की पार्टी भी लगातार दबाव बनाए हुए है. लोकसभा चुनाव में अच्छे प्रदर्शन के बाद LJP अब बिहार NDA में अपनी हिस्सेदारी और बढ़ाना चाहती है. 

उपेंद्र कुशवाहा भी अपनी पार्टी के लिए सीट चाहते हैं. उनका मानना है कि पिछड़ा और कुशवाहा वोट बैंक में उनकी राजनीतिक पकड़ अब भी मजबूत है. ऐसे में NDA के छोटे सहयोगी दल खुलकर अपनी ताकत दिखाने में जुट गए हैं. 

सबसे बड़ी समस्या यह है कि सीटें कम हैं और दावेदार ज्यादा. विधान परिषद की कुल 10 सीटों पर चुनाव होना है. JDU और BJP दोनों अपने नेताओं को एडजस्ट करना चाहते हैं. कई मौजूदा MLC का कार्यकाल खत्म हो रहा है और पार्टी के अंदर भी टिकट मांगने वालों की लंबी लाइन लगी हुई है.

सीट बंटवारे पर NDA में तेज होगी सियासी लड़ाई

JDU सबसे ज्यादा सीटों पर दावा कर रही है, क्योंकि खाली हो रही कई सीटें अभी उसके पास हैं. BJP भी सामाजिक और जातीय समीकरण को ध्यान में रखकर उम्मीदवार उतारना चाहती है. ऐसे में HAM, LJP और RLM को सीट देना NDA के लिए आसान नहीं माना जा रहा. राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यह केवल विधान परिषद चुनाव की लड़ाई नहीं है. छोटे दल अभी से अपनी बार्गेनिंग पावर बढ़ाने में लगे हैं, ताकि विधानसभा चुनाव में ज्यादा सीटें हासिल की जा सकें. इसलिए सभी सहयोगी दल अभी से दबाव बना रहे हैं.

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NDA नेतृत्व की सबसे बड़ी चिंता यह है कि चुनाव से पहले गठबंधन में कोई बड़ा विवाद बाहर न आए. अगर किसी सहयोगी दल को नजरअंदाज किया गया तो गलत राजनीतिक संदेश जा सकता है. यही वजह है कि दिल्ली और पटना दोनों जगह लगातार बैठकों और बातचीत का दौर चल रहा है. फिलहाल इतना साफ है कि विधान परिषद चुनाव ने NDA के अंदर की खींचतान और दबाव की राजनीति को खुलकर सामने ला दिया है. आने वाले दिनों में यह सियासी लड़ाई और तेज हो सकती है. 

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