ब‍िहार: तीन सगे भाइयों की एक साथ जली च‍िता, चंदा जुटाकर कफन-लकड़ी का क‍िया गया इंतजाम 

करेह नदी में डूब रहे बड़े भाई को बचाने के ल‍िए उतरे दो भाई भी डूब गए. तीनों भाइयों की मौत से पर‍िवार में गम का पहाड़ टूट पड़ा. 

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बिहार के समस्तीपुर में तीन भाइयों की एक साथ चिता जली.

समस्तीपुर जिले के शिवाजीनगर प्रखंड स्थित बोरज गांव में रामनवमी का उत्सव इस बार एक ऐसे दर्दनाक हादसे का गवाह बन गया, जिससे गांव का हर व्यक्ति सिहर उठता है. जिला मुख्यालय से करीब 45 किलोमीटर दूर करेह नदी के तट पर मंगलवार को एक साथ 3 सगे भाइयों की चिता जलने का दृश्य इतना मार्मिक था कि वहां मौजूद हर आंख नम हो गई. गांव में दुख का सन्‍नाटा था. एक ही परिवार के तीनों चिराग एक साथ बुझ जाना पूरे गांव के लिए असहनीय है.

10 अप्रैल को दिल्ली का था टिकट  

दिल्ली में निजी फैक्ट्री में गार्ड की नौकरी करने वाले सुदर्शन झा हर साल की तरह इस बार भी रामनवमी पर अपने परिवार के साथ गांव आए थे. घर के सामने हनुमान मंदिर में आयोजित अष्टयाम यज्ञ में शामिल होने के लिए वह अपने तीनों पुत्र आदित्य कुमार झा (16 वर्ष), हर्षनाथ झा (13 वर्ष) और कार्तिक झा (11 वर्ष) के साथ पहुंचे थे. पूजा में शामिल होने के बाद 10 अप्रैल को वापस दिल्ली लौटने का टिकट भी कटा था, लेकिन नियति को तो कुछ और ही मंजूर था. सोमवार दोपहर तीनों भाई अपने दादा विंदेश्वर झा, जो मंदिर के पुजारी हैं, उनके पास मंदिर में थे.  मंदिर की साफ-सफाई करने के बाद वे करेह नदी में स्‍नान करने चले गए. 

तीनों भाई नदी में डूब गए 

स्नान के दौरान हर्षनाथ गहरे पानी में चला गया. छोटे भाई कार्तिक ने उसे बचाने की कोशिश की, लेकिन वह भी डूबने लगा. दोनों को संकट में देख बड़े भाई आदित्य भी उन्हें बचाने के लिए कूद पड़ा, लेकिन डूबते भाइयों ने घबराहट में आदित्य को पकड़ लिया, और देखते ही देखते तीनों नदी में समा गए. शोर सुनकर आसपास के लोग दौड़े और किसी तरह तीनों को बाहर निकाला, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी. एक साथ तीनों भाइयों की मौत की खबर से पूरे गांव में मातम पसर गया. पोस्टमार्टम के बाद मंगलवार को शव गांव पहुंचने पर करेह नदी के किनारे एक साथ तीनों मासूम भाइयों की चिताएं जलीं.  

करेह नदी में डूबने से तीन सगे भाइयों की मौत हो गई.

दादा ने दी मुखाग्नि 

यह दृश्य इतना हृदयविदारक था कि हर व्यक्ति की आंखें नम थीं. सबसे दुखद क्षण तब आया, जब जिन हाथों को बच्चों के कंधे पर होना चाहिए था, वही परिजन उन्हें मुखाग्नि दे रहे थे. आदित्य को उसके चचेरे दादा तारकेश्वर झा ने मुखाग्नि दी, जबकि हर्षनाथ और कार्तिक को उनके चाचाओं ने अंतिम विदाई दी. तारकेश्वर झा की आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे. उन्होंने भरे गले से कहा, "आज मुझे मुखाग्नि की जरूरत थी, लेकिन मैं अपने ही पोते को मुखाग्नि दे रहा हूं. इससे बड़ा दुख क्या हो सकता है. हमारी तो दुनिया ही उजड़ गई."

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अंतिम संस्कार तक के पैसे नहीं थे 

इस हादसे के बाद सुदर्शन झा और उनकी पत्नी गहरे सदमे में हैं. दोनों की हालत ऐसी है कि वे कुछ बोल भी नहीं पा रहे, बस आने-जाने वाले लोगों को खामोशी से देखते रहते हैं. परिवार की आर्थिक स्थिति भी बेहद कमजोर है. तीनों बेटों के अंतिम संस्कार तक के लिए पैसे नहीं थे. ऐसे में गांव के लोगों ने मानवता की मिसाल पेश करते हुए चंदा जुटाकर कफन और लकड़ी की व्यवस्था की और अंतिम संस्कार कराया. 

दिल्ली में पढ़ाई करते थे तीनों भाई 

पड़ोसी संजय झा ने बताया कि तीनों बच्चे दिल्ली में रहकर पढ़ाई करते थे. आदित्य ने इस साल मैट्रिक की परीक्षा दी थी, जबकि हर्षनाथ आठवीं और कार्तिक सातवीं कक्षा का छात्र था. गांव के 70 वर्षीय राधाकांत झा कहते हैं कि उन्होंने अपने जीवन में ऐसा दर्दनाक मंजर कभी नहीं देखा. इस घटना के बाद प्रशासनिक अधिकारियों और पंचायत प्रतिनिधियों ने मदद का आश्वासन जरूर दिया है, लेकिन अभी तक कोई ठोस सहायता नहीं मिल सकी है. बोरज गांव में तीन मासूम जिंदगियों के असमय बुझ जाने का दर्द हर जुबान पर है. यह हादसा एक परिवार ही नहीं, बल्कि पूरे गांव के दिल पर ऐसा घाव दे गया है, जो शायद कभी नहीं भर सकेगा. 

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(इनपुट- राधाकांत झा)

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