बमबारी के बीच मलबे में बैठा म्यूजिक टीचर, बजाई ऐसी धुन कि आंखें नम हो जाएं, ईरानी शिक्षक का Video वायरल

ईरान में बमबारी के बाद तबाह हुए स्कूल के मलबे में एक संगीत शिक्षक ने बैठकर ऐसी धुन बजाई, जिसने हर किसी का दिल छू लिया. यह कहानी बताती है कि कैसे मुश्किल हालात में भी संगीत उम्मीद और इंसानियत की आवाज बन सकता है.

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बमबारी के बाद भी नहीं टूटा हौसला, ईरानी शिक्षक ने बजाई आखिरी धुन

जब चारों तरफ तबाही हो, दीवारें गिर चुकी हों और हर तरफ सन्नाटा छाया हो, तब अगर कोई उस खामोशी को संगीत से भर दे, तो वह सिर्फ एक कलाकार नहीं, बल्कि उम्मीद की आवाज बन जाता है. ऐसा ही एक दिल को छू लेने वाला वीडियो सामने आया है, जिसमें एक ईरानी संगीत शिक्षक अपने तबाह हो चुके स्कूल के मलबे में बैठकर धुन बजाता नजर आ रहा है.

मलबे के बीच गूंजी संगीत की आखिरी धुन

ईरान के संगीत शिक्षक हमदरीज़ा अफ़रीदा (@hamidrezaafarideh) ने अपने टूटे हुए म्यूजिक स्कूल के बीच बैठकर क़मानचे (एक पारंपरिक वाद्य यंत्र) बजाया. उनके चारों ओर टूटी दीवारें, बिखरा सामान और जर्जर छत इस बात की गवाही दे रहे थे कि वहां कितनी भयानक तबाही हुई है. धूप की हल्की किरणें उस मलबे पर पड़ रही थीं, जहां कभी हंसी, सीखने और संगीत की गूंज हुआ करती थी. लेकिन, अब वहां सिर्फ खामोशी थी, जिसे उन्होंने अपनी धुन से तोड़ दिया.

देखें Video:

आखिरी आवाज संगीत हो, बम नहीं...

इस वीडियो के साथ उन्होंने एक भावुक संदेश भी लिखा. उन्होंने कहा, कि यह जगह सिर्फ एक स्कूल नहीं थी, बल्कि उनकी और उनकी सहयोगी शिदा की जिंदगी की आत्मा थी. यहां 250 छात्रों और 20 से ज्यादा शिक्षकों की मेहनत और यादें जुड़ी थीं. अब जब सब कुछ खत्म हो चुका है, तो उन्होंने तय किया कि इस जगह की आखिरी आवाज बम या मिसाइल नहीं, बल्कि संगीत होनी चाहिए. उनके शब्द दिल को छू लेने वाले हैं, शायद यह इस स्कूल की आखिरी धुन हो, और शायद मेरी भी.

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मुश्किल वक्त में संगीत बना सहारा

इससे कुछ दिन पहले, एक और ईरानी संगीतकार अली गमसारी ने भी अशांति के बीच संगीत का सहारा लिया. उन्होंने दमावंद विद्युत संयंत्र के पास बैठकर ‘वतन' नाम की धुन बजाई, जो अपने देश के लिए एक शांत लेकिन गहरी श्रद्धांजलि थी.

‘The Pianist' जैसी हकीकत

ये दोनों घटनाएं हमें The Pianist फिल्म की याद दिलाती हैं, जहां युद्ध और विनाश के बीच संगीत इंसानियत की आखिरी उम्मीद बनकर उभरता है. फर्क बस इतना है कि यहां कोई फिल्मी कहानी नहीं, बल्कि असली जिंदगी की सच्चाई है.

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(Disclaimer: यह खबर सोशल मीडिया पर यूजर द्वारा की गई पोस्ट से तैयार की गई है. एनडीटीवी इस कंटेंट की प्रामाणिकता की पुष्टि नहीं करता.)

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