- अमेरिका और ईरान के बीच पाकिस्तान में 21 घंटे चली वार्ता बिना किसी समझौते के समाप्त हो गई
- ईरान ने अमेरिका के साथ वार्ता विफल होने की पुष्टि की और कहा कि दो-तीन महत्वपूर्ण मुद्दों पर मतभेद थे
- ईरान का परमाणु कार्यक्रम 1950 के दशक में शुरू हुआ था और 1970 में उसने NPT पर हस्ताक्षर किए थे
अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने घोषणा की है कि अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता रविवार सुबह बिना किसी समझौते के समाप्त हो गई, क्योंकि ईरान ने परमाणु हथियार विकसित न करने की अमेरिकी शर्तों को मानने से इनकार कर दिया. वेंस ने बताया कि पाकिस्तान में चल रही ये महत्वपूर्ण वार्ता 21 घंटे बाद समाप्त हुई. लेकिन सच्चाई यह है कि हमें ईरान से यह स्पष्ट प्रतिबद्धता चाहिए कि वे परमाणु हथियार विकसित करने का प्रयास नहीं करेंगे और न ही ऐसे उपकरण हासिल करने की कोशिश करेंगे, जिनसे वे जल्द से जल्द परमाणु हथियार बना सकें.
ईरान का जवाब भी जान लीजिए
ईरान के विदेश मंत्रालय ने रविवार को कहा कि अमेरिका के साथ वार्ता दो-तीन महत्वपूर्ण मुद्दों पर हमारे विचारों में मतभेद के कारण विफल हो गई. ईरान के सरकारी टीवी चैनल को प्रवक्ता इस्माइल बगाई ने बताया, "अंततः वार्ता किसी समझौते पर नहीं पहुंच सकी." उन्होंने यह नहीं बताया कि वे मुद्दे क्या थे. बघाई ने कहा कि कुछ विषयों पर अमेरिकी और ईरानी वार्ताकारों ने "वास्तव में आपसी सहमति बनाई." उन्होंने बताया कि वार्ताकारों ने होर्मुज जलडमरूमध्य पर चर्चा की, लेकिन परमाणु हथियारों पर हुई चर्चा का उल्लेख नहीं किया.
ये बयान बता रहा उम्मीद बाकी
अमेरिका से शांति वार्ता को लीड कर रहे ईरान के संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाकेर गालिबाफ ने बताया कि बातचीत में ईरान की सद्भावना और रचनात्मक प्रस्तावों के बावजूद अमेरिका ईरान का विश्वास जीतने में विफल रहा. ईरान ने गंभीर इरादे से बातचीत में प्रवेश किया था, लेकिन पिछले युद्धों के अनुभवों ने तेहरान को संशय में डाल दिया था. ईरान के प्रतिनिधिमंडल ने दूरदर्शी पहल प्रस्तुत कीं, फिर भी दूसरा पक्ष अंततः विश्वास हासिल नहीं कर सका. अमेरिका अब ईरान के सिद्धांतों को समझता है और उसे यह तय करना होगा कि क्या वह ईरान का विश्वास जीत सकता है.
ईरान ने कब शुरू किया परमाणु कार्यक्रम
पाकिस्तान कह रहा है कि बातचीत ना तो फेल हुई है और ना ही सफल हुई है. वो आगे भी बातचीत के लिए प्रयास करता रहेगा. एक्सपर्ट भी कह रहे हैं कि दोनों देशों ने अपनी-अपनी रेडलाइन बता दी है और संभव है कि अपने-अपने देश लौटकर पाकिस्तान के जरिए फिर से पर्दे के पीछे वार्ता चले. मगर सवाल ये है कि ईरान का परमाणु आखिर है क्या? तो इसकी शुरूआत 1950 के दशक में हुई. ईरान ने 1950 के दशक के अंत में संयुक्त राज्य अमेरिका की तकनीकी सहायता से अपने परमाणु कार्यक्रम की नींव रखी. तब ईरान के शासक शाह मोहम्मद रजा पहलवी ने वाशिंगटन के साथ एक असैन्य परमाणु सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. 1970 में, ईरान ने परमाणु हथियारों के अप्रसार पर संधि (एनपीटी) पर हस्ताक्षर किए, जिसमें उसने अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) को अपनी परमाणु सामग्री घोषित करने की प्रतिबद्धता जताई. ईरान के परमाणु कार्यक्रम में संयुक्त राज्य अमेरिका और पश्चिमी यूरोपीय देशों की भागीदारी 1979 ईरानी क्रांति (ईरान के शाह की विदाई) तक जारी रही. 1979 की क्रांति के बाद, गुप्त परमाणु हथियार रिसर्च कार्यक्रम को अयातुल्ला रूहोल्लाह खुमैनी ने भंग कर दिया. वो मानते थे कि इस तरह के हथियार मुस्लिम नैतिकता के तहत वर्जित माने जाते हैं. परमाणु हथियारों में छोटे पैमाने पर रिसर्च ईरान-इराक युद्ध के दौरान फिर से शुरू हुए और 1989 में खुमैनी की मौत के बाद इसमें तेजी आई. इसी समय पाकिस्तान की ईरान में एंट्री हुई.
परमाणु बम बनाने के करीब पहुंच गया था ईरान
इसी समय पाकिस्तान के बदनाम वैज्ञानिक और परमाणु हथियार बनाने वाले अब्दुल कादिर खान ने ईरान से संपर्क किया. साल 1986 से 2001 के बीच पाकिस्तान ने ईरान को वे जरूरी पुर्जे दिए, जिनकी उसे जरूरत थी. अब्दुल कादिर खान ने खुद फरवरी 1986 और जनवरी 1987 में बुशहर में ईरानी रिएक्टर का दौरा किया था. माना जाता है कि 1989 और 1995 के बीच खान ने ईरान को सेंट्रीफ्यूज के लिए 2,000 से ज्यादा कंपोनेंट और सब-असेंबली भेजी थीं. 11 मई 1998 को, भारत ने अपने परमाणु हथियारों का परीक्षण किया. उसी महीने के आखिर में पाकिस्तान ने भी बलूचिस्तान के रेगिस्तान में अपने परमाणु हथियारों का सफल परीक्षण किया. इसके बाद अमेरिका सतर्क हो गया. उसे डर था कि कहीं अब्दुल कादिर खान ईरान, उत्तर कोरिया और लीबिया को परमाणु हथियार बनाने की सारी जानकारी ना दे दे. मगर फिर भी कादिर खान ने उत्तर कोरिया को सारी जानकारी दे दी, और ईरान बम बनाने के आखिरी स्टेज तक पहुंच गया.
पाकिस्तान-ईरान पर एक साथ हुई थी कार्रवाई
2000 के दशक की शुरुआत में ईरान के अघोषित परमाणु स्थलों के बारे में खुलासे ने चिंताएं बढ़ा दीं. 2001 की IAEA रिपोर्ट में खुफिया एकत्रित जानकारी में बताया गया कि कम से कम 2003 तक ईरान परमाणु हथियार बनाने के करीब है. इसके बाद ईरान की यूरेनियम संवर्द्धन गतिविधियों को निलंबित कर दिया गया. वहीं अमेरिका के दबाव में 31 जनवरी 2004 को पाकिस्तान सरकार ने कादिर खान को गिरफ्तार कर लिया. उन पर ईरान, लीबिया और उत्तर कोरिया के साथ अवैध रूप से परमाणु तकनीक साझा करने का आरोप था. गिरफ्तारी के बाद, उन्हें 2009 तक घर में नजरबंद रखा गया था और बाद में रिहा कर दिया गया. तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने उन्हें क्षमा कर दिया था, लेकिन उनकी गतिविधियां सीमित कर दी गई थीं और अंत में उनका निधन 10 अक्टूबर 2021 को 85 वर्ष की आयु में हो गया.
समझौता होकर भी टूटा और बढ़ गया तनाव
ईरान परमाणु हथियारों के करीब पहुंचकर भी चूक गया था. 14 जुलाई, 2015 को जर्मनी के वियना में ईरान और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्य ब्रिटेन, चीन, फ्रांस, रूस और संयुक्त राज्य अमेरिका एक समझौते पर पहुंचे. संयुक्त व्यापक कार्य योजना (JCPOA) नामक इस समझौते ने 12 साल के संकट और 21 महीने की लंबी बातचीत के बाद प्रतिबंधों में राहत के बदले ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर महत्वपूर्ण प्रतिबंध लगाए. हालांकि, मुश्किल से हासिल किया गया यह समझौता तब टूटने लगा, जब डोनाल्ड ट्रंप के पहले राष्ट्रपति काल के दौरान अमेरिका ने 8 मई, 2018 को इससे अलग होकर ईरान पर फिर से प्रतिबंध लगा दिए. अमेरिका के समझौते से पीछे हटने के बाद, ईरान ने अपनी परमाणु गतिविधियों को बढ़ाकर जवाबी कार्रवाई की.
अमेरिका-ईरान के बीच अब आगे क्या होगा
ईरान ने पहले यूरेनियम को पांच प्रतिशत तक संवर्धित करना शुरू किया, जो कि समझौते द्वारा लगाए गए 3.67 प्रतिशत की सीमा को पार कर गया. फिर उसने 2021 में संवर्धन स्तर को 20 और फिर 60 प्रतिशत तक बढ़ा दिया, जो कि हथियार में उपयोग के लिए आवश्यक 90 प्रतिशत से कम है, लेकिन चिंताजनक है. तेहरान ने सेंट्रीफ्यूज की संख्या को भी पार कर लिया है. सेंट्रीफ्यूज यूरेनियम को समृद्ध करने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली मशीनें होती है. इसका उपयोग करके अधिक तेज़ी से अधिक परमाणु सामग्री का उत्पादन शुरू कर दिया. हालांकि, अमेरिका की राष्ट्रीय खुफिया निदेशक तुलसी गबार्ड ने मार्च 2025 में सीनेट समिति के समक्ष गवाही दी थी कि ईरान सक्रिय रूप से अब परमाणु बम नहीं बना रहा है. फिर भी अमेरिका चाहता है कि ईरान पूरी तरह से परमाणु हथियार बनाने के कार्यक्रम को बंद कर दे. अब वार्ता के बाद दोनों पक्षों की बातों को सुनकर लगता है ईरान इस पर राजी तो हो सकता है, लेकिन वो इसके बदले उस पर कभी युद्ध ना थोपने और सभी सैंक्शंस हटाने की गारंटी चाहता है. शायद विश्वास की कमी के कारण मामला यही अटका पड़ा है. अब दोनों पक्ष पाकिस्तान के जरिए पर्दे के पीछे से वार्ता कर सकते हैं और एक-दूसरे से आखिरी मोलभाव कर सकते हैं. ऐसा नहीं हुआ तो फिर युद्ध और भड़क सकता है.
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