ईरान में पैराशूट से उतरेंगे ट्रंप के 3000 जवान? विश्वयुद्ध में भी कमाल कर चुकी 82वीं एयरबोर्न डिवीजन

US Israel War against Iran: अमेरिकी सेना की 82वीं एयरबोर्न डिवीजन के लगभग 3,000 सैनिकों को मिडिल ईस्ट में तैनात किया जाएगा- रिपोर्ट

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US Iran War: मिडिल ईस्ट में भेजे जा सकते हैं 82वें एयरबोर्न के 3000 सैनिक (फाइल फोटो)
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  • अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ईरान संघर्ष को लेकर बातचीत और सैन्य तैनाती, दोनों रास्ता एक साथ अपनाते दिख रहे हैं
  • पेंटागन 82वीं एयरबोर्न डिवीजन के लगभग तीन हजार सैनिकों को मध्य पूर्व में तैनात करने की योजना बना रहा है
  • 82वीं एयरबोर्न डिवीजन के सैनिक 18 घंटे के भीतर दुनिया के किसी कोने में तैनात हो सकते हैं
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 अमेरिका ईरान जंग में एक बड़ा मोड़ आ गया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक तरफ जंग रोकने के लिए बातचीत की कोशिश में लगे हैं वहीं दूसरी तरफ खबर है कि ईरान में अमेरिकी सेना उतारी जा सकती है. पेंटागन अमेरिकी सेना की 82वीं एयरबोर्न डिवीजन के हजारों सैनिकों को मिडिल ईस्ट में तैनात करने की तैयारी कर रहा है, जो ईरान संघर्ष में संभावित बढ़ोतरी का संकेत देता है. वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी सेना की 82वीं एयरबोर्न डिवीजन के लगभग 3,000 सैनिकों को मिडिल ईस्ट में तैनात किया जाएगा, जिससे पहले से ही क्षेत्र की ओर जा रहे हजारों मरीन सैनिकों की संख्या में इजाफा होगा.

अधिकारियों ने कहा कि अमेरिकी सैनिकों को ईरान में प्रवेश करने का कोई निर्णय नहीं लिया गया है. हालांकि, सैन्य जमावड़ा इस संभावना को बढ़ाता है कि अमेरिकी बल इस संघर्ष में और गहराई तक शामिल हो सकते हैं. सीबीएस न्यूज की एक अलग रिपोर्ट में कहा गया है कि 82वीं एयरबोर्न के कुछ हिस्सों, जिसमें कमांड इकाइयां और जमीनी बल शामिल हैं, को तैनात किए जाने की उम्मीद है. एक अमेरिकी अधिकारी ने संकेत दिया कि शुरुआती दल 1,500 से कम सैनिकों का हो सकता है.

क्यों स्पेशल होते हैं 82वीं एयरबोर्न डिवीजन के सैनिक?

82वीं एयरबोर्न अमेरिकी सेना की प्रमुख त्वरित-प्रतिक्रिया इकाइयों (Immediate Response Force/ IRF) में से एक है. इस डिवीजन को IRF में सबसे खास माना जाता है. यह कुछ ही घंटों में दुनियाभर में तैनात हो सकती है. द न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, इसकी “इमीडिएट रिस्पॉन्स फोर्स” 18 घंटों के भीतर मूव कर सकती है, जिससे व्हाइट हाउस को किसी भी परिस्थिति में दुनिया के किसी कोने में सेना की तैनाती के विकल्प मिलते हैं. 2021 में जब अमेरिका अफगानिस्तान से पीछे हटा था तब उसमें सहायता के लिए IRF का उपयोग किया गया था.

एयरबोर्न होने का मतलब है कि इस डिवीजन के सैनिक कहीं भी पैराशूट से कूदकर तैनात हो जाते हैं. 82वां एयरबोर्न अपने नाम को गंभीरता से लेता है. यूनाइटेड सर्विस ऑर्गनाइजेशन की रिपोर्ट के अनुसार किसी भी महीने में, फोर्ट ब्रैग में तैनात इसके सैनिकों द्वारा लगभग 10,000 प्रशिक्षण छलांगें (पैराशूट लेकर जहाज के कूटना) आयोजित की जाती हैं. फोर्ट ब्रैग 82वें एयरबोर्न का घर है. यहां डिवीजन के 57,000 सैनिक और 11,000 नागरिक कर्मचारी रहते हैं.

पैराशूट से उतरते 82वें एयरबोर्न के सैनिक (फाइल फोटो)

82वें एयरबोर्न के सैनिक अपनी बांह पर एक खास तरह का पैच लगाते हैं जिसपर AA लिखा होता है. इसका मतलब "ऑल अमेरिकन" से है. इस डिवीजन को यह निकनेम उस समय दिया गया था जब इसे पहली बार 1917 में कैंप गॉर्डन, जॉर्जिया में बनाया गया था. द्वितीय विश्व युद्ध में भी 82वीं एयरबोर्न डिवीजन ने अपना लोहा मनवाया था. इसके सैनिकों ने वाल नदी को पोंटून नावों से पार करने का एक बेहद साहसी सैन्य अभियान चलाया था. इस जोखिम भरे ऑपरेशन ने मित्र देशों की सेनाओं को नीदरलैंड के शहर नाइमेखेन को मुक्त कराने में बड़ी मदद की. 1944 में हुए इस ऐतिहासिक नदी पार अभियान के दौरान 82वीं एयरबोर्न डिवीजन के 48 अमेरिकी सैनिक शहीद हो गए थे. आज भी उनकी याद में वाल नदी पर बने पुल के किनारे 48 स्ट्रीट लैंप लगाए गए हैं.

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क्या ईरान में घुसेगी अमेरिकी सेना?

अमेरिका के पास पहले से ही मध्य पूर्व में लगभग 50,000 सैनिक हैं. अतिरिक्त तैनाती यह संकेत देती है कि व्यापक सैन्य भूमिका पर विचार किया जा सकता है, जिसमें शिपिंग लेनों की सुरक्षा से जुड़े संभावित अभियान शामिल हैं. द न्यूयार्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक ट्रंप के सैन्य योजनाकार ऐसे परिदृश्यों पर विचार कर रहे हैं, जिनमें पैराट्रूपर्स को ईरान की मारक दूरी के भीतर तैनात किया जा सकता है. मरीन सैनिकों का उपयोग महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की सुरक्षा या रणनीतिक तेल मार्गों के आसपास अभियानों के समर्थन के लिए भी किया जा सकता है.

इसी बीच, डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि ईरान के साथ बातचीत जारी है. उन्होंने संकेत दिया कि उनकी सरकार के सदस्य वार्ता में शामिल हैं और तेहरान समझौता करना चाहता है. वहीं ईरान ने सार्वजनिक रूप से किसी भी प्रत्यक्ष बातचीत से इनकार किया है और ऐसी रिपोर्टों को “फेक न्यूज” बताया है. 

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यह सैनिकों की तैनाती ऐसे समय हो रही है जब युद्ध अपने चौथे सप्ताह में प्रवेश कर चुका है. अब तक अमेरिका ने मुख्य रूप से लड़ाकू विमानों, बमवर्षकों और ड्रोन का उपयोग करते हुए हवाई अभियान पर निर्भर किया है. अमेरिकी सेंट्रल कमांड के अनुसार, फरवरी के अंत से ईरान के भीतर 9,000 से अधिक सैन्य ठिकानों पर हमले किए जा चुके हैं. इनमें मिसाइल लॉन्चर, नौसैनिक संसाधन और रक्षा औद्योगिक सुविधाएं शामिल हैं.

क्षेत्र में लड़ाई जारी है. ईरान ने इजरायल और अन्य देशों पर ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइल हमले किए हैं जबकि वॉशिंगटन बातचीत के लिए खुलापन दिखा रहा है. होर्मुज जलडमरूमध्य एक महत्वपूर्ण तनाव बिंदु बना हुआ है. ईरानी हमलों ने इस जलमार्ग तक पहुंच को प्रभावित किया है, जिसके जरिए दुनिया का लगभग पांचवां हिस्सा तेल गुजरता है, जिससे वैश्विक ऊर्जा कीमतों में वृद्धि हुई है.

यह जंग 28 फरवरी को अमेरिकी और इजरायली हमलों के साथ शुरू हुई थी, जो ईरानी सैन्य ठिकानों को निशाना बना रहे थे. तब से यह मिसाइल हमलों, ड्रोन हमलों और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर खतरे के साथ एक व्यापक क्षेत्रीय टकराव में बदल गया है.

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