हमास ने 2 दशक बाद छोड़ा गाजा का शासन, लेकिन हथियार नहीं, अब कौन संभालेगा कमान?

2007 से गाजा पर शासन करने वाले हमास ने सत्ता छोड़कर इजरायल पर प्रेशर कैसे बना दिया है? यहां समझिए

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  • 2007 से गाजा पर शासन करने वाले हमास ने इस फिलिस्तीनी इलाके की सत्ता छोड़ी
  • हमास ने गाजा का कामकाज संभालने के लिए अमेरिका के समर्थन वाली 'टेक्नोक्रेटिक कमेटी' को न्योता दिया है
  • हमास ने भले शासन छोड़ा है लेकिन उनसे हथियार रखने की बात नहीं की है, जिसपर इजरालय को आपत्ति है

गाजा में लगभग दो दशक तक सत्ता में रहने के बाद हमास ने शासन छोड़ दिया है. इस फिलिस्तीनी मिलिटेंट ग्रुप ने इस इलाके का कामकाज संभालने के लिए अमेरिका के समर्थन वाली 'टेक्नोक्रेटिक कमेटी' को न्योता दिया है, जिसे अमेरिका की मध्यस्थता में हुए सीजफायर के तहत बनाया गया है. हमास शासन छोड़ने को तैयार तो है लेकिन हथियार छोड़ने को लेकर कोई वादा नहीं किया है. इस घोषणा से तुरंत यह सवाल उठता है कि 2007 से गाजा पर शासन करने वाले हमास के बाद अब आगे गाजा का क्या होगा?

नोट- हमास के सरकारी मीडिया ऑफिस के प्रमुख इस्माइल अल-थवाबता ने न्यूज एजेंसी AFP को बताया कि सरकार की इमरजेंसी कमिटी के प्रमुख मोहम्मद अल-फरा ने आधिकारिक तौर पर अपना इस्तीफा सौंप दिया है.

हमास का ऐलान और इजरायल पर प्रेशर

हमास ने फतह से अलग होने के बाद गाजा पर कब्जा किया था और अब उसी कंट्रोल को छोड़ना हमास द्वारा दी गई सबसे बड़ी राजनीतिक रियायत है. हमास ने कहा कि केवल सार्वजनिक सेवाएं देने वाले तकनीकी और पेशेवर कर्मचारी ही अपने पदों पर बने रहेंगे, जबकि नई कमेटी नागरिक प्रशासन की जिम्मेदारी संभालेगी. हमास ने जिस 'टेक्नोक्रेटिक कमेटी' को शासन सौंपने का ऑफर दिया है, उसे 'गाजा प्रशासन के लिए नेशनल कमेटी (NCAG) के नाम से जाना जाता है. लेकिन सीजफायर के तहत जनवरी में इसके गठन के बाद से ही इजरायल ने इसे गाजा में दाखिल होने से रोक रखा है. 

अब हमास कह रहा है कि वह इजरायल के लगभग दो साल के विनाशकारी हमलों के बाद गाजा के पुनर्निर्माण के लिए प्रतिबद्ध है और नागरिक शासन को छोड़ना इसका ही सबूत है. हालांकि प्रेशर अब इजरायल पर भी होगा कि वह इस 'टेक्नोक्रेटिक कमेटी' को आने दे और गाजा का कमान संभालने दे.  नॉर्वे में भारत के राजदूत पद से रिटायर और अभी इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ कॉर्पोरेट अफेयर्स (IICA) में प्रोफेसर, डॉ बी बाला भास्कर का कहना है कि इसे एक ऐसे जमीन विवाद के रूप में देखा जाना चाहिए जिसका समाधान दोनों ही पक्ष नहीं करना चाहते.

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उन्होंने कहा, "हमास का टारगेट अपने हाथ से कंट्रोल देना नहीं है. उनका बड़ा लक्ष्य है कि हमें लंबी लड़ाई लड़नी है. गाजा में जंग के बाद शासन करने के लिए कुछ बचा ही नहीं है.... कुल मिलाकर यह जमीन का ऐसा विवाद है जो सदियों से चला आ रहा है."

अभी गाजा की 60 प्रतिशत जमीन पर इजरायल का कब्जा है.

हमास हथियार नहीं छोड़ेगा

न तो हमास और न ही उसके अधिकारियों ने कहा कि यह ग्रुप हथियार छोड़ देगा. जबकि सीजफायर के ढांचें में हथियारों पर नियंत्रण रखने वाली एक ही गवर्निंग अथॉरिटी की परिकल्पना की गई है, लेकिन हमास ने उस शर्त को स्वीकार नहीं किया है. इजरायली अधिकारियों का तर्क है कि जब तक ग्रुप के पास अपनी सैन्य क्षमता बनी रहेगी, तब तक कोई भी नागरिक प्रशासन हमास के कंट्रोल में ही रहेगा. इजरायल के विदेश मंत्री गिदोन सार ने X पर लिखा, "इजरायल ट्रंप योजना को पूरी तरह लागू करने पर जोर देता है, जिसके मुख्य सिद्धांतों में हमास और अन्य सभी आतंकवादी संगठनों का निरस्त्रीकरण और गाजा पट्टी का पूरी तरह से विसैन्यीकरण शामिल है."

लैंकेस्टर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर साइमन मैबोन ने NDTV को बताया, "यह समय इसलिए अहम है क्योंकि इससे हिंसा रोकने के लिए इजरायल पर आम सहमति बनाने और दबाव डालने की कोशिश की जा रही है. मुझे लगता है कि हमास यह कहना चाह रहा है कि देखिए, हम सीजफायर को लेकर गंभीर हैं, लेकिन इसे असल में सीजफायर लागू करने के लिए ठोस कदमों की जरूरत है."

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उन्होंने आगे कहा, "और मुझे लगता है कि इसीलिए हम हमास की तरफ से टेक्नोक्रेटिक सरकार को कंट्रोल देने और एक तरह से पीछे हटने का आंशिक प्रस्ताव देख रहे हैं, न कि एकतरफा हथियार छोड़ने का. इसलिए मुझे लगता है कि यह इजरायलियों पर एक डील करने और प्रक्रिया के अगले चरण को लागू करने का असली दबाव है, और इस सीजफायर को हकीकत में बदलने की कोशिश है. यह जाहिर है कि अब तक गाजा की जमीन पर असली सीजफायर नहीं रहा है और जिसके कारण बड़ी संख्या में लोग मारे गए हैं."

इतना आसान नहीं होगा गाजा को संभालना

अब गाजा का कामकाज संभालने की जिम्मेदारी जिस टेक्नोक्रैटिक कमेटी को मिली है, उसके सामने भी उतनी ही मुश्किल चुनौतियां हैं. अली शाथ की अगुवाई वाली और UN व अमेरिका के नेतृत्व वाले 'बोर्ड ऑफ पीस' के समर्थन वाली इस कमेटी को गाजा में जरूरी सेवाएं बहाल करने और आम नागरिकों से जुड़े मामलों को देखने का काम सौंपा गया है. लेकिन वैधता का दावा बस कहने भर से नहीं किया जा सकता. बाहर से तैयार किए गए शासन के इस ढांचे को लेकर कई फिलिस्तीनी अभी भी शक में हैं. कुछ लोग सवाल उठाते हैं कि क्या कोई प्रशासन तब ठीक से काम कर सकता है जब इजरायल की पाबंदियां जारी हों और बड़े राजनीतिक मतभेद अनसुलझे हों.

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