PM की पावर घटेगी, टर्म भी अधिकतम दो…समझिए बांग्लादेश के जनमत संग्रह में क्या-क्या हैं सवाल

Bangladesh referendum Explained: बांग्लादेश में आज आम चुनावों के लिए वोटिंग के साथ-साथ जनमत संग्रह भई हो रहा है. आम चुनाव के लिए सफेद बैलेट पेपर का इस्तेमाल किया जा रहा है, जबकि जनमत संग्रह के लिए गुलाबी बैलेट पेपर का इस्तेमाल किया जा रहा है. 

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Bangladesh referendum Explained: बांग्लादेश में आम चुनाव के साथ-साथ जनमत संग्रह
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  • बांग्लादेश में आज आम चुनाव के साथ-साथ जुलाई चार्टर पर जनमत संग्रह भी हो रहा है,
  • जनमत संग्रह में मतदाताओं को 84 प्रस्तावों पर एक साथ हां या ना में वोट करना है, जिसपर आलोचकों ने चिंता जताई है
  • यदि जुलाई चार्टर के पक्ष में जनमत संग्रह पास होता है, तो अगली संसद को 270 दिनों में संवैधानिक संशोधन करना होगा
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Bangladesh Election: बांग्लादेश में 1971 की आजादी के बाद से सबसे अहम चुनावों में से एक आज यानी 12 फरवरी को हो रहा है. शेख हसीना की सरकार के पतन के बाद बांग्लादेश में पहला आम चुनाव हो रहा है और पूरी दुनिया की नजर बांग्लादेश पर है. आज के चुनाव से बांग्लादेश के लोगों को न सिर्फ अगली सरकार और एक नया प्रधान मंत्री मिलेगा बल्कि यह भी तय होगा कि बांग्लादेश में लोकतंत्र कौन सा रास्ता चुनेगा. वो सिर्फ कागज पर जिंदा रहेगा या सच में जमीन पर भी देखने को मिलेगा. दरअसल आज बांग्लादेश के मतदाताओं को दो मतपत्र मिल रहे हैं: एक सांसदों को चुनने के लिए और दूसरा 'जुलाई चार्टर' पर जनमत संग्रह के लिए. नागरिक दूसरे मतपत्र में हां या ना में वोट करके यह बताएंगे कि वो 'जुलाई राष्ट्रीय चार्टर 2025' को लागू करवाना चाहते हैं कि नहीं.

आम चुनाव के लिए सफेद बैलेट पेपर का इस्तेमाल किया जा रहा है, जबकि जनमत संग्रह के लिए गुलाबी बैलेट पेपर का इस्तेमाल किया जा रहा है. 

सवाल है कि 'जुलाई चार्टर' क्या है. अगर जनमत संग्रह का फैसला "जुलाई चार्टर" के पक्ष में आता है तो बांग्लादेश में क्या बदलेगा. बांग्लादेश में आज से पहले कितने जनमत संग्रह हुए हैं और उससे क्या बदलाव आए हैं.

 'जुलाई चार्टर' क्या है?

जुलाई चार्टर बांग्लादेश में एक राजनीतिक और संवैधानिक सुधार की रूपरेखा है, जिसे 2024 के आंदोलन के बाद लोकतांत्रिक शासन को मजबूत करने और तानाशाही ताकत को सीमित करने के लिए बनाया गया है. बांग्लादेश की अंतरिम सरकार का कहना है कि जुलाई चार्टर का मकसद लोकतांत्रिक सुधारों को स्थायी बनाना और कार्यपालिका (सरकार) में ताकत के अत्यधिक केंद्रीकरण को रोकना है.

इसमें आंदोलन में शामिल लोगों, जिन्हें “जुलाई फाइटर्स” कहा गया है, को सुरक्षा देने का प्रस्ताव है. साथ ही शासन व्यवस्था, न्यायपालिका और चुनावी प्रणाली में सुधार, चुनाव के लिए निष्पक्ष केयरटेकर सरकार की वापसी, बुनियादी अधिकारों को मजबूत करना और राष्ट्रीय शासन में सभी की भागीदारी सुनिश्चित करने की बात कही गई है. इसमें प्रधान मंत्री पर दो-कार्यकाल की सीमा लगाने की भी बात है.

सरकार के अनुसार, 84 प्रस्तावों में से 47 को लागू करने के लिए संविधान में संशोधन जरूरी होगा, जबकि बाकी 37 को कानूनों या सरकारी आदेशों के जरिए लागू किया जाएगा.

 'जुलाई चार्टर' पास हो जाता है तो क्या होगा?

इसमें कहा गया है कि जनमत संग्रह का फैसला 'जुलाई चार्टर' के पक्ष में आता है  तो अगली संसद की संविधान सुधार परिषद को 270 दिनों या नौ महीने के भीतर आवश्यक संवैधानिक संशोधन पूरा करना होगा. यदि संविधान सुधार परिषद इस अवधि में ऐसा करने में विफल रहती है, तो अंतरिम सरकार का संविधान संशोधन विधेयक स्वतः ही पारित माना जाएगा. प्रोथोम एलो की रिपोर्ट के अनुसार, अगर मंजूरी मिल जाती है, तो अगली संसद एक संवैधानिक सुधार परिषद के रूप में भी काम करेगी, जिसे 270 दिनों के भीतर स्वीकृत संवैधानिक संशोधनों को लागू करने का काम सौंपा जाएगा.

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आलोचक क्या कहते हैं? 

मतदाताओं को एक-एक सुधारों पर अलग-अलग निर्णय लेने का मौका नहीं दिया गया है बल्कि 84 प्रस्तावों पर एक साथ हां या ना में जवाब देना है. आलोचकों का कहना है कि लोग जुलाई चार्टर के कई प्रस्ताव पर सहमत हो सकते हैं और कई पर नहीं लेकिन सबके लिए उनका जवाब एक कैसे हो सकता है. आलोचकों का कहना है कि यह एक जटिल आधार प्रस्तुत करके मतदाताओं को भ्रमित करता है और सुधारों को ठीक से समझने और बहस करने की उनकी क्षमता को सीमित करता है. 

आलोचकों ने कहा कि यह जनमत-संग्रह अगले सरकार के लिए चार्टर को लागू करना अनिवार्य बनाने और यूनुस के नेतृत्व वाली सरकार को वैधता देने की कोशिश है. यह सरकार छात्र-नेतृत्व वाले आंदोलन, जिसे जुलाई विद्रोह कहा गया, के बाद बनी थी. इस आंदोलन में 5 अगस्त 2026 को तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना की अवामी लीग सरकार गिर गई थी. अंतरिम सरकार ने इस प्रस्ताव पर राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन से हस्ताक्षर भी करवाए और बाद में इसे सरकारी गजट में प्रकाशित कर दिया.

हालांकि, कई कानूनी विशेषज्ञों ने इस जनमत-संग्रह की वैधता पर सवाल उठाए. जाने-माने कानून विशेषज्ञ स्वाधीन मलिक ने कहा, “जुलाई चार्टर के तहत लिए गए अधिकतर फैसले मौजूदा संविधान के खिलाफ हैं.” उन्होंने कहा कि जब संविधान अभी भी लागू है, तो राष्ट्रपति कानूनी रूप से इस गजट पर हस्ताक्षर नहीं कर सकते. यह तभी सही माना जा सकता था, अगर संविधान को रद्द किया गया होता या मार्शल लॉ के तहत निलंबित किया गया होता. मलिक ने कहा, “जब ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है, तो हर काम मौजूदा संविधान के अनुसार ही होना चाहिए.”

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बांग्लादेश में आज से पहले कितने जनमत संग्रह हुए हैं?

बांग्लादेश में यह चौथी बार होगा जब सुधारों का चार्टर पेश किया गया है, जनमत संग्रह किया जा रहा है. 

पहला जनमत संग्रह- 30 मई, 1977
सवाल: "क्या आपको राष्ट्रपति मेजर जनरल जियाउर रहमान, बीयू (बीर उत्तम) और उनके द्वारा अपनाई गई नीतियों और कार्यों पर भरोसा है?"
कुल मतदाता: 3,83,63,858
88.05% मतदान हुआ
हां- 98.88% लोग
नहीं- 1.12% लोग

दूसरा जनमत संग्रह- 21 मार्च, 1985
सवाल: क्या आपको राष्ट्रपति लेफ्टिनेंट जनरल हुसैन मुहम्मद इरशाद द्वारा अपनाई गई नीतियों और कार्यक्रमों पर भरोसा है, और क्या आप निलंबित संविधान के अनुसार चुनाव होने तक राष्ट्रपति के रूप में उनके निरंतर कार्यकाल का समर्थन करते हैं?
कुल मतदाता- 4,79,10,964
72.44% मतदान हुआ
हां- 94.11%
नहीं- 5.50%
 

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तीसरा जनमत संग्रह- 15 सितंबर, 1991
सवाल: क्या पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ बांग्लादेश का संविधान (बारहवां संशोधन) विधेयक, 1991 को राष्ट्रपति की सहमति मिलनी चाहिए?
कुल मतदाता- 6,22,04,118
35.19% मतदान हुआ
हां- 84.38%
नहीं- 15.64%

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