नेपाल में आई बाढ़ पर चीन को किसका डर? तिब्बत में एक-एक खबर पर पहरा, दलाई लामा के भतीजे ने खोली पोल

नेपाल बाढ़ की रिपोर्टिंग से चीन क्यों डर रहा है? चीन ने तिब्बत बाढ़ रिपोर्टिंग को सेंसर कर दिया है, जितने भी वायरल वीडियो हैं उन्हें सोशल मीडिया से हटा लिया है. इसके साथ ही विदेशी मीडिया की एंट्री पर भी रोक लगा दी है.

विज्ञापन
Read Time: 6 mins
नेपाल में सैलाब की तबाही

तिब्बत से शुरू होकर नेपाल के रसुवा को तबाह करने वाले सैलाब की खबरों पर चीन ने सेंसरशिप लगा दी है यानी अब इस बाढ़ से जुड़ी खबरें और वीडियो भी वही देखने को मिलेंगे जिसे चीन की सरकार दिखाना चाहती है. इस भीषण बाढ़ के बाद तिब्बत और नेपाल बॉर्डर के ग्यिरोंग पोर्ट का सीसीटीवी फुटेज वायरल हुआ था, जिसमें दिख रहा है कि लोग भाग रहे हैं और कैसे एक इमारत को चीर कर पूरी चौकी बह जाती है, इसे भी सोशल मीडिया से हटा दिया गया है. इस हादसे से जुड़े कई वीडियो सोशल मीडिया से हटा दिए गए हैं. चीन के भीतर लोग सिर्फ सरकारी मीडिया पर निर्भर हैं. लेकिन सवाल वही है कि आखिरी आपदा में भी चीन ऐसा व्यवहार क्यों कर रहा है और कौन-सा डर है जो तिब्बत-नेपाल में आई बाढ़ को लेकर चीन को सता रहा है.  बता दें कि नेपाल से लगा तिब्बत चीन के सबसे ज्यादा कंट्रोल वाले इलाकों में से एक है. चीन ने यहां विदेशी पत्रकारों का जाना और वहां के लोगों के साथ फोन पर बात करना बैन कर दिया है. विशषज्ञों का कहना है कि तिब्बत को चीन राष्ट्रीय सुरक्षा के चश्मे से देखता है. इस तरह की आपदाएं चीन की उस इमेज को खराब करती हैं जिसके लिए चीन हमेशा कहता आया है कि हमारे यहां स्थिरता है और हम प्राकृतिक आपदाओं को भी आसानी से डील कर लेते हैं. दरअसल, हिमालय में चीन के बड़े हाइड्रोपावर प्रोजेक्टस चल रहे हैं, जो यहां आने वाली आपदाओं को लेकर सवाल बने हुए हैं. चीन पर पहले भी प्रकृति से छेड़छाड़ के आरोप लगते रहे हैं.

चीन की सेंसरशिप नहीं छुपा सकी इतना बड़ा सैलाब (China on Nepal flood)

नेपाल बाढ़ को लेकर एक रिपोर्ट में कहा गया है कि चीनी अधिकारियों ने ग्लेशियर टूटने की खबरों को दबाने की कोशिश की थी, लेकिन ग्लेशियर की गर्जन और धरती के कंपन के साथ नीचे की ओर तेजी से बहते सैलाब ने इस आपदा की भयावहता को खुद ही दुनिया के सामने उजागर कर दिया. इसे चीन अपनी सेंसरशिप के जरिए नहीं छिपा पाया.

ग्लेशियर टूटने से 5.2 तीव्रता के भूकंप के बराबर ऊर्जा निकली थी: दलाई लामा का भतीजा

दलाई लामा के भतीजे खेदरूब थोंडुप ने हवाले से यूरोपियन टाइम्स ने इस मामले पर लिखा कि जब लांगटांग लिरुंग पर्वत के ऊपर मौजूद ग्लेशियर का एक बड़ा हिस्सा टूटकर 2 KM से अधिक नीचे घाटी में गिरा तो धरती भी कांप उठी. बर्फ के इस विशाल हिमस्खलन से 5.2 तीव्रता के भूकंप के बराबर भूकंपीय ऊर्जा निकली,जिसके बाद नेपाल-तिब्बत बॉर्डर पर गांवों में अचानक आई बाढ़ आ गई, लेकिन तिब्बत के अंदर यह त्रासदी केवल फुसफुसाहटों तक ही सीमित है. बीजिंग की सेंसरशिप व्यवस्था ने ये सुनिश्चित किया है कि इस तबाही को लेकर कोई आधिकारिक बुलेटिन, स्थानीय रिपोर्ट सामने न आए. ये चुप्पी संयोग नहीं बल्कि एक नीति है. उन्होंने आगे कहा कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी तिब्बत को एक नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में नहीं, बल्कि 'स्थिरता' दिखाने के मंच के रूप में देखती है. उनका कहना है कि ऐसी आपदाएं उस छवि को नुकसान पहुंचाती हैं, वहीं जलवायु परिवर्तन के दबाव में ग्लेशियरों के टूटने की बात स्वीकार करना हिमालय में चीन की बड़े पैमाने की जलविद्युत और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की कमजोरियों को भी उजागर कर सकता है.थोंडुप ने कहा गया है कि नेपाल तक पहुंची अचानक बाढ़ ने दिखा दिया कि इस तरह की आपदाओं के खतरे सीमाओं से परे तक फैलते हैं. चीन चुप्पी साधे हुए हैं और तिब्बती लोगों की आवाज दबा दी जाती है. स्थानीय प्रत्यक्षदर्शी हैं उन्हें बोलने का मंच नहीं मिलता और कोई कुछ बोलता है या कोई खबर गलती से सामने आ भी जाए तो उसे 'अफवाह' बताकर हटा दिया जाता है.

चीन की ये चुप्पी घातक

यूरोपियन टाइम्स के मुताबिक- नेपाल में जहां सैलाब आया वहां घाटियां बाढ़ के तेज बहाव से गाद और कीचड़ में से भर गई हैं. नेपाल में परिवारों के लोग शोक मना रहे हैं, जबकि सीमा के दूसरी तरफ तिब्बत के लोगों को अपने रिश्तेदारों और गांवों की कोई जानकारी तक नहीं मिल पा रही है. सूचना के अभाव में राहत कार्यों का समन्वय नहीं हो रहा और न ही नीचे के क्षेत्रों को कोई चेतावनी दी जा रही. इससे एक बात और हो रही है कि इतने बड़े हादसे की जवाबदेही भी तय नहीं हो रही. ये चुप्पी घातक है. रिपोर्ट में ये भी कहा गया कि ये पहला मौका नहीं है जब बीजिंग पर तिब्बत में आई किसी आपदा की खबर को दबाने का आरोप लगा हो. इससे पहले भी भूकंप, भूस्खलन और बांध की दुर्घनाओं से जुड़ी घटनाओं को भी दबा दिया जाता है. लांगटांग लिरुंग के पास ग्लेशियर का टूटना ये भी साबित कर रहा है कि तिब्बत से निकलने वाली नदियां, जो नेपाल, भारत और बांग्लादेश तक जाती हैं उन्हें सेंसर नहीं किया जा सकता, वे सच को अपने साथ नीचे तक लेकर जाती हैं. वैसे एक्सपर्ट चेतावनी दे रहे हैं कि  हिमालयी क्षेत्र वैश्विक औसत की तुलना में अधिक तेजी से गर्म हो रहा है. तेजी से ग्लेशियरों के पिघल रहे हैं और इनके अस्थिर और टूटने की घटनाएं बढ़ रही हैं. 

Advertisement

तिब्बत पर तो चीन रखता है खास कंट्रोल

चीन में खबरों पर कड़ा नियंत्रण आम बात है और तिब्बत को लेकर तो चीन खासतौर पर ज्यादा निगरानी रखता है, दरअसल, 1950 के दशक से ही तिब्बत चीन के नियंत्रण में है और तिब्बत की स्वतंत्रता की मांग के लिए विरोध प्रदर्शन का दौर शुरू हो सकता है. सरकारी तौर पर आयोजित विशेष दौरों को छोड़कर किसी भी विदेशी पत्रकार को यहां प्रवेश की अनुमति नहीं है. तिब्बत में अधिकारियों ने तिब्बती भिक्षुओं और भिक्षुणियों पर प्रतिबंध कड़े कर दिए हैं और किसी भी प्रकार के नए विरोध प्रदर्शन को रोकने के लिए पुलिस बल का विस्तार कर दिया है. हालात इतने खराब है कि  मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के मुताबिक-तिब्बतियों को पत्रकारों से बात करने या सरकार के बयान के विपरीत कुछ भी ऑनलाइन पोस्ट करने पर हिरासत में या गिरफ्तार किया जा सकता है. तिब्बत को लेकर अंतरराष्ट्रीय अभियान के कार्यकारी निदेशक रयान फियोरेसी के अनुसार,आपदा की इस स्थिति में भी सूचना या खबरों पर केवल चीनी सरकार का नियंत्रण है. यानी स्थानीय निवासी सजा के डर से इस बारे में कोई जानकारी नहीं दे रहे हैं कि लोग कहां फंसे हैं या सबसे अधिक नुकसान कहां हुआ है. उन्होंने कहा कि अगर लोग उस जानकारी को साझा करने से डरते हैं, या अगर उनकी पोस्ट हटा दी जाती हैं तो संभावित रूप से उपयोगी जानकारी परिवारों, राहत कर्मियों या आम जनता तक नहीं पहुंच पाएगी. 

Featured Video Of The Day
Vande Bharatam | किसानों और मजदूरों के लिए खास गर्मी भगाने वाला ये जादुई तौलिया देखा क्या?

Topics mentioned in this article
Nepal
Nepal News
Nepal Flood
Tibat