- अमेरिकी सेना ने ईरान में घुसकर दो दिन तक चले मिशन में लापता पायलट को सुरक्षित बचाया
- रेस्क्यू ऑपरेशन में सौ से अधिक अमेरिकी कमांडो शामिल थे जिन्हें तकनीकी खराबी के कारण खतरा था
- दो MC-130 विमान उड़ान नहीं भर सके, जिससे सैनिक ईरान के अंदर फंसने के कगार पर आ गए थे
US Pilot Rescue Operation: अमेरिका ने अपने उस पायलट को दो दिन तक चले रेस्क्यू मिशन में सुरक्षित बचा लिया है, जो ईरानी हमले में अपने लड़ाकू विमान को निशाना बनाये जाने के बाद लापता हो गया था. अमेरिकी सेना ने इस अभियान को ईरान में घुसकर अंजाम दिया. ईरान द्वारा विमान को मार गिराये जाने के बाद अमेरिकी वायुसेना का यह अधिकारी दुश्मन से बचने के लिए पहाड़ों की एक दरार में छिप गया और 7,000 फुट की ऊंचाई तक चढ़ाई की. दो दिन तक चले मिशन के बाद अमेरिकी सेना उसे सुरक्षित ले आई. लेकिन अब इस पूरे रेस्क्यू ऑपरेशन की इनसाइड स्टोरी बाहर आ रही है. एक खास बात यह पता चली है कि इस एक पायलट को बचाने के लिए भेजे गए 100 से अधिक अमेरिकी कमांडो की खुद की जान पर बन आई थी और यह मिशन फेल होने वाला था.
आखिर कैसे फेल होने के करीब पहुंच गया था मिशन?
रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार यह रेस्क्यू ऑपरेशन लगभग पूरी तरह सटीक तरीके से चल रहा था. अंधेरे की आड़ में अमेरिकी कमांडो चुपचाप ईरान के अंदर गहराई तक पहुंच गए थे. बिना किसी को पता चले उन्होंने लगभग 7,000 फुट ऊंची पहाड़ी चढ़ी और वहां फंसे पायलट को सुरक्षित निकाल लिया. फिर वे उसे रविवार सुबह होने से पहले एक गुप्त जगह (जहां मिलने का प्लान बनाया गया था) की ओर ले जा रहे थे.
लेकिन तभी सब कुछ रुक गया.
एक अमेरिकी अधिकारी ने रॉयटर्स को बताया कि दो MC-130 विमान, जो स्पेशन ऑपरेशन फोर्सेज के करीब 100 कमांडो को तेहरान के दक्षिण में इस कठिन पहाड़ी इलाके में लाए थे, अचानक तकनीकी खराबी का शिकार हो गए और उड़ान नहीं भर सके. अधिकारी ने गुमनाम रहने की शर्त पर यह जानकारी दी. अचानक स्थिति ऐसी हो गई कि ये कमांडो दुश्मन की सीमा के अंदर ही फंस सकते थे.
आखिरकार यह जोखिम लेना सफल रहा. पायलट और रेस्क्यू टीम को कई चरणों में बाहर निकाल लिया गया. एक परेशानी यह भी थी कि अमेरिकी सैनिक ईरान के अंदर ही खराब पड़े MC-130 विमानों और चार अतिरिक्त हेलीकॉप्टरों को ऐसे ही नहीं छोड़ सकते थे. आखिर में फैसला लेकर इन सबको नष्ट कर दिया, ताकि कोई संवेदनशील सैन्य उपकरण ईरान के हाथ न लग जाए.













