- पाकिस्तान ने ट्रंप प्रशासन के साथ करीबी संबंध बनाए, जिसमें सेना प्रमुख असीम मुनीर मुख्य संपर्क सूत्र थे
- ट्रंप के करीबी सहयोगियों से जुड़े समझौते अमेरिकी कांग्रेस की जांच के दायरे में आने लगे हैं
- आम पाकिस्तानी जनता को उम्मीद है कि अमेरिका में बदलाव से आर्थिक संकट और तेल की कीमतों में राहत मिलेगी
अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पार्टी हार गई है. इससे ट्रंप की ताकत सीमित हो गई है. पाकिस्तान के नेताओं ने ट्रंप को रिझाने में दो साल लगाए तब जाकर वो थोड़े सेट हुए. अब पाकिस्तान को इस बात की चिंता सता रही है कि व्हाइट हाउस तक उनकी पहुंच पर सवाल उठ सकते हैं. हालांकि, आम पाकिस्तानी लोग इन नतीजों को अलग नजरिए से देखते हैं.
आम लोगों की अलग राय
कई लोगों को उम्मीद है कि वाशिंगटन में आए इस बदलाव से जीवन-यापन के संकट में कुछ राहत मिलेगी. ईरान के खिलाफ अमेरिका-इजरायल के युद्ध के कारण ये संकट और गहरा हो गया है. चुनाव के बाद रॉयटर्स से बातचीत में कुछ लोगों ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि वाशिंगटन में हुए इस बदलाव का असर जल्द ही पाकिस्तान में भी देखने को मिलेगा. 24 करोड़ से ज्यादा आबादी वाला यह दक्षिण एशियाई देश अपनी जरूरतों के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर है, और युद्ध की वजह से तेल की बढ़ती कीमतों का बोझ यहां के ज्यादातर परिवारों पर पड़ रहा है.
कराची के रहने वाले सज्जाद अली ने कहा, "हमें नहीं लगता कि मौजूदा अमेरिकी प्रशासन के साथ कोई सार्थक बातचीत हो सकती है. जब तक अमेरिका में सरकार नहीं बदलती, तब तक यह खून-खराबा खत्म नहीं होगा. हम शांति चाहते हैं, आर्थिक सुधार चाहते हैं और तेल की बढ़ती कीमतों में कमी चाहते हैं."
लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान की सरकार और वहां के ताकतवर सैन्य नेतृत्व के लिए, ये नतीजे कहीं ज्यादा चिंताजनक हैं.
पाकिस्तान ने ट्रंप को रिझाने की कोशिश की. इसमें ईरान युद्ध के दौरान मध्यस्थता करना भी शामिल था. इससे ट्रंप प्रशासन के साथ उसके करीबी रिश्ते बन गए. हालांकि, इस पहुंच से अभी तक कोई स्पष्ट आर्थिक फायदा नहीं मिला है. उल्टे, अब ट्रंप के करीबी लोगों के साथ इस्लामाबाद के लेन-देन की अमेरिकी कांग्रेस द्वारा जांच की जा रही है, जिससे उन फायदों पर खतरा मंडराने लगा है, जिनकी उम्मीद पाकिस्तानी नेताओं को थी.
एक व्यक्ति पर दांव
यह नजदीकी ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में ही बननी शुरू हो गई थी. इसमें सेना प्रमुख असीम मुनीर इस्लामाबाद और व्हाइट हाउस के बीच मुख्य संपर्क सूत्र बने. जून 2025 में उनके बीच लंच हुआ, जिसमें पाकिस्तान के नागरिक अधिकारी मौजूद नहीं थे. यह एक असामान्य बात थी, जिसने इस नज़दीकी में सेना को केंद्र में ला खड़ा किया.
पाकिस्तान की सेना के अनुसार, उनकी बातचीत केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसमें माइनिंग, ऊर्जा और क्रिप्टोकरेंसी के क्षेत्रों में सहयोग भी शामिल था.
इसके बाद पाकिस्तान, ट्रंप के 'बोर्ड ऑफ पीस' में शामिल हो गया और उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित किया. पाकिस्तान मई 2025 में भारत के साथ हुए संघर्ष को खत्म करने में भी ट्रंप की भूमिका स्वीकारता है. वहीं, नई दिल्ली इस बात से इनकार करती है कि अमेरिकी मध्यस्थता की वजह से लड़ाई रुकी थी.
इस साल की शुरुआत में, ईरान को लेकर हुई मध्यस्थता ने इस नज़दीकी को एक रणनीतिक आधार दिया. इस्लामाबाद ने अमेरिका और ईरान के बीच संदेश पहुंचाए और अप्रैल में दोनों पक्षों के बीच बातचीत की मेजबानी की. हालांकि, अंततः जो 'इस्लामाबाद समझौता' हुआ, वह जल्द ही विफल हो गया.
आम लोगों के लिए, पाकिस्तान के बढ़ते राजनयिक प्रभाव से युद्ध की कीमतों के खिलाफ शायद ही कोई सुरक्षा मिली है, और देश को भी इससे कोई खास फायदा नहीं हुआ है. दिसंबर 2025 में, US एक्सपोर्ट-इंपोर्ट बैंक ने पाकिस्तान की रेको डिक कॉपर और गोल्ड परियोजना के लिए 1.25 अरब डॉलर की मंजूरी दी. लेकिन US ट्रेजरी सुविधा के लिए पाकिस्तान की 10 अरब डॉलर की मुख्य मांग पर अभी तक कोई जवाब नहीं मिला है.
सौदा जांच के दायरे में
पाकिस्तान के सार्वजनिक और निजी स्तर के संपर्कों में अब राजनीतिक जोखिम है, क्योंकि कई समझौतों में ट्रंप का परिवार या उनके करीबी सहयोगी शामिल हैं. इस्लामाबाद ने 'वर्ल्ड लिबर्टी फाइनेंशियल' (जो ट्रंप से जुड़ी कंपनी है) द्वारा जारी 'USD1' स्टेबलकॉइन के जरिए भुगतान की संभावना तलाशने के लिए समझौता ज्ञापनों (मेमोरेंडम) पर हस्ताक्षर किए हैं. जनवरी में हुए इस समझौते के समय, वित्त मंत्री मुहम्मद औरंगजेब ने कहा कि नवाचार (इनोवेशन) को "नियमों, स्थिरता और राष्ट्रीय हित के अनुरूप" होना चाहिए.
इसके अलावा, मैनहट्टन के रूजवेल्ट होटल के पुनर्विकास के लिए भी एक समझौता किया गया है. इस सौदे की बातचीत दूत स्टीव विटकॉफ ने की थी. साथ ही, पाकिस्तान ने 'पावरस' कंपनी को ड्रोन का एक सीमित ऑर्डर भी दिया है; इस कंपनी के निवेशकों में ट्रंप के बेटे डोनाल्ड जूनियर और एरिक शामिल हैं.
सितंबर में, जब 'पावरस' के बारे में पूछा गया, तो व्हाइट हाउस की प्रवक्ता अन्ना केली ने रॉयटर्स को बताया, "इसमें हितों का कोई टकराव नहीं है."
क्या कहते हैं पाकिस्तान और अमेरिका के एक्सपर्ट
वाशिंगटन में पाकिस्तान के पूर्व राजदूत और अबू धाबी स्थित अनवर गर्गाश डिप्लोमैटिक एकेडमी के सीनियर फेलो, हुसैन हक्कानी ने कहा कि पाकिस्तान के नेताओं ने ट्रंप की टीम के साथ "लेन-देन वाला रिश्ता" बना लिया था. उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति के दोस्तों और रिश्तेदारों से जुड़े कुछ समझौते "शायद टिक न पाएं." उन्होंने आगे कहा, "ऐसा लगता है कि पाकिस्तान इस तरह की जांच-पड़ताल के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं है."
वाशिंगटन स्थित स्टिमसन सेंटर के सीनियर फेलो, डैनियल मार्की ने चेतावनी दी कि अगर ये सौदे निजी स्वार्थों से प्रेरित लगते हैं, तो जांच-पड़ताल से दोनों देशों के व्यापक संबंधों पर बुरा असर पड़ सकता है.
विश्लेषकों का कहना है कि पाकिस्तान के नजरिए से देखें तो, अभी भी कुछ ऐसे दांव हो सकते हैं जो वह चल सकता है. अटलांटिक काउंसिल के माइकल कुगेलमैन ने कहा कि आतंकवाद के खिलाफ सहयोग और ईरान को लेकर पाकिस्तान की कूटनीति को दोनों प्रमुख अमेरिकी दलों (डेमोक्रेट्स और रिपब्लिकन्स) का समर्थन हासिल है. ऐसे में, अगर कोई विवादित सौदा सामने आता है, तो डेमोक्रेट्स इसके लिए पाकिस्तान के बजाय ट्रंप को जिम्मेदार ठहराने की ज्यादा संभावना रखते हैं.
लेकिन कुगेलमैन ने यह भी कहा कि पाकिस्तान के लिए खतरा यह है कि उसने अपनी कूटनीति का सारा दारोमदार व्हाइट हाउस (ट्रंप प्रशासन) पर लगा दिया है, जिसकी वजह से डेमोक्रेट्स के लिए उसके पास कुछ भी नहीं बचेगा.
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