- अमेरिकी राष्ट्रपति ने ईरान में प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई को लेकर सैन्य कदम उठाने की चेतावनी दी है.
- डोनाल्ड ट्रंप मिडिल ईस्ट में एयरक्राफ्ट कैरियर और युद्धपोतों का एक बड़ा बेड़ा तैनात कर दिया है.
- वेनेजुएला मॉडल के तहत ईरान की ऊर्जा संरचना को निशाना बनाकर उसकी अर्थव्यवस्था को कमजोर किया जा सकता है.
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान में प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई और उसके परमाणु कार्यक्रम को लेकर सख्त रुख अपनाते हुए सैन्य कार्रवाई की चेतावनी दी है. हालांकि उन्होंने बातचीत के दरवाजे फिलहाल बंद नहीं किए हैं, लेकिन अगर अमेरिका, ईरान के खिलाफ यदि कोई सैन्य कदम उठाता है तो उसके सामने यह बड़ा सवाल होगा कि ईरान के खिलाफ किस तरह ही कार्रवाई की जाए.
पिछले कुछ हफ्तों से अमेरिका और ईरान के बीच तीखे बयानों का दौर जारी है. अमेरिका ने पहले ही एक एयरक्राफ्ट कैरियर और युद्धपोतों का बेड़ा मिडिल ईस्ट में भेज दिया है. ऐसे में संभावित कार्रवाई के कई विकल्पों पर चर्चा हो रही है.
वेनेजुएला मॉडल जैसी भी चर्चा
- एक रणनीति वेनेजुएला मॉडल जैसी हो सकती है, जिसमें ईरान की ऊर्जा संरचना को निशाना बनाकर तेल निर्यात पर दबाव डाला जाए. विशेषज्ञों के मुताबिक, अमेरिकी नौसेना ईरान के तथाकथित “डार्क फ्लीट” टैंकरों को रोककर उसकी अर्थव्यवस्था को धीरे‑धीरे कमजोर कर सकती है. यह दबाव दिनों, हफ्तों या महीनों तक चल सकता है.
- दूसरा विकल्प सीधे सैन्य कार्रवाई का है, जिसमें इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) और उसकी बसीज मिलिशिया को निशाना बनाया जा सकता है. मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि इन्हीं बलों ने ईरान में प्रदर्शनकारियों पर सबसे ज्यादा हिंसा की है. टोमहॉक मिसाइलों और लड़ाकू विमानों के जरिए सीमित लेकिन सटीक हमले किए जा सकते हैं.
- तीसरा और सबसे बड़ा विकल्प शासन को अस्थिर करने या मौजूदा सत्ता व्यवस्था को बदलने की कोशिश माना जा रहा है. हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान का धार्मिक शासन तंत्र अभी भी मजबूत और संगठित है, और इस तरह की कार्रवाई आसान नहीं होगी.
फिलहाल संकेत यही हैं कि अमेरिका सीमित कार्रवाई के जरिए ईरान को कमजोर करना चाहता है, ताकि बड़े पैमाने की जवाबी कार्रवाई से बचा जा सके.
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खामेनेई ने बरकरार रखी है व्यवस्था
ईरान की धर्म से जुड़ी व्यवस्था 1979 में अयातुल्ला खुमैनी के नेतृत्व में हुई क्रांति के बाद से कायम है, जिसने पश्चिमी देशों के समर्थक शाह को सत्ता से बेदखल कर दिया था. उसी वर्ष शुरू हुए तेहरान स्थित अमेरिकी दूतावास में बंधक संकट के बाद से अमेरिका के साथ संबंध टूट गए और तब से अब तक ये ऐसे ही हैं. 1989 में खामेनेई के सत्ता संभालने के बाद से उन्होंने आर्थिक प्रतिबंधों और बार-बार होने वाले विरोध प्रदर्शनों के बावजूद इस व्यवस्था को अब तक बरकरार रखने में कामयाबी हासिल की है.














