- इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता के लिए पूरी सुरक्षा व्यवस्था और तैयारियां पूरी कर दी गई हैं
- लेबनान में युद्धविराम को लेकर दोनों पक्षों में मतभेद हैं, जिससे वार्ता की सफलता पर सवाल उठ रहे हैं
- ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को अपना संप्रभु जलक्षेत्र घोषित कर नए ट्रांजिट रूट और टोल नियम लागू किए हैं
इस्लामाबाद में बैठक की जगह पूरी तरह तैयार है, सुरक्षा गार्ड तैनात कर दिए गए हैं और मुख्य सड़कों के किनारों को पीले और काले रंग से ताजा पेंट किया गया है.अमेरिका और ईरान के बीच इस महत्वपूर्ण बातचीत के मेजबान के रूप में, पाकिस्तानी सरकारी अधिकारी काफी उत्साहित नजर आ रहे हैं.उनका कहना है कि कई अन्य देशों के विपरीत, उन्हें दोनों ही पक्षों (अमेरिका और ईरान) का भरोसा हासिल है.अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे उपराष्ट्रपति जेडी वेंस भी काफी सकारात्मक लग रहे हैं. अमेरिका से रवाना होने से पहले उन्होंने कहा, "अगर ईरानी पक्ष नेक नीयत से बातचीत करने को तैयार है, तो हम निश्चित रूप से दोस्ती का हाथ आगे बढ़ाने के लिए तैयार हैं."हालांकि, उन्होंने एक चेतावनी भी दी है कि अगर वे हमारे साथ चाल चलने की कोशिश करेंगे, तो उन्हें पता चल जाएगा कि हमारी बातचीत करने वाली टीम इतनी नरम भी नहीं है." यह कहना भी बिल्कुल गलत नहीं होगा कि इस शांति समझौते की राह में बाधाओं का एक पूरा पहाड़ खड़ा है.
1.लेबनान का मुद्दा: क्या वार्ता शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाएगी?
दोनों के बीच युद्धविराम की शर्तों में लेबनान पर हमले रोकना शामिल नहीं था, ईरान ने चाहता है कि लेबनान में भी युद्धविराम का पालन होना चाहिए. वहीं इजरायल ईरान के सहयोगी संगठन हिजबुल्लाह के खिलाफ जारी सैन्य अभियान के चलते इस वार्ता को शुरू होने से पहले ही पटरी से उतारने की धमकी दे रहा है.ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने एक्स (X) पर पोस्ट किया: "इन कार्रवाइयों के जारी रहने से बातचीत बेमानी हो जाएगी. हमारी उंगलियां अभी भी ट्रिगर पर हैं.ईरान अपने लेबनानी भाई-बहनों को कभी अकेला नहीं छोड़ेगा."
दूसरी ओर, इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का कहना है कि हिजबुल्लाह के मामले में कोई युद्धविराम नहीं है.हालांकि, इजरायल ने बेरूत के दक्षिणी उपनगरों के निवासियों को इलाका खाली करने की बार-बार चेतावनी तो दी है, लेकिन अभी तक कोई बड़ी सैन्य कार्रवाई नहीं की है. डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि लेबनान में इजरायल की कार्रवाई अब थोड़ी धीमी रहेगी.साथ ही, अमेरिकी विदेश विभाग का कहना है कि अगले हफ्ते वाशिंगटन में इजरायल और लेबनान के बीच सीधी बातचीत होगी.अब देखना यह है कि क्या यह धीमी कार्रवाई ईरान को संतुष्ट करने के लिए काफी होगी या नहीं.
2.होर्मुज पर अड़ा ईरान, ट्रंप का अल्टीमेटम
एक और गंभीर मुद्दा जो शुरुआत से ही इस बातचीत को रोक सकता है, वह है तेल परिवहन का सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग—होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz). डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि ईरान जहाजों को इस जलडमरूमध्य से गुजरने देने में बहुत खराब प्रदर्शन कर रहा है, जबकि उसने शुरुआत में वादा किया था कि वह रास्ता खुला रखेगा. ट्रंप ने अपने 'ट्रुथ सोशल' (Truth Social) पोस्ट में ईरान पर अवैध और बेईमान होने का आरोप लगाते हुए घोषणा की थी कि यह वह समझौता नहीं है जो हमारे बीच हुआ था.
ईरान का नया 'नियम' और होर्मुज में $20 लाख का टोल
इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर अपनी पकड़ मजबूत करने के बाद, ईरान अब इसे औपचारिक रूप देने पर आमादा है.वह इसे "संप्रभु ईरानी जलक्षेत्र" (Sovereign Iranian Water) कह रहा है और वहां से क्या गुजर सकता है और क्या नहीं, इसके लिए नियमों का एक नया सेट बनाने की बात कर रहा है.गुरुवार को ईरान ने मौजूदा ट्रैफिक चैनलों के उत्तर में नए 'ट्रांजिट रूट' बनाने की घोषणा की है. शिपिंग कंपनियों के डर का फायदा उठाते हुए ईरान ने बयान दिया कि मुख्य ट्रैफिक जोन में विभिन्न प्रकार की एंटी-शिप माइन्स (समुद्री बारूदी सुरंगों) से बचने के लिए ये नए रास्ते जरूरी हैं. ऐसी खबरें आ रही हैं कि पिछले कुछ हफ्तों में जो जहाज वहां से निकलने में कामयाब रहे, उन्हें $20 लाख (करीब ₹17 करोड़) का 'टोल' चुकाना पड़ा है. इस पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि ईरान "टैंकरों से फीस वसूलने की गलती न करे, वरना अंजाम बुरा होगा"
3.परमाणु पर अमेरिका की दो टूक
ईरान और अमेरिका के बीच चल रही तनातनी में सबसे विवादित मुद्दा परमाणु कार्यक्रम है.हाल ही में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' (Operation Epic Fury) शुरू किया, जिसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि ईरान कभी परमाणु हथियार हासिल न कर सके. ट्रंप का रुख बेहद सख्त है.उनकी योजना के अनुसार,ईरान को अपनी धरती पर यूरेनियम संवर्धन (Uranium Enrichment) पूरी तरह बंद करना होगा. हालिया हमलों (जैसे 'मिडनाइट हैमर') के दौरान जो परमाणु सामग्री मलबे में दब गई थी, ट्रंप ने उसे "खोदकर बाहर निकालने और हटाने" की बात कही है.रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने स्पष्ट किया है कि "ईरान के पास कभी परमाणु हथियार नहीं होंगे, बात खत्म."
ईरान ने इस युद्धविराम को अपनी जीत बताया है और बातचीत के लिए अपनी शर्तें रखी हैं. ईरान का कहना है कि वह 'परमाणु अप्रसार संधि' (NPT) का सदस्य है, इसलिए उसे नागरिक उद्देश्यों के लिए यूरेनियम संवर्धन का अधिकार मिलना चाहिए. ईरान चाहता है कि दुनिया उसके संवर्धन के अधिकार को स्वीकार करे और उस पर लगे सभी प्राथमिक व माध्यमिक प्रतिबंध हटाए जाएं. अमेरिकी रक्षा मंत्रालय (Pentagon) के अनुसार, 38 दिनों के सैन्य अभियान के बाद ईरान के रक्षा औद्योगिक आधार का 85% से अधिक हिस्सा नष्ट हो चुका है. उसके परमाणु बुनियादी ढांचे का 80% हिस्सा प्रभावित हुआ है, जिससे परमाणु हथियार बनाने की उसकी क्षमता काफी कम हो गई है.
4.ईरान का क्षेत्रीय प्रभाव: 'एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस' पर संकट
ईरान का क्षेत्रीय सहयोगियों और प्रॉक्सी संगठनों का नेटवर्क जैसे लेबनान में हिजबुल्लाह, यमन में हूती, गाजा में हमास और इराक के विभिन्न मिलिशिया तेहरान को इस क्षेत्र में बड़ी ताकत देते हैं. इसे अक्सर ईरान की "फॉरवर्ड डिफेंस" (Forward Defence) रणनीति कहा जाता है, जिससे वह सीधे अपने देश में लड़ने के बजाय इजरायल और अमेरिका के साथ संघर्ष को अपनी सीमाओं से दूर रखता है. अक्टूबर 2023 से 'एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस' कहे जाने वाले इस नेटवर्क पर लगातार हमले हो रहे हैं.सीरिया में बशर अल-असद की सरकार का गिरना ईरान के लिए सबसे बड़ा झटका साबित हुआ है, क्योंकि अब उसके पास सीरिया जैसा सुरक्षित गलियारा नहीं बचा है.
इजरायल इस नेटवर्क को अपने लिए अस्तित्व का खतरा मानता है और इसे पूरी तरह खत्म करने की कड़ी कोशिश कर रहा है. आर्थिक दबाव और जनता का गुस्सा: ईरान की अर्थव्यवस्था बुरी तरह चरमरा रही है. 2026 की शुरुआत से ही ईरान के सभी 31 प्रांतों में भीषण विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. आम ईरानी अब सवाल उठा रहे हैं कि सरकार अपनी जनता की भलाई के बजाय विदेशी संगठनों (Proxies) पर इतना पैसा क्यों खर्च कर रही है.इन सब दबावों के बावजूद, अभी तक ऐसे कोई संकेत नहीं मिले हैं कि ईरानी सरकार अपने इन क्षेत्रीय सहयोगियों का साथ छोड़ने के लिए तैयार है.
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5.$120 अरब की मांग: क्या ट्रंप झुकेंगे?
ईरानी सरकार दशकों से कड़े अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों की मार झेल रही है और अब वह किसी भी समझौते के बदले सभी अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों को हटाने की मांग कर रही है.: शुक्रवार को ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबफ ने कहा कि बातचीत शुरू होने से पहले लगभग $120 अरब (£89 अरब) की फ्रीज की गई ईरानी संपत्तियों को छोड़ना होगा. पहले से तय शर्तें? गालिबफ के अनुसार, यह उन दो शर्तों में से एक थी जो पहले ही तय हो चुकी थीं (दूसरी शर्त लेबनान में सीजफायर थी). दिलचस्प बात यह है कि 7 अप्रैल को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने जब दो हफ्ते के सीजफायर का ऐलान किया, तो उन्होंने संपत्तियों को छोड़ने के बारे में एक शब्द भी नहीं कहा. यह साफ नहीं है कि कलीबाफ किस 'समझौते' की बात कर रहे हैं. इसकी संभावना बहुत कम है कि ट्रंप प्रशासन बातचीत शुरू करने के लिए इतनी बड़ी रियायत (Concession) देने को तैयार होगा.ट्रंप ने केवल इतना कहा है कि वह 'टैरिफ और प्रतिबंधों में ढील' पर चर्चा करने के लिए तैयार हैं, लेकिन पैसा पहले देने की बात पर वह मौन हैं.
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