ट्रंप से पहले भी अमेरिका ने 3 बार ग्रीनलैंड को लेना चाहा, 158 साल पुराने 'आर्कटिक मिशन' में छिपी वजह

US Greenland Pursuit: ग्रीनलैंड की लोकेशन ही उसे अमेरिका के लिए आंखों का तारा बनाती है. समझिए 158 साल से अमेरिका ग्रीनलैंड को कैसे और क्यों खरीदने की कोशिश करता रहा है.

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US Greenland Pursuit: 158 साल से अमेरिका ग्रीनलैंड को खरीदने की कोशिश कर रहा है.
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  • डोनाल्ड ट्रंप किसी कीमत पर ग्रीनलैंड लेने की इच्छा जता चुके हैं, जबकि डेनमार्क और ग्रीनलैंड ने मना किया है
  • अमेरिका ने पिछले 158 वर्षों में तीन बार ग्रीनलैंड को हासिल करने के लिए प्रयास किए हैं
  • ग्रीनलैंड की लोकेशन ही उसे अमेरिका के लिए आंखों का तारा बनाती है.
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अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप डेनमार्क के स्वायत्त क्षेत्र ग्रीनलैंड को लेना चाहते हैं और वो यह काम किसी भी कीमत पर करने का संकेत दे रहे हैं. ग्रीनलैंड का सरकार और डेनमार्क, दोनों की तरफ से बार-बार मना करने के बावजूद ट्रंप जिद्द पर अड़े हैं. कभी वो अमेरिका की सैन्य ताकत का धौंस दिखा रहे हैं तो कभी ग्रीनलैंड के लोगों को लालच दे रहे हैं. हालांकि डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड को खरीदने की इच्छा कोई नई बात नहीं है, बल्कि यह अमेरिकी इतिहास की एक लंबी रणनीति का हिस्सा है. अमेरिका पिछले 158 सालों में कम से कम तीन बार इसे हासिल करने की कोशिश कर कर चुका है. चलिए आपको बताते हैं.

नोट- ग्रीनलैंड में साल 1979 से व्यापक स्वशासन है, हालांकि रक्षा और विदेश नीति डेनमार्क के हाथों में है. इसीलिए ग्रीनलैंड को डेनमार्क का अर्ध-स्वायत्त हिस्सा माना जाता है. 

158 साल पुराने 'आर्कटिक मिशन' की कहानी

1867-1868 (अलास्का के बाद की कोशिश): अमेरिका ने 1867 में अलास्का को रूस से खरीदा था और उसके तुरंत बाद तब के अमेरिकी विदेश मंत्री विलियम सीवार्ड और उनके अधिकारियों ने आर्कटिक में व्यापक प्रयास के हिस्से के रूप में ग्रीनलैंड के अधिग्रहण पर चर्चा की थी. सीवार्ड ने कहा था कि ग्रीनलैंड का यह क्षेत्र कोयले सहित प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध है. लेकिन यह विचार कभी औपचारिक प्रस्ताव तक नहीं पहुंच पाया, क्योंकि तक की अमेरिकी कांग्रेस (संसद) को आर्कटिक के एक और क्षेत्र के अधिग्रहण को आगे बढ़ाने में बहुत कम रुचि थी.

1910 (लैंड स्वैप का प्रस्ताव): अमेरिकी राष्ट्रपति विलियम हॉवर्ड टैफ्ट के शासन में एक बार फिर ग्रीनलैंड को अमेरिका में मिलाने की कोशिश हुई. तब के अमेरिकी राजनयिकों (डिप्लोमैट) ने एक कोशिश की कि डेनमार्क को जमीन देकर उसके बदले उससे ग्रीनलैंड ले लिया जाए. हालाांकि डेनमार्क ने प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया, और यह योजना जल्द ही मिट्टी में मिल गई.

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1946 (100 मिलियन डॉलर का ऑफर): वक्त बीतता गया लेकिन ग्रीनलैंड पाने की अमेरिकी हसरत कम ना हुई. शीत युद्ध की शुरू होने के बाद तात्कालिक अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन की सरकार ने ग्रीनलैंड के रणनीतिक महत्व का हवाला देते हुए औपचारिक रूप से डेनमार्क को ग्रीनलैंड खरीदने के लिए 100 मिलियन डॉलर का सोना देने की पेशकश की थी. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, ग्रीनलैंड पर अमेरिका के बनाए हवाई क्षेत्र ने यूरोप के रास्ते में सैन्य विमानों के लिए एक प्रमुख ईंधन भरने वाले बिंदु के रूप में काम किया था.

डेनमार्क ने ट्रूमैन के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया, हालांकि अमेरिका ने सैन्य पहुंच बरकरार रखी. वह सैन्य मौजूदगी आज भी ग्रीनलैंड के सुदूर पिटुफिक स्पेस बेस पर है. यह अमेरिकी रक्षा विभाग का उत्तर में सबसे दूर सैन्य अड्डा है.

आखिर अमेरिका ग्रीनलैंड के लिए जिद्दी क्यों है?

ग्रीनलैंड की लोकेशन ही उसे अमेरिका के लिए आंखों का तारा बनाती है. ग्रीनलैंड पर नियंत्रण करने से अमेरिका को एक अत्यंत महत्वपूर्ण नौसैनिक गलियारे में एक चौकी (आउटपोस्ट) मिल जाएगी जो अटलांटिक महासागर और आर्कटिक को जोड़ता है. पहले से ही एक अमेरिकी सैन्य अड्डा, जो मिसाइल रक्षा में माहिर है, वो इस द्वीप पर है. ग्रीनलैंड का अधिकांश भाग आर्कटिक सर्कल के अंदर है, जहां महाशक्तियां सैन्य और वाणिज्यिक प्रभुत्व दोनों के लिए आपस में प्रतिस्पर्धा कर रही हैं. 

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ग्रीनलैंड में दुर्लभ पृथ्वी खनिजों (रेयर अर्थ मिनर्ल्स) का भी विशाल भंडार है. एडवांस टेक्नोलॉजी का उपयोग करके बैटरी, सेलफोन, इलेक्ट्रिक वाहन और अन्य वस्तुएं बनाने के लिए ये महत्वपूर्ण घटक हैं. चूंकि इस मोर्चे पर चीन वैश्विक बाजार पर हावी है, अब अमेरिका आगे निकलना चाहता है. कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्रीनलैंड के महाद्वीपीय शेल्फ के कुछ हिस्सों में आर्कटिक में सबसे बड़े न निकाले गए तेल और गैस भंडार हो सकते हैं. पर्यावरणीय जोखिमों को देखते हुए डेनमार्क सरकार ने यहां तेल या गैस नहीं निकाला लेकिन अमेरिका की इसमें दिलचस्पी हो सकती है.

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