रूसी और ईरानी तेल पर अमेरिकी छूट खत्म, भारत पर पड़ेगा गंभीर असर!

अमेरिका ने रूस और ईरान के तेल पर दी गई प्रतिबंध छूट बढ़ाने से इनकार किया है. इससे भारत पर असर पड़ सकता है, जिसने छूट के दौरान तेल आयात बढ़ाया था. इससे कीमतों और आपूर्ति पर दबाव बढ़ेगा.

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नई दिल्ली:

अमेरिका ने बड़ा फैसला लेते हुए कहा है कि वह रूस और ईरान से तेल खरीद पर दी गई प्रतिबंध छूट (Sanctions Waiver) को आगे नहीं बढ़ाएगा. इस फैसले का असर भारत समेत उन देशों पर पड़ सकता है, जिन्होंने इन छूटों का फायदा उठाकर तेल आयात जारी रखा था.

अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने बुधवार को साफ शब्दों में कहा, 'रूसी तेल और ईरानी तेल पर दी गई सामान्य लाइसेंस छूट को अब आगे नहीं बढ़ाया जाएगा. यह छूट केवल उस तेल के लिए थी, जो 11 मार्च से पहले समुद्र में लदा हुआ था. अब वह अवधि पूरी हो चुकी है.'

क्यों दी गई थी छूट?

दरअसल, पश्चिम एशिया में युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति पर असर पड़ा था. इसी को देखते हुए अमेरिका ने अस्थायी तौर पर यह छूट दी थी, ताकि वैश्विक तेल की कमी न हो और बढ़ती ऊर्जा कीमतों पर लगाम लग सके.

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छूट कब खत्म हो रही है?

बता दें कि रूसी तेल के लिए दी गई 30 दिन की छूट 11 अप्रैल को खत्म हो चुकी है.  ईरानी तेल के लिए दी गई छूट 19 अप्रैल को समाप्त हो जाएगी. गौरतलब है कि होर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया का करीब 20 प्रतिशत कच्चा तेल और गैस गुजरता है. मार्च में ईरान द्वारा इस रास्ते पर सख्ती के बाद कई जहाज समुद्र में फंस गए थे, जिसके बाद अमेरिका ने यह अस्थायी राहत दी थी.

भारत को कैसे मिला फायदा?

इन छूटों का सबसे ज़्यादा फायदा भारत को मिला. रिपोर्ट्स के मुताबिक भारतीय रिफाइनरियों ने इस दौरान करीब 3 करोड़ बैरल रूसी तेल के ऑर्डर दिए. रिलायंस जैसी बड़ी कंपनियों ने पहले रूसी कंपनियों से खरीद कम की थी, लेकिन बाद में फिर से खरीद बढ़ाई. इतना ही नहीं, छूट के दौरान करीब 7 साल बाद पहली बार ईरानी कच्चे तेल के जहाज भारत पहुंचे. प्रतिबंधों से पहले ईरान भारत का बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता था. एक समय भारत की कुल तेल आयात में ईरानी तेल की हिस्सेदारी 11.5 प्रतिशत तक थी. लेकिन 2018 में अमेरिकी प्रतिबंध सख्त होने के बाद मई 2019 से भारत ने ईरान से तेल खरीद बंद कर दी थी.

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अब क्या बढ़ेगी मुश्किल?

छूट खत्म होने का मतलब है कि भारत को फिर से वैकल्पिक स्रोतों से तेल खरीदना पड़ सकता है. इससे तेल की लागत बढ़ने का खतरा रहेगा साथ ही रिफाइनरियों की सप्लाई चेन पर भी दबाव बनेगा. 

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अमेरिका में भी हुआ विरोध

हालांकि छूट का मकसद कीमतें कम करना था, लेकिन अमेरिका में खुद इस फैसले की कड़ी आलोचना हुई. डेमोक्रेटिक सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने कहा कि रूसी प्रतिबंधों में ढील से रूस को भारी आर्थिक फायदा हुआ, जिससे वह युद्ध को और लंबा खींच सकता है. डेमोक्रेट नेता चक शूमर सहित कई नेताओं ने कहा कि इन छूटों से रूस सीधे तौर पर लाभ उठा रहा है और अमेरिका को यह नीति तुरंत वापस लेनी चाहिए.

ईरान पर ‘मैक्सिमम प्रेशर' पॉलिसी

विशेषज्ञों का मानना है कि छूट न बढ़ाने का फैसला अमेरिका की ईरान के खिलाफ मैक्सिमम प्रेशर नीति का हिस्सा है. मध्य‑पूर्व में जारी संघर्ष के बीच अमेरिका ईरान पर आर्थिक दबाव और बढ़ाना चाहता है.

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रूसी और ईरानी तेल पर अमेरिकी छूट खत्म होना केवल कूटनीतिक फैसला नहीं, बल्कि इसका सीधा असर भारत की ऊर्जा सुरक्षा और तेल कीमतों पर पड़ सकता है. आने वाले दिनों में भारत को तेल आयात को लेकर नई रणनीति पर काम करना पड़ सकता है.

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