अमेरिका में गोरों और कालों के लिए अलग-अलग क्यों होते थे स्कूल? UGC नियमों पर SC ने किया जिक्र

UGC Equity Rules Stayed By SC: UGC अधिसूचना पर कड़ी टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उस अमेरिकी समाज को भी याद किया जब गोरों और अश्वेतों के लिए अलग-अलग स्कूल हुआ करते थे.

विज्ञापन
Read Time: 3 mins
4 फरवरी, 1964 को एक चर्च बच्चों ने स्कूल एकीकरण का जश्न मनाते हुए (AFP)
फटाफट पढ़ें
Summary is AI-generated, newsroom-reviewed
  • सुप्रीम कोर्ट ने यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन के जातिगत भेदभाव रोकने वाले नए नियमों पर फिलहाल रोक लगा दी है
  • SC ने सुनवाई में अमेरिका का जिक्र किया जहां गृहयुद्ध के बाद गोरों और कालों के लिए अलग-अलग स्कूल होते थे
  • अमेरिका में दक्षिणी राज्यों में जिम क्रो कानूनों के तहत अश्वेतों को अलग रखने के प्रयास जारी रहे
क्या हमारी AI समरी आपके लिए उपयोगी रही?
हमें बताएं।

सुप्रीम कोर्ट ने जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए लाए गए यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन यानी UGC के नए नियमों पर रोक लगा दी है. भारी विवाद के बीच UGC के नियमों के खिलाफ याचिकाएं दायर की गई थीं. इन याचिकाओं में कहा गया था कि कमीशन ने जाति-आधारित भेदभाव की जो परिभाषा अपनाई है उसमें हर समुदाय को शामिल नहीं किया है. खास बात है कि UGC अधिसूचना पर कड़ी टिप्पणी करते हुए, दो जजों की बेंच ने उस अमेरिकी समाज को भी याद किया जब गोरों और अश्वेतों के लिए अलग-अलग स्कूल हुआ करते थे. जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि मुझे उम्मीद है कि हम उस स्थिति तक नहीं पहुंचेंगे जहां अमेरिका की तरह अलग-अलग स्कूल हों, जहां कभी अश्वेत और श्वेत बच्चों को अलग-अलग स्कूलों में पढ़ना पड़ता था.

हां कभी अमेरिका में नस्लवाद एक सच्चाई थी और यह अभी भी पूरी तरह खत्म हो गया है, ऐसा भी नहीं है. चलिए आपको उस वक्त के अमेरिका से मिलाते हैं जब नस्लवाद कानून बनाकर किया जाता था.

जब नस्लवाद में पूरी तरह डूबा था अमेरिका

अमेरिका के गृह युद्ध (1861-1865) से पहले वहां अश्वेत और गुलाम बच्चों को स्कूल जाने की अनुमति नहीं थी. जब युद्ध समाप्त हुआ तो उसके तुरंत बाद, अमेरिकी सरकार ने चाहती थी कि अब गुलाम रखने वाले राज्य भी श्वेतों के साथ-साथ अश्वेत बच्चों को पढ़ाएं. दक्षिणी अमेरिका के इन्हीं राज्यों ने संयुक्त अमेरिका बनाने की खिलाफत की थी, यूनियन के खिलाफ लड़ाई रखी थी. ये राज्य खेती किसानी वाले थे और वो चाहते थे कि वहां अश्वेतों की गुलामी कभी खत्म न हो. लेकिन गृह युद्ध के बाद स्थिति बदल गईं.

1868 में, अमेरिकी संसद ने अमेरिकी संविधान में 14वां संशोधन पारित किया, जिसने प्रत्येक नागरिक को कानून के तहत समान अधिकार और सुरक्षा की गारंटी दी. इसमें शिक्षा तक समान पहुंच भी शामिल थी. इन फैसलों से हर कोई सहमत नहीं था. दक्षिणी अमेरिका के नेता नहीं चाहते थे कि अश्वेत लोगों को गोरे लोगों के समान अधिकार प्राप्त हों. इसलिए अधिकांश दक्षिणी राज्यों ने अश्वेतों और गोरे लोगों को अलग-अलग रखने के लिए 1870 के दशक के अंत में कई कानून बनाए, जिन्हें जिम क्रो कानून कहा जाता है.

पूरे दक्षिणी अमेरिका में, लगभग सभी सार्वजनिक स्थान- जैसे रेस्टोरेंट, पार्क, मूवी थिएटर, ट्रेन, स्विमिंग पूल, स्कूल और यहां तक कि पीने के नल भी नस्ल के आधार पर अलग-अलग थे. इन नए कानूनों के कारण ही दक्षिणी राज्यों में अश्वेत बच्चे और श्वेत बच्चे एक स्कूल में नहीं पढ़ सकते थे. दोनों के अलग-अलग स्कूल होते थे.

और फिर लड़ी गई कानूनी लड़ाई

थर्गूड मार्शल ने इन अश्वेत बच्चों के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी. बाद में वे सुप्रीम कोर्ट में पहले अफ्रीकी अमेरिकी न्यायाधीश बने थे.  ब्राउन बनाम शिक्षा बोर्ड नाम के केस में थर्गूड मार्शल पांच बच्चों और उनके परिवारों के वकील बने. सुप्रीम कोर्ट में उन्होंने तर्क दिया कि उसका पहले का फैसला- अलगाव ही एकसमान होना होता है- गलत था और वास्तव में बच्चों के लिए हानिकारक था. कोर्ट उनकी बात से सहमत हो गया. 17 मई, 1954 को, हर जज ने फैसला सुनाया  कि पब्लिक स्कूलों में बच्चों का नस्लीय अलगाव असंवैधानिक था. इसका मतलब था कि अब अमेरिका के पब्लिक स्कूलों में बच्चों को नस्ल के आधार पर अलग करना अमेरिकी संविधान के खिलाफ था.

यह भी पढ़ें: UGC के नए नियम अस्पष्ट, दुरुपयोग का खतरा, सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक

Featured Video Of The Day
India AI Impact Summit 2026 | भारत AI का नेचुरल हब बन रहा है: PM Modi
Topics mentioned in this article