गल्फ में चल रही एक और लड़ाई, OPEC से बाहर निकलकर UAE ने सऊदी-पाकिस्तान को आंख दिखाई?

UAE Exit From OPEC: ओपेक छोड़कर UAE न सिर्फ अमेरिका के साथ अपने रिश्ते मजबूत करना चाहता है, बल्कि सऊदी अरब और पाकिस्तान के गठबंधन को भी कमजोर करना चाहता है. समझिए क्यों.

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क्या OPEC से बाहर निकलकर UAE ने सऊदी-पाकिस्तान को आंख दिखाई?
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  • UAE ने करीब साठ वर्षों बाद ओपेक से बाहर निकलने का निर्णय लिया है, जिससे तेल और राजनीति दोनों प्रभावित होंगे
  • सऊदी अरब ने तेल उत्पादन की सीमा तय कर रखी है जिससे UAE असंतुष्ट था, वह अधिक तेल उत्पादन नहीं कर पा रहा था
  • UAE का यह कदम सऊदी अरब की तेल कीमत नियंत्रित करने की ताकत को कमजोर कर सकता है और अमेरिका के करीब लाएगा
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UAE Exit From OPEC: संयुक्त अरब अमीरात यानी UAE ने करीब 60 साल बाद तेल उत्पादक देशों के संगठन OPEC (ओपेक) छोड़ने का बड़ा फैसला लिया है. UAE के इस फैसले को सिर्फ तेल का नहीं, बल्कि राजनीति का भी बड़ा खेल माना जा रहा है. इससे न सिर्फ इस तेल संगठन और एक तरह से इसके सबसे बड़े नेता माने जाने वाले सऊदी अरब को झटका लग सकता है, बल्कि सऊदी अरब के रक्षा साझेदार पाकिस्तान पर भी असर पड़ सकता है.

दरअसल UAE और सऊदी अरब के बीच तनाव काफी समय से चल रहा था. हालांकि ईरान के हमलों के कारण दोनों देश एक मोर्चे पर दिखने लगे थे. यूरेशिया ग्रुप के मिडिल ईस्ट के प्रमुख फिरास मकसद ने फाइनेंशियल टाइम्स से कहा, “UAE खुश नहीं था कि उसे अपनी तेल उत्पादन सीमा में बंधकर रहना पड़े, खासकर जब वह ज्यादा तेल निकालना चाहता था और सऊदी अरब कम उत्पादन चाहता था.” 

UAE पाकिस्तान से भी नाराज रहा है. इसकी वजह है पाकिस्तान के सऊदी अरब के साथ बढ़ते रिश्ते, और अमेरिका व ईरान के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाना. UAE को लगता है कि पाकिस्तान ने ईरान को खाड़ी देशों पर हमलों के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया. चैथम हाउस के एक्सपर्ट नील क्विलियम ने कहा कि पाकिस्तान की मध्यस्थ की भूमिका से UAE नाराज था. उन्होंने कहा, “UAE के नजरिए से इसमें कोई न्यूट्रल (तटस्थ) जगह नहीं है. अगर आप बीच में हैं, तो आप किसी एक तरफ नहीं हैं और यह UAE को मंजूर नहीं.”

ओपेक छोड़ने से UAE को क्या फायदा?

UAE ओपेक का तीसरा सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश है और 1967 में इसमें शामिल हुआ था. लेकिन ओपेक में शामिल देशों के लिए तेल उत्पादन की सीमा सऊदी अरब तय करता रहा है, जिससे UAE ज्यादा तेल निर्यात नहीं कर पा रहा था. अब ओपेक छोड़ने से UAE को आजादी मिल जाएगी कि वह बाजार के हिसाब से जल्दी फैसला ले सके और ज्यादा मुनाफा कमा सके.

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इस फैसले से सऊदी अरब की छवि को भी नुकसान होगा, क्योंकि अब तेल की कीमतों को नियंत्रित करने की उसकी ताकत कमजोर पड़ेगी. साथ ही, इससे UAE को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के और करीब आने में मदद मिल सकती है, जो लंबे समय से ओपेक की आलोचना करते रहे हैं.

खाड़ी देशों से UAE की नाराजगी

UAE ने यह फैसला अचानक लिया, जब खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) की बैठक सऊदी अरब की राजधानी जेद्दा में हो रही थी. यह बैठक ईरान के हमलों के बाद पहली बार बुलाई गई थी. UAE इजरायल के सबसे करीब और ईरान के सबसे खिलाफ माना जाता है और इस युद्ध में ईरान का वहीं सबसे बड़ा निशाना बना. उसने 2,200 से ज्यादा ड्रोन और मिसाइल हमलों को रोका.

द गार्डियन की रिपोर्ट के अनुसार, UAE ने सऊदी अरब और कतर पर दबाव डाला कि वे मिलकर ईरान के खिलाफ जवाबी हमला करें. लेकिन जीसीसी देशों के बीच इस पर कोई एक राय नहीं बन पाई, क्योंकि ऐसा कदम बहुत जोखिम भरा माना गया- इसे इजरायल का साथ देने के रूप में भी देखा जा सकता था. जब UAE को राजनीतिक समर्थन नहीं मिला, तो उसने आर्थिक स्तर पर भी अलग रास्ता अपनाने का फैसला कर लिया है.

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सऊदी अरब को झटका क्यों?

UAE की सरकारी कंपनी एडनॉक के अनुसार, ओपेक से बाहर निकलने के बाद UAE 2027 तक अपना तेल उत्पादन 34 लाख बैरल प्रतिदिन से बढ़ाकर 50 लाख बैरल प्रतिदिन कर सकता है. ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य बंद करने के बाद, ओपेक का कुल उत्पादन भी काफी गिरा. मार्च में यह 27% गिरकर 2.079 करोड़ बैरल प्रतिदिन रह गया- जो हाल के दशकों में सबसे बड़ी गिरावट है.

दुबई के एमिरेट्स पॉलिसी सेंटर की प्रमुख डॉक्टर इबतिसाम अल-केतबी ने कहा कि UAE का यह कदम अपने हितों को ध्यान में रखकर लिया गया है. उन्होंने कहा, “UAE अब एक समूह का हिस्सा रहने के बजाय खुद बाजार को संतुलित करने वाला देश बनना चाहता है.”

उन्होंने यह भी कहा कि इससे ओपेक कमजोर हो सकता है, लेकिन UAE की ताकत बढ़ेगी. इसके अलावा, ओपेक छोड़ने से UAE अमेरिका के और करीब आ सकता है, जिससे उसे निवेश के फायदे मिल सकते हैं.

पाकिस्तान वाला फैक्टर क्या है?

UAE ओपेक से निकलने से पहले ही अपना असर दिखा रहा था. इसी महीने उसने पाकिस्तान से 3.5 अरब डॉलर की लोन राशि वापस ले ली, जो पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार का बड़ा हिस्सा थी. इसे ईरान के मुद्दे पर पाकिस्तान की तटस्थता से UAE की नाराजगी के रूप में देखा गया. इसके बाद सऊदी अरब को पाकिस्तान की मदद के लिए आगे आना पड़ा. विशेषज्ञों के अनुसार, खाड़ी देशों के बीच यह तनाव कई सालों से चल रहा है. यमन के गृह युद्ध को लेकर भी सऊदी अरब और ङओआ अलग-अलग पक्षों का समर्थन करते हैं.

एक और वजह यह भी है कि सऊदी अरब, पाकिस्तान, तुर्की और मिस्र के साथ ज्यादा करीब है. नील क्विलियम ने कहा, “यह तनाव अभी भी मौजूद है, और पाकिस्तान इसका एक बड़ा हिस्सा बन सकता है. वहीं UAE का झुकाव भारत की तरफ ज्यादा है... UAE को लगता है कि सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच बढ़ता गठबंधन उसके हितों के खिलाफ है.”

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ओपेक छोड़कर UAE न सिर्फ अमेरिका के साथ अपने रिश्ते मजबूत करना चाहता है, बल्कि सऊदी अरब और पाकिस्तान के गठबंधन को भी कमजोर करना चाहता है.

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