इजरायल और लेबनान के बीच जारी जंग में उम्मीद की नई किरण दिख रही है. कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि दोनों के बीच सीजफायर पर सहमति बन गई है. हालांकि इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है. खबर लिखे जाने तक इजरायल में कैबिनेट की बैठक चल रही थी, जिसमें अस्थायी सीजफायर पर विचार किया जा रहा है. बेरूत में एनडीटीवी के संवाददाता मोहम्मद गजाली ने बताया कि अगर सीजफायर होता है तो अमेरिका और ईरान के बीच इसका श्रेय लेने के लिए नई होड़ शुरू हो सकती है.
लेबनान में युद्धविराम पर सहमति का दावा
कतर के अखबार Al-Araby Al-Jadeed ने ईरानी सूत्रों के हवाले से दावा किया है कि लेबनान में युद्धविराम पर सहमति बन गई है. अगर इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू सहमति से पीछे नहीं हटते तो आने वाले कुछ घंटों में युद्धविराम लागू हो सकता है. शुरू में यह एक हफ्ते के लिए लागू होगा, जिसे आगे बढ़ाया भी जा सकता है.
ईरान का दबाव और पाकिस्तान की भूमिका
अखबार का दावा है कि सीजफायर पर इस सहमति तक पहुंचने में ईरान का दबाव और पाकिस्तान की मध्यस्थता अहम रही है. अमेरिका से शांति वार्ता के दौरान ईरान की एक शर्त लेबनान में इजरायल के हमले रोकने की भी थी. इसे पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर की बुधवार को तेहरान यात्रा से जोड़कर बताया जा रहा है.
हिज्बुल्लाह ने भी ईरान को दिया क्रेडिट
इसके अलावा अल जजीरा ने भी हिज्बुल्लाह के सीनियार अधिकारी के हवाले से कहा है कि ईरान के दबाव की वजह से ही इजरायल और लेबनान के बीच यह संभावित सीजफायर मुमकिन हो पाया है. ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट को बंद करके जो दबाव बनाया, यह उसी का नतीजा है कि इजरायल को सीजफायर के लिए राजी होना पड़ा है.
अमेरिका-ईरान में भी बन सकती है बात
कहा जा रहा है कि इजरायल और लेबनान में जंग रुकी तो अमेरिका और ईरान के बीच भी स्थायी युद्धविराम की संभावना बन सकती है क्योंकि ईरान की एक शर्त लेबनान पर इजरायल के हमले रोकने की भी है.
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अमेरिका भी क्रेडिट लेने में पीछे नहीं
उधर अमेरिका भी इस सीजफायर का क्रेडिट लेने में पीछे नहीं रहेगा. अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो की मध्यस्थता में वॉशिंगटन में इजरायल और लेबनान के बीच उच्च स्तरीय सीधी वार्ता हुई है. 1993 के बाद यह दोनों देशों के बीच पहली बड़ी उच्च-स्तरीय बातचीत थी.
अमेरिका में हुई थी सीधी बात
अमेरिकी विदेश मंत्रालय के मुताबिक, इस बैठक में अमेरिका के वरिष्ठ अधिकारी और इजरायल व लेबनान के राजदूत शामिल हुए. बातचीत को उपयोगी बताया गया. सभी पक्षों ने तय समय और स्थान पर सीधी बातचीत शुरू करने पर भी सहमति जताई. हालांकि यह भी स्पष्ट किया कि यह प्रक्रिया लंबी होगी और इसे एक दिन में पूरा नहीं किया जा सकता.
हिज्बुल्लाह के प्रभाव को खत्म करना मकसद
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने इसे ऐतिहासिक अवसर बताते हुए कहा कि यह कोशिश केवल तुरंत युद्धविराम तक सीमित नहीं है. इसका मकसद क्षेत्र में पिछले 20-30 साल से मौजूद हिजबुल्लाह के प्रभाव को स्थायी रूप से खत्म करना है. उन्होंने कहा कि लेबनान के लोग हिजबुल्लाह और ईरान की आक्रामक नीतियों के शिकार हैं.
लेबनान सरकार बोली, हम खुद सक्षम हैं
इस बीच, लेबनान सरकार का कहना है कि कोई भी देश उनकी तरफ से सीजफायर पर बात नहीं कर सकता. वह अपने दम पर युद्धविराम के लिए वार्ता करने में सक्षम हैं. लेबनान के अंदर हिज्बुल्लाह को लेकर भी मतभेद हैं.
देश के दक्षिणी इलाके में ही इजरायल के ज्यादातर हमले हो रहे हैं. इस क्षेत्र में अधिकतर शिया आबादी रहती है. इन हमलों की वजह से दक्षिण के बहुत से लोगों को पलायन करना पड़ा है. बेरूत में भी काफी लोग रिफ्यूजी की तरह रहने पर मजबूर हैं. बेरूत में सुन्नी और ईसाई समुदाय के लोग हिज्बुल्लाह का विरोध करते हैं और लेबनान की तबाही के लिए उसे जिम्मेदार ठहराते हैं.














