अफ्रीका के कई गरीब देशों में बच्चे को जन्म देते वक्त होने वाली मांओं की मौत रोकने के लिए सिर्फ 75 रुपये की एक खास प्लास्टिक शीट मददगार साबित हो रही है. दरअसल बच्चे को जन्म देने वाली हर 10 में से एक महिला को डिलीवरी के बाद अत्यधिक खून बहने यानी पोस्टपार्टम हेमोरेज का सामना करना पड़ता है. हर साल कम से कम 70 हजार महिलाओं की इससे मौत हो जाती है. इनमें से लगभग सभी महिलाएं गरीब देशों से होती हैं. किसी भी अन्य देश की तुलना में नाइजीरिया में बच्चे को जन्म देते समय सबसे अधिक महिलाओं की मौत होती है. अब नाइजीरिया में यह 75 रुपए वाली प्लास्टिक इन मांओं के लिए संजीवनी साबित हो रही है.
क्या होता है पोस्टपार्टम हेमोरेज?
बच्चे के जन्म के बाद, जब प्लेसेंटा यानी गर्भनाल मां के शरीर से अलग होता है, तो सैकड़ों ब्लड वेसल खुल जाते हैं और उनसे खून बहने लगता है. नॉर्म केस में डिलीवर के बाद गर्भाशय तेजी से सिकुड़ता है, और इस दबाव से वे ब्लड वेसल बंद हो जाते हैं. लेकिन अगर गर्भाशय सिकुड़ता नहीं है या बहुत धीरे-धीरे सिकुड़ता है, या फिर प्लेसेंटा का कोई हिस्सा अंदर ही रह जाता है, तो खून लगातार बहता रहता है. ऐसी स्थिति में, महिला की जान मात्र 10 मिनट के भीतर जा सकती है.
कई महिलाओं की मौत का एक बड़ा कारण यह है कि यह पता लगाना बहुत मुश्किल होता है कि किसी महिला का बहुत ज़्यादा खून बह रहा है. यह प्लास्टिक शीट यही बताती है कि ज्यादा खून बह गया है. जब तक कि बच्चे को डिलीवरी कराने वाले डॉक्टर यह तय करते हैं कि अब कुछ करने का समय आ गया है, तब तक अक्सर बहुत देर हो चुकी होती है.
कैसे काम करता है यह प्लास्टिक
यह डिवाइस हरे रंग के पतले प्लास्टिक का एक टुकड़ा है. इसके एक सिरे पर एक थैली लगी है. इसे 'मैटरनल ड्रेप' कहा जाता है. प्रसव के दौरान यह मां के नीचे बिछा हुआ होता है और इसकी थैली बिस्तर के किनारे से लटकी होती है. न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार ब्लड वेसल से खून बहकर थैली में जाता है और उसमें डेंजर लेबल मार्क होता है. यह स्तर 300 मिलीलीटर का है, जिसे थैली पर बने एक निशान से दर्शाया गया है. अगर इससे ज्यादा खून बह गया मतलब खतरे की बात है.
अब तक इसका मुख्य हल यही था कि ट्रेंड डॉक्टर और नर्स उन महिलाओं को पहचानें जिन्हें खतरा है, और डिलीवरी के दौरान अचानक कोई परेशानी आने पर फौरन इलाज करें. लेकिन मिडवाइफ और महिला डॉक्टरों को तैयार करना न सस्ता है, न आसान. उन्हें गांव-देहात में रोकना भी मुश्किल है, जहां उनकी सबसे ज्यादा जरूरत है, क्योंकि शहरों या दूसरे देशों में उन्हें ज्यादा कमाई मिलती है.
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डॉ. हदीजा गलाडांसी कानो में बायेरो यूनिवर्सिटी में प्रसूति और स्त्री रोग की प्रोफेसर हैं. वह नाइजीरिया में इस प्लास्टिक ड्रेप के इस्तेमाल पर हुए रिसर्च की देखरेख कर रही हैं. एक रिसर्च के मुताबिक, इस प्लास्टिक शीट और इलाज के इस तरीके को एक साथ अपनाने से अस्पतालों में प्रसव के बाद ज्यादा खून बहने से होने वाली मौतों में करीब दो-तिहाई की कमी आई है. नाइजीरिया में इस तकनीक का इस्तेमाल तेजी से बढ़ाया जा रहा है. केन्या और दक्षिण अफ्रीका में भी इसका परीक्षण हो चुका है. अब नाइजीरिया में ही इन शीट्स का निर्माण किया जा रहा है और दूसरे पड़ोसी देशों में भी इनका निर्यात शुरू हो गया है.
कीमत केवल 75 रुपए
नाइजीरिया में रिसर्च के लिए इस्तेमाल किए गए प्लास्टिक ड्रेप भारत से मंगाए गए थे, लेकिन इनकी कीमत लगभग 300 रुपए प्रति ड्रेप थी. नाइजीरिया जैसे गरीब देश के लिए यह कीमत इतनी अधिक थी कि देश का बजट इस खर्चे को उठा नहीं सकता था. फिर डॉ. गलाडांसी और उनकी टीम कानो की एक फैमिली कंपनी के पास गई, जो प्लेट, कांटे और तेल के डिब्बे बनाती थी. डॉ. गलाडांसी ने चीफ इंजीनियर को ड्रेप दिखाकर पूछा कि क्या आप इसे बना सकते हैं?
कंपनी ने एक सैंपल बनाया, लेकिन ज्यादा बनाने के लिए खास मशीनें चाहिए थीं, जो ताइवान से मंगानी पड़ीं. गेट्स फाउंडेशन ने 6 लाख डॉलर की मदद दी. बदले में कंपनी सिस्ट्स इंजीनियरिंग ने ड्रेप को 70 सेंट में सरकार को बेचने पर हामी भरी. ईरान युद्ध की वजह से कच्चा माल महंगा हो गया है, इसलिए अब ड्रेप 80 सेंट का पड़ता है. भारतीय करेंसी में यह लगभग 75 रुपए होता है. अब यह कंपनी पूरे नाइजीरिया के लिए ड्रेप बना रही है और अब पड़ोसी देशों को भी भेजने लगी है.
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