यह कहना गलत नहीं होगा कि देशभक्ति का जज्बा ही युवाओं को सेना की ओर खींचता है, लेकिन लिथुआनिया की गलियों में कहानी कुछ अलग है. रूस और बेलारूस के साथ सीमा साझा करने वाले इस छोटे से देश में युवा सेना की वर्दी तो पहन रहे हैं, लेकिन उनके दिल में देशप्रेम से कहीं ज्यादा 'प्लान-बी' की चिंता है. सेना में भर्ती होने वाले इन छात्रों का साफ कहना है कि वे किसी जुनून की वजह से नहीं, बल्कि भविष्य की अनिश्चितता और आर्थिक सुरक्षा की वजह से फौज का रुख कर रहे हैं.
लिथुआनिया की सरकार ने हाल ही में अपनी ड्राफ्ट पॉलिसी (अनिवार्य सैन्य सेवा) में बदलाव कर इसे और सख्त बना दिया है. अब 18 से 22 साल के हर उस युवा को सेना में सेवा देना अनिवार्य है जो स्वास्थ्य जांच में फिट पाया जाता है. सरकार को उम्मीद है कि इस साल सेना में शामिल होने वाले सभी युवा 'स्वयंसेवक' होंगे, लेकिन हकीकत यह है कि इन युवाओं के पास चुनने के लिए विकल्प ही नहीं बचे हैं.
मजबूरी में कर रहे फौज की नौकरी
विल्नियस (लिथुआनिया की राजधानी) के एक हाई स्कूल में अपनी पढ़ाई के आखिरी साल में खड़े छात्र डरे हुए हैं. उनके सामने विश्वविद्यालय जाने और नौकरी ढूंढने की चुनौती है, लेकिन ऊपर से सेना की अनिवार्य सर्विस का दबाव भी है. 18 साल के डॉमिनिकास कहते हैं, "मैं इस साल सेना में नहीं जाना चाहता. अगर मुझे अभी ड्राफ्ट किया गया, तो मेरी पढ़ाई की लय टूट जाएगी और यह मेरे करियर के लिए बड़ी समस्या बन जाएगी."
भविष्य की अनिश्चितता को लेकर चिंतित है युवा?
लिथुआनिया के रक्षा मंत्रालय को भले ही लगता है कि युवा देश की रक्षा के लिए उत्साहित हैं, लेकिन जमीनी सच्चाई वैलेंटाइनस जैसे छात्रों की बातों में झलकती है. उसने बताया, "मुझे नहीं पता कि भविष्य में क्या करना है. मुझे समझ नहीं आ रहा कि आगे क्या पढ़ाई करूं, इसलिए सेना में जाना मेरे लिए एक बेहतरीन विकल्प है." यानी जिन युवाओं के पास कोई करियर प्लान नहीं है, उनके लिए सेना ही एक सुरक्षित पनाहगाह बन गई है.
जानकारों का मानना है कि 2014 में क्रीमिया पर रूसी कब्जे के बाद से ही लिथुआनिया अपनी सैन्य ताकत बढ़ाने में जुटा है. 2022 में यूक्रेन पर हुए हमले के बाद से इस डर ने और जोर पकड़ लिया है. इस साल ड्राफ्ट लिस्ट में नाम शामिल करने की संख्या 3,500 से बढ़ाकर 5,000 कर दी गई है. अब तो उन छात्रों को भी छूट नहीं मिल रही है जो उच्च शिक्षा हासिल कर रहे हैं.
सेना कितना पैसा दे रही है?
जब देशभक्ति की बात आती है, तो युवा छात्र चौंकाने वाले दावे करते हैं. 18 साल के रोकास का मानना है कि सेना में स्वेच्छा से आने वाले युवाओं में से मुश्किल से 'दस प्रतिशत' ही वास्तव में देशभक्त होंगे. बाकी लोगों के लिए यह एक आर्थिक फैसला है. यूक्रेन युद्ध के बाद से सरकार ने सेना के वेतन और भत्तों में भारी बढ़ोतरी की है, जो युवाओं को आकर्षित करने का सबसे बड़ा जरिया बना है.
लिथुआनिया में 9 महीने की सैन्य सेवा के दौरान एक युवा करीब 8,835 यूरो (लगभग 8 लाख रुपये से ज्यादा) तक कमा सकता है. यह कमाई उनकी परफॉर्मेंस और इस बात पर निर्भर करती है कि वे खुद सेना में आए हैं या उन्हें जबरन बुलाया गया है. जो युवा खुद आगे आकर नाम लिखाते हैं, उन्हें न केवल 30 प्रतिशत ज्यादा पैसा मिलता है, बल्कि उन्हें अपनी पसंद की जगह और समय पर सेवा देने की छूट भी मिलती है.














