पाकिस्तानी फौज के खिलाफ लश्कर ए तैयबा के बगावती तेवर, हाफिज की आतंकी टोली में पड़ी फूट, बड़े धमाके की तैयारी

Pakistan Terror Heaven: हाफिज सईद का सार्वजनिक रूप से बहुत कम दिखाई देना भी इस बात का संकेत है कि सब कुछ ठीक नहीं है. अगर लश्कर-ए-तैयबा खुलकर पाकिस्तान सेना और सरकार के खिलाफ बगावत करता रहा, तो यह बेहद खतरनाक हो सकता है- रिपोर्ट

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पाकिस्तानी फौज के खिलाफ लश्कर ए तैयबा के बगावती तेवर- रिपोर्ट
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  • लश्कर-ए-तैयबा संगठन में हाल के महीनों में नेतृत्व स्तर पर असंतोष और गंभीर मतभेद उत्पन्न हो गए हैं- रिपोर्ट
  • ऑपरेशन सिंदूर के बाद संगठन का बुनियादी ढांचा कमजोर हुआ और ISI एवं सेना पर भरोसा कम हुआ है
  • लश्कर कैडर को पाकिस्तान सरकार, सेना द्वारा चीन एवं पश्चिमी देशों के हितों को प्राथमिकता देना पसंद नहीं आया है
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पाकिस्तान का प्यारा और पाला हुआ आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा एक बड़े विभाजन की ओर बढ़ रहा है. इससे पाकिस्तान की स्थिति और ज्यादा अराजक हो सकती है. न्यूज एजेंसी आईएएनएस की रिपोर्ट के अनुसार ऐसी जानकारी भारतीय खुफिया एजेंसियों को मिली है. कई वर्षों से लश्कर पाकिस्तान का पसंदीदा प्रॉक्सी संगठन रहा है और कभी भी संगठन के भीतर बगावत नहीं देखी गई. इसके अलावा, यह संगठन हमेशा पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी- ISI के निर्देशों पर चलता रहा है और जो कहा गया, उससे कभी नहीं भटका. लेकिन अब इसमें फूट आने लगी है.

रिपोर्ट के अनुसार इंटेलिजेंस ब्यूरो के एक अधिकारी ने बताया कि अब समस्याएं उभरने लगी हैं और हाल के महीनों में संगठन को जो कुछ फैसले लेने पड़े हैं, उनसे शीर्ष नेतृत्व के कुछ लोग असंतुष्ट हैं. अधिकारी ने आगे कहा कि *ऑपरेशन सिंदूर* वह निर्णायक मोड़ था, जिसमें संगठन का बड़ा बुनियादी ढांचा नष्ट हो गया. इसके बाद दोबारा संगठित होना मुश्किल हो गया और कई लोगों ने ISI और पाकिस्तानी सेना पर से भरोसा खो दिया, क्योंकि उन्हें लगा कि उनकी पर्याप्त सुरक्षा नहीं की गई.

ISI ने किसी तरह मतभेद सुलझा लिए और संगठन को फिर से खड़ा करने की प्रक्रिया शुरू हुई. लेकिन सेना और ISI द्वारा लश्कर-ए-तैयबा को तालिबान, तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) और बलूचिस्तान नेशनलिस्ट आर्मी (बीएलए) के खिलाफ इस्तेमाल करने का फैसला संगठन के ज्यादातर लड़ाकों को बिल्कुल पसंद नहीं आया है.

अधिकारियों का कहना है कि लश्कर के कैडर को लगता है कि पाकिस्तान सरकार और सेना चीन और पश्चिमी देशों के हितों को जरूरत से ज्यादा महत्व दे रही है. चीन और अमेरिका दोनों की बलूचिस्तान में मौजूद दुर्लभ खनिजों में रुचि है. टीटीपी और बीएलए बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा (केपी) में पाकिस्तानी सेना के खिलाफ लगातार लड़ रहे हैं. चूंकि सेना इन संगठनों को संभाल नहीं पा रही, इसलिए उसने इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रांत (ISKP) को लश्कर-ए-तैयबा के साथ जोड़कर टीटीपी और बीएलए के खिलाफ उतारने का फैसला किया.

लश्कर के नेतृत्व ने अब सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं कि चीनी और पश्चिमी हितों की रक्षा के लिए उन्हें अपने ही लोगों से लड़ने की क्या जरूरत है. इसके अलावा, लश्कर स्वाभाविक रूप से ISKP के साथ नहीं जुड़ता, क्योंकि उसे अफगान तालिबान का दुश्मन माना जाता है. जबकि लश्कर-ए-तैयबा तालिबान के समर्थन में हमेशा खुलकर बोलता रहा है और अब जब पाकिस्तानी सेना अफगानिस्तान में तालिबान के खिलाफ लड़ रही है, तो इससे लश्कर का नेतृत्व और ज्यादा नाराज हो गया है.

पाकिस्तान पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि असंतोष अब साफ दिखाई देने लगा है. पहले यह सब दबे-दबे था, लेकिन अब खुले तौर पर सामने आ गया है. उन्हें लगता है कि पाक सरकार और सेना उनसे जरूरत से ज्यादा उम्मीदें कर रही है. लश्कर का नेतृत्व अपने कैडर को यह समझाने में असमर्थ है कि वे अपने ही लोगों से क्यों लड़ रहे हैं. कैडर का मानना है कि सभी को एकजुट रहना चाहिए और केवल भारत और पश्चिमी ताकतों के खिलाफ लड़ना चाहिए.

हाल ही में लश्कर-ए-तैयबा के कमांडर मोहम्मद अशफाक राणा का एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें वह पाक सरकार और सेना की आलोचना करते नजर आ रहा है. वीडियो में वह कहता है कि प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर ने उनका इस्तेमाल किया है. राणा वीडियो में कहता है कि सरकार और सेना एक तरफ उन्हें सुरक्षा देने में नाकाम रही और दूसरी तरफ देश को बर्बाद कर दिया. वह कर्ज में डूबे देश की बात करता है और कहता है कि अगर उधार लिए गए पैसे का आधा भी बिना लूटे सही तरीके से इस्तेमाल किया जाता, तो पाकिस्तान समृद्ध हो सकता था.

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लश्कर नाराज है

अधिकारियों का कहना है कि ये सभी हालिया घटनाएं इस बात का संकेत हैं कि संगठन के कुछ सदस्यों और सत्ता प्रतिष्ठान (सरकार और सेना) के बीच गंभीर दरार पैदा हो चुकी है. उन्होंने यह भी कहा कि हाफिज सईद का सार्वजनिक रूप से बहुत कम दिखाई देना भी इस बात का संकेत है कि सब कुछ ठीक नहीं है. अगर लश्कर-ए-तैयबा खुलकर सत्ता प्रतिष्ठान के खिलाफ बगावत करता रहा, तो यह बेहद खतरनाक हो सकता है.

इस संगठन के कैडर बेहद समर्पित माने जाते हैं और अतीत में इनके बगावत करने के मामले लगभग न के बराबर रहे हैं. अगर ये लोग टीटीपी जैसे संगठनों में शामिल हो गए, तो पाकिस्तान सरकार और सेना को बड़ा झटका लगेगा. एक अन्य अधिकारी ने कहा कि अगर पाकिस्तान में हिंसा बढ़ती रही और आतंकी संगठन अपने दम पर काम करने लगे, तो यह पूरे क्षेत्र की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन जाएगा. उन्होंने यह भी जोड़ा कि अगर ऐसा लश्कर-ए-तैयबा में हुआ, तो ज्यादा समय नहीं लगेगा जब जैश-ए-मोहम्मद में भी इसी तरह की स्थिति देखने को मिले.

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(इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)
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