खामेनेई का खात्मा, अरब देशों का सरेंडर... क्या इजरायल ही होगा मिडिल ईस्ट का बॉस

Israel Iran Attack: इजरायल ने पिछले कुछ सालों में बार-बार यह साबित किया है कि वह अपने सबसे बड़े दुश्मनों तक पहुंचकर उन्हें खत्म करने की ताकत रखता है.हमास, हिजबुल्ला, हूती नेतृत्व और अब ईरान के शीर्ष कमान को करीब-करीब पूरी तरह खत्म कर दिया है. सच यह है कि इजरायल शायद ही कभी आज जितना ताकतवर दिखा हो.

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  • इजरायल और अमेरिका के हमलों के बाद ईरान कमजोर हुआ है और अब बातचीत के लिए तैयार माना जा रहा है.
  • इजरायल ने मिडिल ईस्ट में अपने विरोधियों जैसे हमास, हिजबुल्ला और ईरान के शीर्ष कमांडरों को निशाना बनाया है.
  • यूएई, बहरीन और मोरक्को पहले ही इजरायल के साथ राजनयिक और व्यापारिक संबंध स्थापित कर चुके हैं.
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नई दिल्‍ली:

"इजरायल का मिडिल ईस्ट पर हक है, अगर वह उस पर कब्जा कर ले तो भी ठीक है..." इजरायल में अमेरिकी राजदूत माइक हकाबी ने ये बयान ईरान पर इजरायल-अमेरिका के हमले से 10 दिन पहले दिया था. अब वही होता नजर आ रहा है. अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप ने दावा किया है कि अयातुल्ला अली खामेनेई समेत 40 टॉप कमांडरों की मौत के बाद ईरान बातचीत की टेबल पर आने को तैयार हो गया है. इजरायल और अमेरिका के हमलों से ईरान टूट गया है. ईरान को इन हमलों में कुल कितना नुकसान हुआ है, इसकी कोई आधिकारिक जानकारी तो अभी सामने नहीं आई है, लेकिन ईरान के परमाणु संयंत्र से लेकर सेना मुख्‍यालय तक हमलों में तबाह हो गए हैं. मिडिल ईस्‍ट में ईरान ही है, जो इजरायल के सामने सिर उठाता था. लेकिन अब ईरान को भी इजरायल घुटनों पर ले आया है. ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि मिडिल ईस्‍ट का बॉस इजरायल ही होगा. 

इजरायल की ताकत के आगे झुके दुश्‍मन

इजरायल ने पिछले कुछ सालों में बार-बार यह साबित किया है कि वह अपने सबसे बड़े दुश्मनों तक पहुंचकर उन्हें खत्म करने की ताकत रखता है.
कभी अमेरिका की मदद से, तो कभी बगैर किसी मदद के. फटने वाले पेजर से लेकर सटीक मिसाइलों और बंकर उड़ाने वाले बमों तक, इजरायल ने गजा, लेबनान, यमन और अब ईरान में अपने बड़े विरोधियों को निशाना बनाकर खत्म किया है. हमास, हिजबुल्ला, हूती नेतृत्व और अब ईरान के शीर्ष कमान को करीब-करीब पूरी तरह खत्म कर दिया है. सच यह है कि इजरायल शायद ही कभी आज जितना ताकतवर दिखा हो.

ईरान में प्रतिरोध की धुरी का खत्‍मा

इजरायल और अमेरिका पिछले काफी समय से ईरान से बातचीत के जरिए चीजों को सुलझाने की कोशिश कर रहा था. अमेरिका ने साफ कर दिया था कि वह ईरान को परमाणु शक्ति नहीं बनने दे सकता है. लेकिन ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई पीछे हटने को तैयार नहीं थे. वह लगातार परमाणु शक्ति बनने की दिशा में काम कर रहे थे. ऐसे में खामेनेई की मौत को प्रतिरोध की धुरी (Axis of Resistance) के खात्मे की तरह देखा जा रहा है. राष्‍ट्रपति ट्रंप ने दावा किया है कि ईरान अब बातचीत करने के लिए तैयार हो गया है. हमलों से हुए नुकसान के बाद ईरान इस स्थिति में नहीं है कि वह अपनी शर्तें रख सके. ऐसे में इजरायल का दबदबा अब ईरान पर भी कायम रहेगा.

यूएई, बहरीन और मोरक्को पहले ही इज़रायल के संबंध सुधार चुके

मिडिल ईस्‍ट के देश यूएई, बहरीन और मोरक्को जैसे देश पहले ही इजरायल के साथ संबंध सामान्य कर चुके हैं. यूएई और इजरायल में साल 2020 के बीच कई अहम समझौते हुए थे. दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंध भी हैं. इसके बाद से यूएई और इजरायल कई क्षेत्रों में समझौते कर चुके हैं.  साल 2022 में दोनों देशों ने ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौता (FTA) किया. यह इज़रायल का किसी अरब राष्ट्र के साथ पहला ऐसा व्यापारिक समझौता था. 2024 में इज़रायल–यूएई व्यापार लगभग 3.2 अरब अमेरिकी डॉलर रहा, जो 2025 में भी यह व्यापार लगभग 3.2 अरब अमेरिकी डॉलर रहा है. 

बहरीन से संबंध: ईरान–इज़रायल संघर्ष में बहरीन भी हमलों की रेंज में आया, और क्षेत्रीय हवाई क्षेत्र कई जगह बंद हुआ. इसकी वजह है, इजरायल और बहरीन के संबंध, जो पिछले कुछ समय में बेहतर हुए हैं. बहरीन और इजरायल के संबंध 2020 के अब्राहम समझौते के तहत औपचारिक रूप से स्थापित हुए थे. इजरायल और बहरीन के बीच 2023–24 के दौरान व्यापार तेज़ी से बढ़ा, कई गुना वृद्धि दर्ज की गई. 2023 में इज़रायल ने बहरीन को $5.65 मिलियन का निर्यात किया. बहरीन ने इज़रायल को $16.5 मिलियन का निर्यात किया. 2024 की पहली छमाही में व्यापार 879% बढ़ा.   

मोरक्को से संबंध: इजरायल और मोरक्को ने दिसंबर 2020 में अमेरिकी मध्यस्थता से अब्राहम अकॉर्ड्स के तहत औपचारिक संबंध स्थापित किए थे. इसके बाद से दोनों के संबंध बेहतर होते जा रहे हैं. 

सऊदी अरब और यूएई अपने आर्थिक विकास को युद्ध की भेंट नहीं चढ़ाना चाहते

सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) जैसे खाड़ी देश तेजी से आर्थिक आधुनिकीकरण और वैश्विक निवेश आकर्षण की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं. इसमें इजरायल इनका साथ दे रहे हैं. हालांकि, विकास के लिए क्षेत्रीय स्थिरता आर्थिक विकास की मुख्य शर्त है. लगातार युद्ध या तनाव न केवल निवेशकों का विश्वास कमजोर करते हैं, बल्कि विज़न 2030 जैसे महत्वाकांक्षी कार्यक्रमों के लिए आवश्यक पूंजी, तकनीक और साझेदारियों पर भी नकारात्मक असर डालते हैं. सऊदी अरब की विदेश नीति पर क्षेत्रीय अस्थिरता का सीधा प्रभाव पड़ता है, क्योंकि विजिन 2030 के तहत आर्थिक विविधीकरण के लिए उसे सुरक्षित माहौल और बाहरी निवेश की जरूरत है. इसी कारण दोनों देश इज़रायल के साथ संबंधों को लेकर व्यवहारिक रुख अपनाते दिखते हैं. 

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क्‍या मिडिल ईस्‍ट में दखल देंगे चीन और रूस? 

इजरायल ने जब अमेरिका के साथ मिलकर ईरान पर हमला किया, तो कोई उसके समर्थन में नहीं खड़ा हुआ. चीन और रूस जैसे ने भी समय पर ईरान का साथ नहीं दिया. हालांकि, यूएनएससी में जरूर ईरान पर हुए हमले की निंदा की. लेकिन ईरान की मदद के लिए मैदान में नहीं उतारा. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्‍या चीन और रूस जैसे देश मिडिल ईस्ट में इजरायल की धमक को बर्दाश्त करेंगे? चीन का रुख हमेशा से साफ रहा है, वो किसी युद्ध में सीधे शामिल होने से बचता है. उसका पूरा फोकस अपने व्‍यापार को बढ़ाने पर होता है. वहीं, रूस पिछले कई सालों से यूक्रेन के साथ युद्ध में उलझा हुआ है. यूक्रेन को अमेरिका का समर्थन हासिल है, ये जगजाहिर है. ऐसे में रूस नहीं चहेगा कि वह मिडिल ईस्‍ट में एक और मोर्चे पर अमेरिका के खिलाफ युद्ध में शामिल हो. ऐसे में लगता नहीं कि चीन और रूस मिडिल ईस्‍ट में इजरायल के खिलाफ कोई ठोस कदम उठाएंगे. 

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