US-Iran Ceasefire: ईरान के साथ जंग के बीच डोनाल्ड ट्रंप का आक्रमक रुख और उपराष्ट्रति जेडी वेंस की खामोश कुटनीति ने पश्चिमी एशिया को तबाही से बचा लिया. ये 'नरम दल गरम दल' वाला फॉर्मूला ही है जिस वजह से ईरान जंग में सीजफायर तक बात बन सकी है. जब पूरी दुनिया सांसें रोककर ईरान और अमेरिका के बीच छिड़े इस युद्ध को तीसरे विश्व युद्ध की आहट की तरह देख रही थी तब वॉशिंगटन के गलियारों से एक जेडी वेंस ने कुटनीतिक चाल चली. उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने न केवल इजरायल की चिंताओं को दूर किया, बल्कि पर्दे के पीछे रहकर ईरान के साथ दो हफ्तों के युद्ध विराम (US-Iran Ceasefire) की जमीन तैयार कर दी. हालांकि अमेरिका में उनकी भूमिका को लेकर अब सवाल उठ रहे हैं.
हैरानी की बात यह है कि एक तरफ राष्ट्रपति ट्रंप अपने सोशल मीडिया पर ईरान को 'मिटा देने' और पूरी सभ्यता के खत्म होने जैसी धमकियां दे रहे थे, वहीं दूसरी तरफ वेंस पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के जरिए मोज्तबा खामेनेई तक शांति का संदेश पहुंचा रहे थे. यह वेंस की सूझबूझ ही थी जिसने ईरान को इस बात पर राजी किया कि युद्ध को फिलहाल थामना ही सबके हित में है.
'गुड कॉप बैड कॉप' की रणनीति
बीते कुछ दिनों में ट्रंप का लहजा बेहद तल्ख रहा है. उन्होंने ईरानियों को 'सनकी' कहा और चेतावनी दी कि अगर बात नहीं बनी तो पूरी सभ्यता मर जाएगी. लेकिन इन धमकियों के शोर के पीछे जेडी वेंस एक अलग ही रणनीति पर काम कर रहे थे. रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, वेंस ने पाकिस्तान के पीएम शहबाज शरीफ से सीधी बात की, ताकि ईरान के सर्वोच्च नेतृत्व को मेज पर लाया जा सके.
युद्ध के विरोधी रहे हैं जेडी वेंस
जेडी वेंस का यह 'पीसमेकर' वाला अंदाज अचानक नहीं आया है. इराक युद्ध में शामिल रहे पूर्व मरीन जेडी वेंस शुरू से ही ईरान के साथ सीधे सैन्य टकराव के विरोधी रहे हैं. 'पॉलिटिको' और 'एक्सियोस' जैसी पत्रिकाओं ने पहले ही संकेत दे दिया था कि वेंस इस युद्ध को अमेरिकी संसाधनों की बर्बादी मान रहे थे. उनका तर्क था कि पश्चिम एशिया में उलझना अमेरिका के लिए बेहद महंगा और मुख्य मुद्दों से ध्यान भटकाने वाला साबित होगा.
हालांकि, शुरुआत में ट्रंप ने उनकी इस राय को नजरअंदाज किया और युद्ध शुरू हो गया, लेकिन वेंस को अपनी 'इनर सर्कल' से बाहर नहीं किया. सोमवार को ट्रंप ने खुद मुहर लगाई कि वेंस और विदेश मंत्री मार्को रुबियो शांति वार्ता को संभाल रहे हैं. ट्रंप का यह समर्थन वेंस के लिए संजीवनी जैसा था, क्योंकि इसी के बाद ईरान ने उन्हें गंभीरता से लेना शुरू किया.
क्यों ईरान ने सिर्फ वेंस पर जताया भरोसा?
ईरान के लिए अमेरिका पर भरोसा करना आसान नहीं था. जून 2025 के '12-दिवसीय युद्ध' और उसके बाद की घटनाओं में ईरान को लगा कि अमेरिकी दूतों ने उनसे वादाखिलाफी की है. विशेष रूप से जारेड कुशनर और विटकॉफ के साथ हुई बातचीत के बाद जब अमेरिकी हमले नहीं रुके, तो ईरान ने उनके साथ बैठने से ही मना कर दिया.
ईरान को पता था कि वेंस युद्ध के पक्षधर नहीं हैं, लेकिन साथ ही उनके पास ट्रंप का सीधा समर्थन हासिल है. जब वेंस ने तेहरान को चेतावनी दी कि अगर वे नहीं माने तो ट्रंप ऊर्जा बुनियादी ढांचे को तबाह कर देंगे तो ईरान को पीछे हटने में ही भलाई नजर आई.
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