ईरान में बार-बार के विद्रोह के बावजूद खामेनेई शासन का तख्तापलट क्यों नहीं होता? 5 वजहें

Iran Protest: ईरान में एक बार फिर देशव्यापी हिंसक विरोध-प्रदर्शन हुआ, कम से कम 5 हजार से अधिक लोग मारे गए, अमेरिका तक ने हमले की धमकी दी... लेकिन कुल जमा यही निकला कि सुप्रीम लीडर खामेनेई का शासन बना रहेगा.

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ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई का शासन अभी भी बरकरार है
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  • ईरान सुप्रीम लीडर खामेनेई ने अपने शासन की शुरुआत से सत्ता के सभी घटक को अपने कंट्रोल में रखा है
  • ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स और बसीज बलों के प्रमुखों की नियुक्ति केवल सुप्रीम लीडर के अधिकार में है
  • आर्थिक और सैन्य असफलताओं के बावजूद खामेनेई के करीबी अधिकारी और धार्मिक नेता सार्वजनिक रूप से उनसे अलग नहीं हुए
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ईरान में सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई का पिछले 37 साल से शासन है. इस दौरान न जाने कितने विद्रोह हुए, जनता सड़क पर उतरी. अमेरिका और इजरायल ने भी तख्तापलट करने के लिए पूरी ताकत झोंक दी. लेकिन इन सबके बावजूद खामेनेई शासन की कुर्सी बची हुई है. वो समय के साथ अडिग नेता बने हुए हैं. इस बार भी देशव्यापी विरोध प्रदर्शन हुआ था, समाज के बड़े हिस्से ने भागीदारी की थी, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रदर्शनकारियों को कह दिया था कि हम मदद के लिए आ रहे हैं. इस बार हिंसा और बढ़ी लेकिन इन सबके बावजूद ईरान के सुप्रीम लीडर को हटाया नहीं जा सका. सवाल है कि इसकी वजह क्या है?

1- सुप्रीम लीडर के हाथों में सत्ता का अत्यधिक केंद्रीकरण

जब 1989 में अयातुल्ला खुमैनी की मृत्यु हुई, तो उनके शिष्य अली खमेनेई सुप्रीम लीडर के लिए सर्वसम्मत उम्मीदवार के रूप में उभरे. अली खामेनेई 1981 से ही ईरान के राष्ट्रपति थे. अपने शासन की शुरुआत में ही अयातुल्लाह ख़ामेनेई ने व्यापक शक्तियां अपने हाथ में केंद्रित कर लीं. वे न्यायपालिका को नियंत्रित करते हैं, सरकारी टीवी के प्रमुख की नियुक्ति करते हैं, चुनाव उम्मीदवारों की जांच करने वाली गार्जियन काउंसिल के सदस्यों को चुनते हैं और आंतरिक सुरक्षा से जुड़े प्रमुख मंत्रालयों के मंत्रियों की नियुक्ति करते हैं. इससे कोई भी स्वतंत्र संस्था उन्हें कानूनी या राजनीतिक रूप से चुनौती नहीं दे पाती है.

2- ईरान में सेना पर पूर्ण नियंत्रण

ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स और बसीज के कमांडरों की नियुक्ति केवल सुप्रीम लीडर करते हैं. ये बल विशेष रूप से क्रांति की रक्षा के लिए बनाए गए थे और समय के साथ इन्हें और मजबूत किया गया. इनकी वफादारी के कारण सरकार हर बार प्रदर्शनों को कुचलने में सफल रही, भले ही प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हिंसा बढ़ती चली गई.

3- असफलताओं के बावजूद शासक वर्ग की गहरी वफादारी

ईरान में आर्थिक और सैन्य असफलताओं के बावजूद खामेनेई के करीबी अधिकारी, जिनमें छोटे स्तर के मौलवी और सैन्य कमांडर शामिल हैं, सार्वजनिक रूप से उनसे अलग नहीं हुए. इस एकजुटता ने सत्ता तंत्र में दरारें पड़ने से रोके रखा और विरोध आंदोलनों को सत्ता परिवर्तन में बदलने नहीं दिया. इस बार के विद्रोह में ईरान के राष्ट्रपति मसूद पजशकियान ने सामने आकर कहा कि सरकार प्रदर्शनकारियों की बात सुनेगी लेकिन एक बार भी उन्होंने सुप्रीम लीडर की आलोचना नहीं की.

4- खामेनेई के पास कट्टर समर्थकों का मजबूत आधार

न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार विश्लेषकों का मानना है कि ईरान के लगभग 6.1 करोड़ मतदाताओं में से करीब 20 प्रतिशत लोग अब भी शासन के कट्टर समर्थक हैं. भले ही अधिकांश ईरानी सुप्रीम लीडर को भ्रष्ट और दमनकारी मानते हों, यह वफ़ादार समूह शासन को टिकाए रखने के लिए पर्याप्त समर्थन देता है.

5- बचे रहने को ही जीत दिखाता है यह शासन

ईरान में कड़े प्रतिबंधों, बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों और विदेशी सैन्य हमलों के बावजूद अयातुल्लाह खामेनेई ने शासन के अपने वजूद को बचाए रहने को ही वैचारिक और धार्मिक जीत के रूप में पेश किया है. उसने बार-बार विदेशी दुश्मनों को जिम्मेदार ठहराया है. इस्लामी मूल्यों की रक्षा से जोड़कर अपने दमन को सही ठहराया और समर्थन बनाए रखा है.

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इन कारणों से स्पष्ट होता है कि लगातार विरोध प्रदर्शनों ने शासन को कमजोर तो किया है, लेकिन ईरान के सुप्रीम लीडर को पराजित नहीं कर सके.

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