- कतर पर ईरान का बड़ा हमला, 17% LNG सप्लाई 5 साल के लिए खत्म.
- गैस, बिजली, सीएनजी, पीएनजी और उर्वरक महंगे हो सकते हैं.
- दुनिया में ऊर्जा संकट गहराने का खतरा, भारत पर इसका सीधा असर पड़ने की संभावना.
मिडिल ईस्ट में चल रही जंग में ईरान के हालिया हमले ने दुनिया की एक सबसे बड़ी एनएनजी सप्लाई चेन को ऐसा झटका दिया है, जिसका असर आने वाले 5 साल तक महसूस किया जाएगा. रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया के सबसे बड़े LNG निर्यातक कतर की करीब 17% निर्यात क्षमता इस हमले में खत्म हो गई है. यह कोई छोटा नुकसान नहीं है. इसका मतलब है कि हर साल करोड़ों टन गैस जो यूरोप, एशिया और खासकर भारत जैसे देशों को मिलती थी, अब उसमें कुछ कमी आएगी जिसकी वजह से ये महंगी हो जाएगी. ईरान ने जिन टारगेट्स को निशाना बनाया, उनमें कतर की LNG इंडस्ट्री के अहम इंफ्रास्ट्रक्चर शामिल थे. रिपोर्ट बताती है कि कतर के 14 LNG ट्रेनें ( यानी गैस प्रोसेसिंग यूनिट) में से कम से कम 2 को भारी नुकसान हुआ है. इसके अलावा, 2 गैस-टू-लिक्विड प्लांट भी प्रभावित हुए हैं. यह हमला इतना सटीक और बड़ा था कि इससे सालाना 20 अरब डॉलर तक का नुकसान होने का अंदेशा है. कतर एनर्जी के सीईओ साद अल-काबी ने भी माना कि इस हमले का नुकसान बहुत बड़ा है और इसकी मरम्मत में 3 से 5 साल तक लग सकते हैं.
इस हमले के बाद कतर ने अपने कई लॉन्ग-टर्म सीएनजी कॉन्ट्रैक्ट्स पर 'फोर्स मैजर' घोषित कर दिया है. यानी विभिन्न देशों से सप्लाई का जो वादा किया गया था, उसे वो अब पूरा नहीं कर पाएगा. चीन, यूरोप और एशिया के कई देश जो कतर की गैस पर निर्भर थे, अब अचानक सप्लाई क्राइसिस का सामना कर रहे हैं. और यही वो जगह है जहां से असली ग्लोबल संकट शुरू होता है.
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गैस से लेकर बिजली तक सब महंगा
एलएनजी का कनेक्शन बिजली, इंडस्ट्री, ट्रांसपोर्ट और यहां तक कि घर के किचन तक से जुड़ा हुआ है. जब इसकी सप्लाई कम होगी तो दाम का बढ़ना लगभग तय है. यूरोप पहले ही रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद गैस संकट झेल चुका है. अब कतर से सप्लाई घटने पर कीमतों में नई उछाल आ सकती है. भारत समेत कई देश गैस से बिजली बनाते हैं. एलएनजी महंगी होगी तो बिजली के बिल भी बढ़ेंगे. सीमेंट, स्टील, केमिकल और फर्टिलाइज़र जैसे सेक्टर सीधे गैस पर निर्भर हैं. प्रोडक्शन कॉस्ट बढ़ेगी और इसका असर महंगाई के रूप में आम आदमी पर पड़ेगा.
भारत पर क्या असर पड़ेगा?
भारत अपनी एलएनजी जरूरत का एक बड़ा हिस्सा कतर से आयात करता है. पेट्रोनेट जैसी कंपनियों के साथ लंबे समय के समझौते हैं. लेकिन फोर्स मैजर के चलते सप्लाई प्रभावित हो सकती है. फोर्स मैजर एक फ्रेंच शब्द है, जिसका मतलब होता है- ऐसी अनहोनी या मजबूरी जो इंसान के कंट्रोल से बाहर हो.
इसके तात्कालिक असर में घरेलू गैस का महंगा होना, सीएनजी और पीएनजी की कीमतें बढ़ना, बिजली उत्पादन महंगा होना, फर्टिलाइजर की लागत का बढ़ना शामिल हैं. कतर के एलएनजी प्लांट पर हमले से हुए दीर्घकालिक नुकसान को देखते हुए, इसे आयात करने वाले देश निश्चित तौर पर विकल्प की तलाश कर रही होंगी. ऐसे में विकल्प के तौर पर ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और रूस से उन्हें गैस खरीदना. लेकिन यह आसान नहीं है, क्योंकि वहां से गैस पहले से ही बुक होती है और कीमत भी कतर की तुलना में अधिक है.
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तेल और LNG का कनेक्शन: डबल झटका
इस पूरे संकट में एक और बड़ा फैक्टर तेल बाजार है. अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने संकेत दिया है कि अमेरिका ईरान पर लगे कुछ प्रतिबंध हटा सकता है ताकि ईरानी तेल बाजार में आ सके और सप्लाई बढ़े. करीब 140 मिलियन बैरल तेल समुद्र में टैंकरों पर फंसा हुआ है. अगर यह तेल बाजार में आता है, तो तेल के दाम कुछ हद तक काबू में रह सकते हैं. लेकिन LNG का संकट अलग है, क्योंकि गैस इंफ्रास्ट्रक्चर को रिपेयर करने में सालों लगते हैं.
ऊर्जा बना जंग का नया मोर्चा
इस युद्ध को शुरू हुए तीन हफ्ते हो रहे है, जो अब एनर्जी वॉर में तब्दील हो चुका है. स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज पहले से ही खतरे में है. ईरान ने टैंकरों पर हमले किए हैं. अमेरिका सहयोगी देशों से हॉर्मुज से तेल टैंकरों को गुजारने के लिए स्कॉर्ट जहाजों को भेजने के लिए कह रहा है. तेल की सप्लाई चेन पूरी तरह अस्त व्यस्त हो गई है. हालात यह हैं कि अगर यह स्थिति और बिगड़ी तो पूरी दुनिया पर भी ऊर्जा संकट खड़ा हो सकता है.
क्यों खतरनाक है यह स्थिति?
चूंकि कतर दुनिया के सबसे बड़े एलएनजी सप्लायर्स में से है और उसका एलएनजी प्लांट क्षतिग्रस्त हो गया है, जिसकी मरम्मत में पांच साल तक लग सकते हैं. गैस सप्लायर्स के विकल्प सीमित हैं और पहले से ही ग्लोबल सप्लाई बहुत नियंत्रित है. इसका मतलब यह भी है कि कतर के रास लाफान को हुआ नुकसान शॉर्ट टर्म झटका नहीं बल्कि लंबी अवधि का संकट है. ऐसे में गैस की कीमत ऊंची हो सकती है. वहीं भारत जैसे देश नए सप्लायर खोजेंगे, अक्षय ऊर्जा पर जोर बढ़ेगा और एनर्जी के क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत की ओर बढ़ेगा.














